Book Title: Prakrit Vyakaranam Part 1
Author(s): Hemchandracharya, Suresh Sisodiya
Publisher: Agam Ahimsa Samta Evam Prakrit Samsthan

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Page 408
________________ प्रियोदया हिन्दी व्याख्या सहित : 375 वक्तुं-अणुकूलं वोत्तुं जे अर्थात् अनुकूल बोलने के लिये। इस प्रकार यहाँ पर 'जे' अर्थहीन रूप से प्राप्त है। 'र' का उदाहरण:गृह्णाति कलम गोपी गेण्हइ र कलम-गोवी अर्थात् कलम-गोपी (धन्यादि की रक्षा करने वाली स्त्री विशेष) ग्रहण करती है। इस उदाहरण में 'र' भी अर्थ हीन होता हुआ पाद-पूर्ति के लिये ही प्राप्त है। यों अन्यत्र भी जान लेना चाहिये। प्राकृत-साहित्य में अन्य अव्यय भी देखे जाते हैं; जो कि संस्कृत के समान ही होते हैं; कुछ एक इस प्रकार हैं:- (१) अहो, (२) हहो, (३) हेहो, (४) हा, (५) नाम, (६) अहह, (७) ही-सि, (८) अयि, (९) अहाह, (१०) अरि, (११) रि और (१२) हो। ये अव्यय-वाचक शब्द संस्कृत के समान ही अर्थयुक्त होते हैं और इनकी अक्षरीय-रचना भी संस्कृत के समान ही होकर तद्-वत् सिद्ध होते हैं। अतएव इसके लिए अधिक वर्णन की आवश्यकता नहीं रह जाती है। 'न' अव्यय की सिद्धि सूत्र संख्या १-६ में की गई हैं। 'उणे' अव्यय की सिद्धि सूत्र संख्या १-६५ में की गई है। 'इ' अव्यय पाद-पूर्ति अर्थक-मात्र होने से साधनिका की आवश्यकता नहीं रह जाती है। 'अच्छीइं रूप की सिद्धि सूत्र संख्या १-३३ में की गई है। 'अनुकूलम्' संस्कृत द्वितीयान्त विशेषण रूप है। इसका प्राकृत रूप 'अनुकूल' होता है। इसमें सूत्र संख्या १-२२८ से 'न्' के स्थान पर 'ण' की प्राप्ति; ३-५ से द्वितीया विभक्ति के एकवचन में 'म्' प्रत्यय की प्राप्ति और १-२३ से प्राप्त 'म्' का अनुस्वार होकर 'अणुकूलं' रूप सिद्ध हो जाता है। 'वक्तुम्' संस्कृत कृदन्त रूप है। इसका प्राकृत रूप 'वोत्तुं होता है। इसमें सूत्र संख्या ४-२११ से मूल संस्कृत धातु 'वच्' के स्थान पर कृदन्त रूप में 'वोत्' आदेश और ४-४४८ से संस्कृत के समान ही प्राकृत में हेत्वर्थकृदन्त अर्थ में 'तुम्' प्रत्यय की प्राप्ति और १-२३ से अन्त्य हलन्त 'म्' का अनुस्वार होकर 'वोत्तुं रूप सिद्ध हो जाता है। 'जे' अव्यय पाद-पूर्ति अर्थक मात्र होने से साधनिका की आवश्यकता नहीं रह जाती है। ___ 'गृह्णाति' संस्कृत सकर्मक क्रियापद का रूप है। इसका प्राकृत रूप 'गेण्हइ' होता है। इसमें सूत्र संख्या ४-२०९ से मूल संस्कृत धातु 'ग्रह' के स्थान पर प्राकृत में 'गेण्ह' आदेश और ३-१३९ से वर्तमान काल के एकवचन में प्रथम पुरुष में प्राकृत में 'इ' प्रत्यय की प्राप्ति होकर 'गेण्हई' रूप सिद्ध हो जाता है। 'र' अव्यय पाद-पूर्ति अर्थक मात्र होने से साधनिका की आवश्यकता नहीं रह जाती है। कलम-गोपी संस्कृत रूप है। इसका प्राकृत रूप कलम-गोवी होता है। इसमें सूत्र संख्या १-२३१ से 'प' के स्थान पर 'व' की प्राप्ति और ३-१९ से प्रथमा विभक्ति के एकवचन में दीर्घ ईकारान्त स्त्रीलिंग में संस्कत प्रत्यय 'सि' के स्थान पर अन्त्य दीर्घ स्वर 'ई' को 'यथा-स्थिति' अर्थात् दीर्घता ही प्राप्त होकर कलम-गोवी रूप सिद्ध हो जाता है। __'वृत्ति' में वर्णित अन्य अव्ययों की साधनिका की आवश्यकता नहीं है; क्योंकि उक्त अव्यय संस्कृत अव्ययों के समान ही रचना अर्थ वाले होने से स्वयमेव सिद्ध रूप वाले ही हैं। ।। २-२१७।। प्यादयः ॥ २-२१८॥ प्यादयो नियतार्थवृत्तयः प्राकृते प्रयोक्तव्याः।। पि वि अप्यर्थे।। अर्थः- प्राकृत भाषा में प्रयुक्त किये जाने वाले 'पि' और 'वि' इत्यादि अव्ययों का वही अर्थ होता है; जो कि संस्कृत भाषा में निश्चित है; अतः निश्चित अर्थ वाले होने से इन्हें 'वृत्ति' में 'नियत अर्थ-वृत्तिः' विशेषण से सुशोभित किया है। तदनुसार 'पि' अथवा 'वि' अव्यय का अर्थ संस्कृतीय 'अपि' अव्यय के समान ही जानना चाहिये। "पि' अव्यय की सिद्धि सूत्र संख्या १-४१ में की गई है। 'वि' अव्यय की सिद्धि सूत्र संख्या १-६ में की गई है। ।। २- २२८।। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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