Book Title: Prachin Jain Itihas Sangraha Part 02 Jain Rajao ka Itihas
Author(s): Gyansundar Maharaj
Publisher: Ratnaprabhakar Gyanpushpamala

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Page 16
________________ [ १५ ] कान्ति-अच्छा मित्र। मैं आपका उपकार मानता हूँ फिर __ कभी मिलिये ? शान्ति-आपका समय मैंने बहुत लिया है क्षमा करें। जयजिनेन्द्र? कान्ति-जयजिनेन्द्र ? - -- - -- -- मरुधर में ज्ञान प्रकाशा रत्नप्रभाकर ज्ञान पुष्पमाला । प्रकाश किया सब देश में ॥ इतिहास भक्ति उपदेश चर्चा । तत्त्वज्ञान समझाया रहस्य में । एकसौसेंतालीस जातिके पुष्प । तीन लाख प्रतिएँ विशेष में ॥ मरुधर की मुनि 'ज्ञानसुन्दर' । उन्नति चाहें हमेश में ॥१॥ 'गुण' ------- -- -- -S CRESH

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