Book Title: Mahabharatam
Author(s): Nagsharan Sinh, 
Publisher: Nag Prakashan Delhi

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Page 722
________________ शिखण्डी तु रणे ( भीष्म) ११७.२२ शिखण्डी तु समासाद्य (भीम) ६९.३१ शिखण्डी तु समासाद्य (भीष्म) ८६.२५ शिखण्डी तु समासाद्य (भीष्म) ११४.४० शिखण्डी तु समासाद्य ( भीष्म) ११६.६५ शिखण्डी द्र पदाज्जज्ञे (आ) ६३.१२५ शिखण्डी नहुषो बभ्रु: (शांति) ४३.१३ शिखण्डी निधनं कृष्ण (भीष्म) १०७.१०३ शिखण्डीनं याज्ञसेनि (द्रोण) ६५.४४ शिखण्डी पाण्डुपुत्राणां (आश्व ) ६०.६ शिखण्डी युयुधानश्च (उद्योग) १९४.१८ शिखण्डी रक्षितस्तेन (द्रोण) १६८.१६ शिखण्डी समरामर्षी ( भीष्म) १०७.८१ शिखड़ीं समरे राजन् (भीष्म) ४५.४६ शिखण्डी सह मत्स्येन ( भीष्म) ७२.१ शिखण्डी सहदेवश्च (कर्ण) ५६.६५ शिखरस्थं समासीन (वन) १५९.२७ शिखराणां समृद्धानां (भीष्म) ३.४३ शिखराणि व्यशीर्यन्त (द्रोण) १९६.३ शिखी मुडी जटी ज्वाली (अनु) १७.५८ Jain Education International शित तीक्ष्णाग्रधाराणि ( आ ) ३०.४८ शितधारंस्तथा खडू ( भीष्म) ५२.७१ शितपरश्वधसा सिपट्टिश (कर्ण) ३०.३ शितिकण्ठमजं शुक्रं (आव) ७.३१ शितिकण्ठमजं शुक्र (सौप्तिक ) ७.३ शितेन ते परशुना (वन) १३४३५ पृषत्कैः कुर्वाणान (कर्ण) ३६.३२ शितैरग्निशिखाकार (द्रोण) १०४.३२ तिरेवाकिरद्वाण (भीष्म) ५४.१८ शितैस्त बहुशो राजन् भीष्म) ८२.३५ शिनिना सोमदत्तस्तु (द्रोण) १४४.१३ शिपिविष्टेति चाख्यायं (शांति) ३४२.७१ मिनिवृषभशनिपीडितं (कर्ण) ३०.११ शिनेनंप्ता किरन्याणं (शल्य) १७.१० शिवपुत्रो महातेजा (शांति) ४१.७६ शिविप्रभृतयो राजन् (शांति ) १४३.३ शिविमौशीनरं चापि मृतं (द्रोण ) ५८. १ शिबिरं मापयामास (उद्योग) १५२.६ शिबिरं समनुप्राप्य (शस्त ) शिबिरं हस्तिनपुरा ( मल्य ) ६२.७ ६३.७८ श्रीमन्महाभारतम् श्लोकानुक्रमणी शिबिराणि कुरक्षेत्र (उद्योग) १५३.१४ शिबिराणि महण (उद्योग) १५२.११ शिबिरात् सञ्जयं प्राप्तं (द्रोण ) १.७ शिबिरान्निष्पतन्ति ( सौप्तिक ) ८.१०६ शिबिरौशीनरः प्राणान् (अनु) १३७.४ शिबिरौशीनरो धीमान् (उद्योग) १२२.८ शिबिरौशीनरोऽङ्गानि (शांति) २३४.१६ शिबिसौवीरसिन्धुनां (वन) २७१.३ शिब्बीनन्यांश्च राजन् (द्रोण) ७०.१३ शिबी नवकुमुख्याश्च (वन) २७१.२८ शिवे अन्नायंस्मीति (वन) १६८.१७ शिबेः स्थितान्यप्रतिमस्य ( आ ) १३.२० शिर: कपालाकुल केश (भीष्म) ५६. १२६ शिरः कपाले चास्य (आश्व) ८०.३० शिरः कायानुरूपं च (शांति ) १२७.६ शिरः कायेन सन्धाय (स्त्री) १६.५२ शिरः पशोस्ते दास्यन्ति (उद्योग) ६. ३७ शिर: प्रध्यावयामास (द्रोण) १२२.७१ शिरः प्रध्वसयामास (द्रोण) ६२.१५ शिरश्च तत्पूर्ण शशि (मणं) २०.४८ For Private & Personal Use Only शिरश्च पातु वह्निस्ते (आ) २८.१५ शिरश्च राजसिंहस्य (शल्य) ५९.६ शिरश्चिच्छेद भल्लेन ( भीष्म) ४८.७७ शिरश्चिच्छेद सहसा (शल्य) २७.४० शिरश्छेत्स्यति सं दः (द्रोण ) १४६.११० शिरश्छेत्स्यामि कर्णस्य (कर्ण) ७४.३६ शिरसस्तस्य विभ्रष्टं (द्रोण) २९.४६ शिरसा चाघमादाय (वन) ६१.१६ शिरसा ते दिवं व्याप्तं ( भीष्म) ६८.८ शिसरा प्रणमे विप्र (अनु) २०१७ शिरसा वन्दमानं (अनु) १४.६५ शिरसां पततां राजन् (द्रोण) ८६.१० शिरसां पात्यमानानां ( भीष्म) ७०.६ शिरसां पात्यमानाना (विश) ६२.१३ शिरसो मुण्डनाद्वापि (वन) २००.१०५ शिरस्तावत्प्रदीप्तं (अनु) १५.१६ शिरस्ते पातयिस्यामि (कर्ण) ४०.५५ शिरस्ते पोषयिष्यामि (द्रोण ) १९८.२१ शिरश्नातस्तु तैलं (अनु) १०४.७० शिरस्य हितं दृष्ट्वा (शल्य ) ६०.३ ७१७ शिराशतसमाकीर्णे (शांति) ३०१.३४ शिरांसि पातयामास (आश्व) ७८.१९ शिरांसि बाहूनूरूश्च (वर्ण) २४.७३ शिरांसि भल्लैरहरद् (द्रोण ) १६.२६ शिरांसि रथिनां भीष्म: (भीष्म) ८६.२१ शिरांस्युन्मथ्य वीराणां (कर्ण) १६.५ शिरस्युम दृश्यन्त (कर्ण) २७.३५ शिरास्नास्थिसंघातं (शांति) २१७.१४ शिरो गृहीत्वा केशेषु (शल्य) २३.८३ शिरो गृहीत्वा विदुरो (सभा) ६५.४२ शिरोधरां च तन्वङ्गी (वन) २८१.२५ शिरोनागं महाभोगे (अनु) १४७.५६ शिरोभितापसन्तप्तः (वन) २९७.७० शिरोभिः पतिर्तर्भाति (शस्य ) ९.१९ शिरोभिः पतितस्तत्र (द्रोण ) ९३.६ शिरोभिः पतितैस्तैः (स्त्री) १६.५० शिरोभिः प्रपतद्भिश्च ( भीष्म) ६२.४३ शिरोभिः प्रपतद्भिश्च (वन) १०१.५ शिरोभिः प्रपतद्भिश्च (वन) २४५. १४ शिरोभिर.मन् भूमि (१.णं) ३४.७९ www.jainelibrary.org

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