Book Title: Mahabharatam
Author(s): Nagsharan Sinh, 
Publisher: Nag Prakashan Delhi

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Page 741
________________ श्रीमन्महाभारतम् :: श्लोकानुक्रमणी संस्तूयमानो गन्धर्व (वन) ४३.६ संस्मरन्तो विमनसो (सभा) १४.४८ संहषयन्तः कौरव्य (उद्योग) १६.२६ संहाद इति विख्यातः (आ) ६७.६ स एकदा कक्षगतो (अनु) १५८.२५ संस्तूयमानो गन्धर्व (वन) ४१.१५ संस्मरन् पुरुषा वाच: (वन) २५६.५ संहाच समरे वीर नकुलः (शल्य)१५.१३ संहादनी राजरथो य (सभा) ६१.५ स एवामाला संस्तूयमानो विप्रेन्द्र (वन) १९१.५ संस्मरन्सगमं चैव (आ) १३१.६२ सहारकाले परिदग्ध (गांति)२८०.५१ संह्रादयन्तश्च तथा (शल्य) ४६.७१ काले पनि महादयन्तश्च तथा ( स एवं रणमध्यस्थः (आश्व) ११.१८ संस्थानाः शूरसेनापच (भीष्म) ५१.६ संस्मृत्य चापि (शांति) १७३.१६ महाकाल मंगाने संहारकाले संप्राप्ते तब (वन) ३.५७ स आत्मा पुरुषव्याघ्र (वन) १८१.२२ स एनं वाग्भिरुग्राभि (द्रोण)१८६.५१ संस्थानाः शूरसेनाश्च (भीष्म) ५१.७ संस्मृत्य तदहं सम्यक् (आश्व) ६३.७ संहाराचैव भूतानां (शांति) ५०.१६ स आदिः स मध्यः (शांति) ३४०.१०० स एनं धर्मः सोऽधर्म(शांति) ३०६.१६ संस्थानेषु च सर्वेषु (शांति) ६६७ सस्मृत्य देवीं गांधारी (आश्व) ७८.४२ संहारविक्षेपमनिष्ट (शाति) २८०.४७ स आश्रमपदद्वारि वृक्षमूले (आ)१०७.३ स एनं धर्मः सोऽधर्मों (शांति)३६.११ संस्थाप्य चाश्वान्कोन्तेय(विरा) ४६.६ संस्मृत्य पूर्वभूति च (शांति) १११.५ संहारविक्षपसहस्र (शांति) २८०.३० स उंछत्तिस्तं प्रेक्ष्य (आश्व) १०.४१ स एव पार्थाय श्वेत (अनु) १५८.२६ संस्थाप्य चाश्वान्कोन्तेय(विरा)४६.१. संस्मृत्य मन्त्रितं पूर्व (भीष्म) ७८.६ संहारार्थ प्रसीदञ्च (द्रोण) ५३.६ स उपाध्यायं प्रत्युवाच (आ) ३.३७ स एव पूर्व निजधान (अनु) १५८.११ स्थाप्य तामाश्रमदर्शने (वन) ११३.६ संस्वेदजा अण्डजा (आ) ८६.११ संहारार्थ प्रसीदस्व (शांति) २५७.६ स उपाध्यायं प्रत्युवाच (आ) ३.५५ स एव बलवान् भूत्वा (मो) ८.३५ चापय पथिष्वस्मा(उद्योग) ६५.४७ संहतानि च तूर्याणि (वन) २३१.७८ संहारे सर्वतो जाते शाल्य) २३.२० स उपाध्यायवचनं श्रुत्वा (आ) ३.५४ स एव भक्तः स गुरु:(उद्योग) ३०.३१ स्यते तु नुपे (पांति) ३३५.५१ संहतान्योधयेदल्पान्(शांति) १००.४७ संहिताध्ययनं कुर्बन (आ) १६७.१८ स उपाध्यायवचनादर (आ) ३.३५ स एवमनुशास्तस्तु (शांति) ३१८.६४ शंपरिचर्यस्तु (अनु) ५६.३४ सहता येन चाविद्धा (शांति) ३२८.४२ संहिताध्ययने युक्तो आ) १६७.८ स उपाध्यायेन संदिष्ट (आ) ३.२३ स एवमभ्यनुज्ञातश्चके (द्रोण) ७.५ सवन्तः स्वकान्बाहू (आ)१०२.२० संहताश्च भृशं ह्यते(द्रोण) ११२.४४ संहिताध्यायिना भाव्य (अनु) १४३ ५६ स उपाध्यायेनानुज्ञातः (आ) ३.८१ स एव महतास स न्नासन शोरे (उद्योग) ६४.५१ संहत्य कुर्वते यात्रा (आश्व) ३६.४ संहिता जपता (शाति) १६६.११३ स उपालभ्य भीष्मं च (सभा) ३६३२ स एवमभिनिश्चित्य (शल्य) ३६.३२ सतनव सवास्ता:(वन) २२४.३६ सहत्य धर्म चरतां (शांति) २७०.११ संहृत्य सर्व निज देह (शांति, ३०१.११६ स उताच ततस्ता (अन) १६.१०३ स एवमुक्त उपाध्यायः (ना) २.२१ संसानः शरास्तीक्ष्णा(कणं) २०.१९ सहत्य निहतो वृत्रो (वन) २६२.४ संहृष्टगेमा कौन्तेय (अनु) ४.३८६ स ऋषोन्वाहयामास (अनु) 8. स एवमुक्त उपाध्याय (आ) ३.४१ संसंयुयंदाऽन्योन्यं (वन) २२१.२४ सहरस्व पुनर्देव रूप (आश्व) ५५.६ संहृष्टवदनो राजा (अनु) ५३.१५ स एक एकामासाद्य (आ) १७१.२४ स एवमुक्त उपाध्याय (बा) ३.४८ सस्पस्य तानि चापानि (विरा)४१.१२ संहरस्व पुनर्वाणमवध्यो (वन) १९.२३ संहृष्टा: पाण्डवा (वन) १९१.३४ स एकः समरे तस्थौ भीष्म १०४.११ स एवमुक्त उपाध्याये (आ) ३.३३ संस्पृश्यना महिषों (वन) १९२.६८ संहर्ता वृहिणचक्रस्य (स्त्री) २५.४६ संहृष्टः पार्षदैर्जुष्टं नृत्य(अनु)१६.१७ स एव च यदा राजन्(शांति)३००.२० स एवमुक्तः पोष्यः (बा) ३.१०७ संस्पृष्टः स्थाणुना (कर्ण) ३४.१५१ संतुन च मे काम (होण) ५३.३ संहते परमारऽसि (सौतिक) १५.३ स एव त्वं स एवाहं (शांति) ३६४.८ स एवमुक्त: प्रत्युवाच (बा) ३.११ Jain Education Intersalon For Private Personel Use Only www.alinelibrary.org

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