Book Title: Mahabharatam
Author(s): Nagsharan Sinh, 
Publisher: Nag Prakashan Delhi

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Page 767
________________ श्रीमन्महाभारतम् ।। श्लोकानुकमणी ७६२ स भीमसेनस्तेजस्वी तथा(वन)१७६.१ सभेरीशंखमुरजा (शल्य) ४६.५६ समतामुपसंगम्य (अनु) ११६.१८ समनुज्ञाप्य धर्मज्ञं (आश्व) ६१.३८ स मन्त्रिणः समानाम्य(सभा) १३.१६ स भीमसेनस्य रथ (कर्ण) ८४.३६ स भोगान्विविधान्भुज (आ) १.१३७ समतां वसुधायाश्च (शांति) ५६.११४ समनुज्ञाप्य राजानं (आश्व) ६३.२३ स मन्यमानस्त्वाचार्यो(द्रोण) १२७.४४ स भीमसेनाभिहतः (कर्ण) ५०.४७ स भोजैः सह संयुक्तः (मौ) ३.३४ समतीतानि राजेन्द्र (शांति,३३६.११६ समनुज्ञासिष कन्या(उद्योग) १७५.२ स मन्यमानो विमुचं (आव) ७६.३२ स भीमसेनाभिहत (शल्य) ५७.६४ स भ्रातृभिः पुनर्धीमा (सभा) १३.२६ समतीता नृशंसास्ते (आथम) ३.३३ समनुप्राप्तक पछोऽहं (द्रोण) २४.११ स भीमसेने निष्कान्ते (वन) १५७.७ सभ्यास्तु ये तत्र (सभा) ६७.४६ समतीत्य बहुन्देशान्गि (वन) २०.१५ समन्ततपञ्चकीमति यदुक्तं (आ) २.१ समन्युयंगमपछीनं (वन) १२५.८ स भीमं पञ्चविदवा (द्रोण) १०८.१७ सभ्यास्त्वमी राजपुश्या(सभा) ६७.१४ स मत्त इव मातङ्गः (कर्ण) ८१.३२ समन्ततः परिक्षिप्ता(आश्रम) ३८.१८ म . समन्वधावन्पुनरुत्थितं (कर्ण) ७६.६२ स भीमं पत्रचभि (द्रोण) १३६.४ सभ्राता वै सहसैन्यः (उद्योग) ४८.६६ समत्वाच्च प्रियो नास्ति(शांति)२३०.१३ समन्ततः प्रमुदितान्दर्दश(अनु) ५४.१२ समन्युवशमापग्नः (उद्योग) ७४.७ स भीम पञ्चभि (द्रोण) १५५.२२ समकम्पतः दुर्घर्षः (द्रोण) ११६.३७ स मत्स्यवचनं श्रुत्वा(वन) १८७.१० समन्ततश्च दृश्यन्ते (भीष्म) ११७.६२ समन्वितः पार्वतीय (द्रोण) २०.२० स भीमं शरधाराभिस्ता(भीष्म)६५.३५ समकम्पन्त सर्वाणि (द्रोण) १७५.२२ समदुःखसुखः स्वस्थः (भीष्म) ३८.२४ समन्ततो ददौ पश्चादग्नि(आ)१४८.११ समन्वितानि भूतानि तेषु (भीष्म)६.४० स भीमं सहसाऽभ्येत्य (वन) १७८.२८ समकम्पन्त सैन्यानि (द्रोण) १८६.२५ समदुःखसुखा यस्य (शांति) ११५.१८ समन्ततो द्विजश्रेष्ठा (शांति) १६६.६ समन्वितास्तव सुतैः(कर्ण) ४६.१५ स भीमेन परा पुष्टो (वन) ११.६० समः कर्णस्य समरे यः (कर्ण) ५.२४ समदभ्यन्त पार्थस्य शल्य) १४.१७ समन्ततो विनियतो (शांति) ७५.२७ समपद्यत सर्वेषां (गल्य) २१.२७ स भीष्ममामन्त्र्य कुरुप्रवीर(उद्योग)२.५ समः किरीटिना संबये (कर्ण) ६.४ समश्चापि विहगः (वन) १५.१७ समन्तपञ्चकद्वारात्ततो(शल्य) ५२.२८ समपस्थं मद्रराजमारोह(कर्ण) ३६.१० स भाष्मः सुसमा (उद्योग) ५५.२२ समक्ष तब कौरव्य (द्रोण) १३२.१७ समदराजः सहसा (शल्य) १७.३५ समन्तपञ्चकं तावत्ता (शल्य) ३७.४५ समप्तकर्मा सहितः (वन) १७६.२० स भुक्तवान्सुविधान्तो(शांति) १७१.३१ समक्ष तब गोविन्द न(कर्ण) ६६.११ समधीतं मया ब्रह्म (वन) १३८.२४ समन्तपञ्चकाढाह्य (भीष्म) १.६ समप्रमाणान् पाण्डूनां (उद्योग) ३.१८ सभुशुण्डयश्ममुडका (वन) १५.८ समक्ष पार्थिवेन्द्रस्य(भीष्म) ६५.१७ स मध्यं प्राप्य सैन्यानां (द्रोण) १६.२६ समन्ताच्छंबनिनदं (द्रोण) १२६.३६ समभ्यधावन् क्रोशन्तो (भीष्म) ६४.८ समगमे पाण्डवसृञ्जयाना(कर्ण) ७५.१ स मध्यं प्राप्य सैन्यानां (द्रोण २१.५४ समन्ताज्जलदप्रख्यान्चारणा(कर्ण)८०.१३ समभ्यधावद्गाङ्गेयं (भीष्म) ७१.८ स भूयः शुशुभे पार्थ (शल्य) ५७.६२ समग्रणीः सर्वधनुर्धराणा(शल्य) १७.२८ स मन सर्वभूताना(शांति) ३३६.३८ समन्तात्संशयात्सपा(शांति) १३८.३७ समभ्यधावन्त भूनं (कर्ण) २१.२८ सभृत्यदारो राजेन्द्र (वन) २८२.१६ समस्त्रिदर्शस्तत्र (शांति) ३५५.३. स मनसा विचिन्त्य (विरा) १९२.४५ समन्तात्सपरिक्षिप्तं यत् (स्त्री) ५.५ समभ्यधावं त्वरितास्त्र (कर्ण) ९३.३२ स भृशं ताडयामास (वन) २८८.२६ समघ्नञ्छवर्षेण रथस्थो(द्रोण)२६.५२ समनुज्ञाप्य तत्सर्व (साश्व) ७१.१८ समन्ताद्भ उत्पन्ने कथं (शांति)१३८.३५ समभ्यधावन् त्वरिता (भीष्म)११६.२२ सभेयं मे बहुरला (सभा) ५६.२२ स मच्छरीरे त्वच्छा (वन) ७६.१६ समनुज्ञाप्य तान्स(आ) १६.३ स मन्त्रकाले संमन्त्र्यं (द्रोण) ७५.१२ समभ्यधावन् वृषसेनमा(कर्ण) ८५.२५ Jain Education Internation For Primvale sPersonal use only. www.jainelibrary.org

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