Book Title: Mahabharatam
Author(s): Nagsharan Sinh, 
Publisher: Nag Prakashan Delhi

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Page 781
________________ भीमन्महाभारल्म :: श्लोकानुगमणो ७७६ सर्वमाविग्नमभवद्धा (द्रोण) १७७.७ सर्वमेतद्धि भविता (वन) २०१.३० सर्व जगदिदं तात (उद्योग) ८.३७ सर्व मे सुप्रियं देवि (आव) ५१.२२ सर्वरत्नशतैः पूर्णा (द्रोण) ७०.१७ सर्वमांसानि यो राजन् (अनु)११६.३३ सर्वमेतद्यथावृत्तमतीव (शल्य) ५४.२३ सर्व जिह्न मृत्यु (आश्व) ११.४ सर्व यथावच्चरितं (विरा) ५२.५ सर्वरत्नान्युपादाय (सभा) ४६.३४ सर्वमासीज्जगत्पूर्ण (सर्व) २४.६० सर्वमेतद्यथाशक्ति (आश्व) ४५.२५ सर्व तत् काञ्चनमय (द्रोण) ५५.२७ सर्व राज्ञः समुदयमाय (वन) २३३.५३ सर्वरत्नानि राजा (शांति) १६५.४ सर्वमहाह सुदुर्घर्षों (कर्ण) ५८.५० सर्वमेतद्वसिष्ठस्य विदितं (आ)१८१.१६ सर्व तत्त्वेन धर्मज्ञ (अन) ११६.५ सर्व विकारं दृष्ट्वा तु (वन) ७६.१ सर्वराक्षसराज्ये चाप्य (वन)२८३.४६ सर्वमित्र सर्वसह (आश्व) १६.२ सवमताद्वजानन्तो (शाति) ३०६.४६ सर्व तदपि जानामि (उद्योग) ४३.४६ सर्व विदुवेदविदो वेदे शांयि)२७०.४३ सर्वराक्षससत्राय संभृत (आ)१८१.२२ सर्वमुक्तं यथातत्त्व (भीष्म) १२.४८ सर्वमेधाश्वमेधाभ्यां (शांति) २४.७ सर्व तदिह यज्ञेष (आव) २.२७ सर्व विस्तरशस्तात भवां (आ) ५३.३ सवंरूपं भवं ज्ञात्वा (द्रोण) २०१.६३ सर्वमुच्छेदनिष्टं स्यात् (शांति)२१६३ सर्वमेतन्न भोक्तव्यं (उद्योग) ६१.३२ सर्व तस्य गृहे राज्ञः (अनु) ६६.८ सर्व वैनयिकं कृत्वा (शांति) ६८.४ सर्वरोगविरहिताः सर्वपाप (वन) ३.६६ सर्वमूर्धाभिषिक्ता (उद्योग) १६७.१५ सर्वमेतन्नरव्याघ्र (आश्व) ७६.२२ सर्व तारयते वंशं यस्य (अनु) ६५.५ सर्व व्याप्तमिदं देवा (उद्योग) १०.१ सर्वतुकैराम्रवणैः (शांति) १६६.७ सर्वमूर्धाभिषिक्ताना (द्रोण) ५८.४ समेतन्मया ज्ञातं (सभा) १६.५ सर्व तुदति तत्पापं (अनु) १६.६८ सर्व सर्वेण सर्वत्र (शांति) ३०६.२० सर्वगुणसंपन्नां दिव्य (सभा) १.२१ नामबाण) २६.१६ सर्वमेतन्मया ब्रह्मन् (शांति) २६६.५७ सर्व त्वमायतीयुक्तं (उद्योग) ३६. सर्व हि नौ स्वं (शांति) ३४४.२४ सवत सुखसंस्पशी (भीष्म) ७.६ सर्वमूर्धाभिषिक्ताना (सभा) १६.१० सर्वमतन्महाबाहो (वन) १४.३६७ सर्व विदमह'पार्थ (आश्व) १५.२७ सर्वहि वेत्थ विप्र त्वं (अन) ५.२५ संवरना समुक्ति चिना १९.१० सर्वमेकरिष्यामि दिष्टया(वन)६५.७२ सर्वमेव ततो विद्या (उद्योग) ४६.१२ सर्व दुःखमिदं वीर (उद्योग) ६.५२ सर्वयज्ञेष वा दानं (अन) ११६.४० सर्वलोकगुरूं चैव (शांति) ६५.२८ सवमतत्तपामूल कवयः (शांति)१६१.१ सर्वमेव न तवासीद्धर्म सभा) १३.१४ सर्व दुर्योधनस्यायें (भीष्म) १२२.२६ सर्वयत्नबलेनापि (सोप्तिक) १२.२३ । सर्वलोकचरं सिद्ध (अनु) ७८.२ सर्वमेतत्परोक्षं मे यत्त्वं (आ) ७४.८१ सर्वमेव हठेनके देवेनके (वन) ३२.३२ सर्व पंचभिराविष्टं (ति) ३४७.१२ सर्वयोधगुणैर्युक्तो (कर्ण)७२.३१ सर्वलोकप्रमोहार्य (सौप्तिक) १३.२२ सर्वलोकमहेष्वासो (शल्व) ४.२६ सर्वमेतदतिक्रम्य (उद्योग) ८०.४ सर्वमेवाय विज्ञेयं (आश्व) २१.७ सर्व पश्यति यदृश्य (शांति) १८७.१७ सर्वयोधा हि समरे (कर्ण) ५३.२६ सर्वमेतदतिक्रम्य (उद्यो) १५४.५ सर्व पश्याभ्यहं राजन् (वन)१८८.१२२ सर्व कृतयुगे पुण्यं त्रेताय (वन)८५.९० सर्वलोकमिमं शक्तः (शांति) ८३.४५ सर्वयोधेषु चैवास्य सदा (वन) ३७.७ बनारस.१° सर्व कौशल्यमुक्त्वा (उद्योग) २०.२ सर्व पार्थ मयं लोकम, (शल्य) ३.१५ सर्वयोनिषु कौन्तेय (भीष्म) ३९.४ सर्वलोकमिम हन्यु (विरा) १६.२६ सवमतदशेषण शृणु (आ) १३.५ सर्व चागमने हेतं स (उद्योग) ७.२५ सयं प्रियाभ्युपगतं (शांति) २५९.२५ सर्वरत्नमयश्चित्रः (अन) ५१.२५ सर्व लोकवहां रोद्रा (कर्ण) ६४.१० सर्वमेतदशेषेण श्रोतु(आ) ८६.७ सर्व वाभिजानामि(उद्योग) १४१.२ सर्व बलवता पथ्यं (आश्रम) ३०.२४ सर्वररूविचित्रा च (वन) १६८.५१ सर्वलोकस्य तत्त्वज्ञः (द्रोण) ११४.५३ सर्व चैवाभिजानामि(उद्योग) १४१.२ सव बलवत समेतहृतं मन्ये (भीष्म) ३४.१४ सर्व झणझणीभूतमा (भीष्म) १६.४३ सर्व भवतु ते राज्यं (उद्योग) १५०.१७ सर्वरत्नं वषादभिः (शांति) २३४.२५ सर्वलोकस्य तेजांसि (कर्ण) ३४.४० For Personal use by

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