Book Title: Mahabharatam
Author(s): Nagsharan Sinh, 
Publisher: Nag Prakashan Delhi

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Page 749
________________ श्रीमन्महाभारतम् :: श्लोकानुक्रमणी ७४ सञ्चिन्त्य निपुण बुद्धया (कर्ण) ८.७ सच्छिद्य चापानि च (भीष्म) ८५.२ समये प्रतियाते तु (उद्योग) ७२.१ संजीवन दुबंर्ष (आश्व) ६७.१५ सतत धावमानश्च (वन) १८६.१२४ संचिन्त्येवं तदा राजा (आ) ६३.५२ संच्छिद्यमानमिषभिर (आ) २२८.२८ सञ्जयेमे महीपाला: शूर(भीष्म) ४.३ संजोवितश्चापि पुनर्वास (शांति) ३१.४१ सततं निग्रहे युक्त (उद्योग) १२६.३४ सञ्चिन्स्योरेण तपसा (शांति)२८६.१६ संछिन्नभिन्नकवचं (कर्ण) ६५.२६ संजयैव गते प्राणां (आ) १.२२० संजीवितोऽह भवता (आश्व) ६.२० सततं निरयं प्राप्ताः (आ) ११.३७ साञ्चेन्वानकमेवन (शांति) १७५.१६ संछिन्नभिन्नध्वजिन (द्रोण) १७६.११ सञ्जयो नामतश्च (उद्योग) १३४.७ संजीव्य कालयिष्टं (आश्व) ५.१२ सततं यः क्षमाशीलः (वन) १४१.१३ संचिनवानकमेवनं (शांति) ३२१.२० संच्छिन्नभूजनागेन्द्रां (कणं) ७७.४१ संजयो नृपतेनंता (आश्रम) ३७.१७ संजुहावात्मनात्मान (अनु) ८५.६३ सततं यश्च कामार्थी (वन) ३३.२६ संचिन्वानकमेवेनं (शांति) ३३०.२४ साछन्स राश्मयाकाक्षान् (कण) ९.१० समयोऽयं भूमिपते (उद्योग) ३२.५ सजयनाथगान्धाया (आयम) ३.२१ सतत स्मानमोचन्तस्त कर संचकोच महाराज (भीम) १५.५७ सजशें रणभूमी तु (शल्प) ६.२६ सञ्जयोऽयं महाराज (उद्योग)५०.१२ संज्ञं च स पुनलवा (वन) २६७.६४ स ततः शतसाहन (आ) ३०.२४ सञ्चोदनाभिर्मति (शांति) ३०६.११ स सञ्जय महाप्रज्ञो (भीम) ४६.१६ सञ्जयो विदुर प्राप्तो (उद्योग) ३३.६ संज्ञा चोपालभद्वीरः (भीष्म) ११६.६४ स ततः सिंहता नीतो(शांति) ११७.६ सचोदितास्तुम्बुरुणा (मभा) ४.३६ संजयं च महात्मानं (आश्रम) ३.५६ संजयोऽह क्षितिपते (कर्ण) २.५ सज्ञामोहश्च पततां (वन) २६१.३१ स ततस्तानि जग्राह (अनु) ४२.१५ सञ्चादिता मदनावा (भाष्म)६४.४६ सजयं च महाभाग(उद्योग)१३१.१५ सम्जयाह भूमिपत (उद्याग) २२.५ संजालोपो निरूक्ष्मत्वं (शांति) ३१७.१६ स तता ब्राह्मणी (शाति) १२४.२५ संछन्नः स तु वाताभि(आ) १३७.२१ संजयं प्रेषयामास (आ) २.२२६ सम्जयोऽह महाराज (भीष्म) १३.३ सटक शिवरा भग्ना:(गांति)२२७.७६ स तत् कम महत (वन) २७१.२३ संच्छन्ना वसुधा तत्र (दोन) १२१२४ संजयश्च सहामात्यो (आ) २.३५० सम्महारास्त्रमथ तत (वन) २४५.२६ स होण्दुभं परित्यज्य (आ) ११.१२ स तत्कुणपदुर्गन्धमजीव (स्वर्ग) २.२२ संच्छाबमानो ब्रह्मषि (शांति) २३.३५ सजगश्चेतना लळवा(उद्योग)५०.१४ राजहुः अद्भुतानश्वान् विना२४५.५° स तच्छरी सन्त्यज्य (वन) २२२.१३ स तस्कृत्वा प्राप्तकाल (मो) ७.७६ संच्छिन्ना नेमिभिश्चय (द्रोण) १९६.१७ सञ्जयः सहदश्चान्ये (स्त्री) ८.३ राजतिप्रत्यपाताव (कण) ९६.४० स तच्छिरो वेगवय (शल्य) २८.६३ स तत्कृत्वा राजपुत्रस्त (कर्ण) ८३.२ सच्छिन्ना नामभिश्चव(द्राण)१९६.१७ सम्जयस्य वचः बत्वा (उद्योग)... सजातमुपजावन्स (शाति) ७.२३ स तच्छ वा बाषिरुपा (मा) ३.२५ स तत्प्रविश्याशिव (सोष्तिक) १०.३० संछन्नं शरालेन रथं (द्रोण) ६३.२० सञ्जयस्प श्रुतं वाक्यं (उद्योग) ७३.१ संजातरुधिरराचाजो (द्रोण ) ११६.४१ सततं कीर्तयन्तो मां (भीष्य) ३३.१४ स तत्र काञ्चनं दिव्यं (अनु) १६.६१ संछिदता महाराज (कर्ण) ७८.४७ सजयाचक्ष्वं मे शरं (उद्योग)५१.१५ पजातरुधिरोपीहः (भीष्म) ६४.४८ सततं कृष्ययः संख्ये (द्रोण) १४.३ स तत्र गत्वा तस्वाहानाय(वा) ३.२७ संछाबमान: कौन्तेयः (द्रोण) १४६.७९ सञ्जयांचाच येनास्मान(उद्योग)५०.६ जातरुधिरोत्पीडा (भाष्म) ६४.३३ सततं च त्वमश्रोषीर्वचन (कर्ण)४१.७६ स तत्र गत्वा शनयो(भ,म) ५४.१०१ संछाद्यमानं समरे द्रोग (द्रोण २१.१३ सम्याधिरषिर्वीरः (कर्ण) ... जातरुधिरोत्पीडो (भीष्म) ६५.४३ सततं चाज्यधाराभि (आ) २२३.६५ स तत्र तामयधनुर्धर (वन)११७.१. संछाचमानः सहसा (कर्ण) २४.२० सम्भवेदं वाचो बूया (उद्योग) ५६.१५ सम्मानस्तस्य चात्मान(उद्योग)७६.१६ सतत चानुरक्तो वो (द्रोण) १५३.४१ स तत्र तामुषित्वैका (वन) ११५.१ For P 5 Personal use www.janelibrary.org

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