Book Title: Prakrit Vyakaranam Part 1
Author(s): Hemchandracharya, Suresh Sisodiya
Publisher: Agam Ahimsa Samta Evam Prakrit Samsthan

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Page 407
________________ 374 : प्राकृत व्याकरण अर्थः- संस्कृत अव्यय 'मुधा व्यर्थ' अर्थ में प्राकृत भाषा में 'मोरउल्ला' अव्यय का प्रयोग होता है। जब 'व्यर्थ' ऐसा भाव प्रकट करना हो तो 'मोरउल्ला' ऐसा शब्द बोला जाता है। जैसे:- मुधा=मोरउल्ला अर्थात् व्यर्थ (है)। 'मुधा' संस्कृत अव्यय रूप है। इसका प्राकृत रूप 'मोरउल्ला' होता है। इसमें सूत्र संख्या २-२१४ से 'मुधा' के स्थान पर प्राकृत में 'मोरउल्ला' आदेश की प्राप्ति होकर 'मोरउल्ला' रूप सिद्ध हो जाता है।।२-२१४।। दरार्धाल्पे ॥ २-२१५।। दर इत्यव्ययमर्धार्थे ईषदर्थे च प्रयोक्तव्यम्।। दर-विअसिआ अर्धेनेषता विकसितमित्यर्थः।। अर्थः- 'अर्ध' =खंड रूप अथवा आधा समभाग' इस अर्थ में और 'ईषत् अल्प अर्थात् थोड़ा-सा' इस अर्थ में भी प्राकृत में 'दर' अव्यय का प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार जहाँ 'दर' अव्यय हो; वहाँ पर विषय-प्रसंग को देखकर के दोनों अर्थों में से कोई सा भी एक उचित अर्थ प्रकट करना चाहिये। जैसे:-अधं विकसितम् अथवा ईषत् विकसितम्-दर-विअसिअं अर्थात् (अमुक पुष्प विशेष) आधा ही खिला है अथवा थोड़ा सा ही खिला है। अर्ध-विकसितम् अथवा ईषत्-विकसितम् संस्कृत विशेषण रूप है। इसका प्राकृत रूप दर विअसिअं होता है। इसमें सूत्र संख्या २-२१५ से 'अर्ध' अथवा 'ईषत्' के स्थान पर प्राकृत में 'दर' आदेश; १-१७७ से 'क्' और 'त्' का लोप; ३-२५ से प्रथमा विभक्ति के एकवचन में अकारान्त नपुंसकलिंग में संस्कृत प्रत्यय 'सि' के स्थान पर प्राकृत में 'म्' प्रत्यय की प्राप्ति और १-२३ से प्राप्त 'म्' का अनुस्वार होकर 'दर-विअसि रूप सिद्ध हो जाता है।। २-२१५॥ किणो प्रश्ने । २-२१६।। किणो इति प्रश्ने प्रयोक्तव्यम्।। किणो धुवसि।। अर्थः- 'क्या' क्यों अथवा किसलिये' इत्यादि प्रश्न वाचक अर्थ में प्राकृत-भाषा में 'किणो' अव्यय प्रयुक्त होता है। जहाँ किणो' अव्यय प्रयुक्त हो; वहाँ इसका अर्थ 'प्रश्नवाचक' जानना चाहिये। जैसे:-किम् धूनोषि-किणो धुवसि अर्थात् क्यों तू हिलाता है ? "किणो' प्राकृत साहित्य का रूढ-अर्थक और रूढ-रूपक अव्यय 'किणो' सिद्ध है। ___ 'धूनोषि' संस्कृत सकर्मक क्रियापद का रूप है। इसका प्राकृत रूप 'धुवसि' होता है इसमें सूत्र संख्या ४-५९ से संस्कृत धातु 'धून' के स्थान पर प्राकृत में 'धुव्' आदेश; ४-२३९ से हलन्त प्राकृत धातु 'धुव' में विकरण प्रत्यय 'अ' की प्राप्ति और ३-१४० से वर्तमान काल के एकवचन में द्वितीय पुरुष में 'सि' प्रत्यय की प्राप्ति होकर 'धुवसि' रूप सिद्ध हो जाता है।।२-२१६।। इ-जे-राः पादपूरणे ।। २-२१७।। इजे र इत्येते पाद-पूरणे प्रयोक्तव्याः।। न उणा इ अच्छीइं। अणुकूलं वोत्तुं जे। गेण्हइ र कलम-गोवी॥ अहो। हहो। हेहो। हा। नाम। अहह। हीसि। अयि। अहाह। अरि रि हो इत्यादयस्तु संस्कृत समत्वेन सिद्धाः।। ___ अर्थः- 'छंद आदि रचनाओं में पाद-पूर्ति के लिये अथवा कथनोपकथन में एवं संवाद-वार्ता में किसी प्रयोजन के केवल परम्परागत शैली-विशेष के अनुसार 'इ, जे, र' वर्ण रूप अव्यय प्राकृत रचना में प्रयुक्त किये जाते हैं। इन एकाक्षरी रूप अव्ययों का कोई अर्थ नहीं होता है; केवल ध्वनि रूप से अथवा उच्चारण में सहायता रूप से ही इनका प्रयोग किया जाता है; तदनुसार ये अर्थ हीन होते हैं एवं तात्पर्य से रहित ही होते हैं। पाद-पूर्ति तक ही इनकी उपयोगिता जाननी चाहिये। उदाहरण इस प्रकार है:- न पुनर् अक्षीणि न उणा इ अच्छीइं अर्थात् पुनः आँखे नहीं-(वाक्य अपूर्ण है)। इस उदाहरण में एकाक्षरी रूप 'इ' अव्यय अर्थ हीन होता हुआ भी केवल पाद-पूर्ति के लिये ही आया हुआ है। 'जे' का उदाहरणः-अनुकूलं Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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