Book Title: Prachin Jain Itihas Sangraha Part 02 Jain Rajao ka Itihas
Author(s): Gyansundar Maharaj
Publisher: Ratnaprabhakar Gyanpushpamala

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Page 9
________________ [<] बात तो दावे के साथ कह सकता हूँ कि मैं प्रत्यक्ष प्रमाण को ही मानने वाला हूँ । खैर आप इस समय क्या साहित्य लिख रहे हैं ? शान्ति – मैं भगवान ऋषभदेव का इतिहास लिख रहा हूँ, कान्ति - भगवान ऋषभदेव कौन और किस समय में हुए ? शान्ति - क्या आप भगवान ऋषभदेव को भी नहीं जानते हो ? कान्ति - नहीं ? मेरी इतिहास की सोध खोज में ऋषभदेव का सम्बन्ध नहीं आया है । शान्ति - भगवान् ऋषभदेव का नाम तो आपने सुनाही होगा ? कान्ति -- नहीं आज आपके मुँह से ही सुना है । शान्ति - अरे भाई | क्या आप इतने वर्ष किसी गुफा में रह कर ही दिन पूरे किये थे कि आपने भगवान् ऋषभदेव का नाम तक भी नहीं सुना ? भगवान् ऋषभदेव की मूर्तियों हजारों वर्ष पूर्व की आज भी जनता का जीवन सफल बना रही हैं उदद्यागिरि खण्डगिरी के शिलालेख और मथुरा के कांकाली टीला के खण्डहर जिनकी प्राचीनता प्रगट कर रहे हैं । कान्ति - हाँ मित्र ? मैं बचपन से ही स्कूल में प्रवेश हुआ चौदह वर्ष की पढ़ाई के बाद वहाँ से निकलकर इस कमरे में पुस्तकों का कीड़ा बन रात्रि दिन इनका ही अवलोकन कर रहा हूँ इसका कारण मुझे शिक्षा ही ऐसो मिली और मेरा संस्कार भी इस विषय में सजड़ बन गया कि प्रमाण के सिवाय कुछ भी नहीं मानता हूँ। सोध खोज में मेरा समय जा रहा है । मैं इतिहास और इसी

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