Book Title: Narpati Jay Charya Swaroday
Author(s): Narpati Kavi, Harivansh Kavi
Publisher: Kshemraj Krishnadas

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Page 265
________________ ( २५६ ) नरपतिंजयचर्या पूर्वोत्तरगतः शुक्ले कृष्णे पश्चिमदक्षिणे ॥ पक्षभुक्तिप्रमाणेन पक्षचंद्र इहोच्यते ॥ १ ॥ इति पक्षचंद्रभूमिः ॥ ४ ॥ दिनचंद्र: ५ ४ ३ २ १२८२७२६ १० ११ schoo 광 चं० उ चं० वा पू ६ ० ० प २५ RRR -२४ भ '२३ -२२ -२१ २० १९ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat E भा 5 to bo १२ १३ १४ १५ १६ १७ १८ श्र अउ पू मृज्ये अ चक्रे सप्तशलाकाख्ये ऐंद्र्यां मध्येऽर्कभं न्यसेत् ॥ ततो वामेन चंद्रक्षं दिनचंद्र इहोच्यते ॥ १ ॥ इति दिनचंद्रभूमिः ॥ ५ ॥ दिनऋक्षातं सव्येन सपादर्घाटिकाद्वयम् ॥ प्रतिनाडयां भवेद्भुक्तिरेष तात्कालिकः शशी ॥१॥ इति तात्कालिक चंद्रः ॥ ६ ॥ चन्द्रमंडलभूः ७ अयनभानुः १ उ श ध तात्कालिकचंद्रः ६ कृ रो मृआ पु पु ले उत्तरायण सूर्यः उ म کو पू उ ह - चि स्वा - वि नै सप्तमो बिंबरूपेण प्रत्यक्ष इह दृश्यते । वामाग्रे जयदश्चंद्र एवं सप्तविधः स्मृतः ॥ १ ॥ इति सप्तविधचंद्रः ॥ ७ ॥ दक्षिणायनसूर्यः www.umaragyanbhandar.com

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