Book Title: Madanjuddh Kavya
Author(s): Buchraj Mahakavi, Vidyavati Jain
Publisher: Bharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad

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Page 131
________________ मदनजुद्ध काव्य कुलकर कहलाए 1 तृतीयकाल की समाप्तिके पूर्व ही ३ वर्ष ८ मास, १५ दिन शेष रहने पर ही प्रभु मोक्ष चले गए 1 कलिकालकी यह शुभपति हो गई इसीलिए मोक्ष का मार्ग प्रशसा हो गया . आसरठ उहिउ सब विधि समत्यु रणमज्झि भिडिउ करि उन्म हत्यु संवरु बलु आणिवि ताप घित्ति तिसु कोइय मूलु उपाटि थित्ति ।। ११६ ।। अर्थ-इसके पश्चात् आस्रव वीर सभी प्रकारसे समर्थ होकर उदित (प्रगट) हुआ और अपने दोनों हाथ जोड़कर युद्धके मध्य जाकर भिड गया, तब संवर नामक वीर अपनी शक्ति लगाकर प्रभु-चित्त में बैठ गया, उस संवरने आस्रवकी स्थिति नष्ट कर, उसकी जड़ ही उखाड़ डाली । व्याख्या-कर्मसिद्धान्त-सम्बन्धी शास्त्रोंका कथन है कि जब प्रभु बारहवें, तेरहवें गणस्थानमें जाते हैं तब वहाँ सातादेदनीय कर्मोका आस्रव होता है । वह आस्रव बीरके समान प्रभुका रास्ता रोककर कहता है कि अभी आप सातावदनीय कर्मोका भोग करें । तब संवर वीर उसे रोकते हुए कहता है कि तुम्हारी तो अब स्थिति ही नहीं रह गई है । तुम ईर्यापथ आस्रव हो, जो शीघ्रही समाप्त हो जाने वाले हो । प्रभुको रोकनेकी अब तुममें सामर्थ्य नहीं है । आत्माका तपोबल ही संवर करता है, जिससे सम्पूर्ण आस्रवोंका अभाव हो जाता है । वहु भिडिय सुभट रणमहि पचारि के मरग्गिय के घल्लिय सुमारि । जे कर्म हुंति दल महि प्रचंष्ठ तप सरि किए ते खंड खंड ।।११७।। अर्थ-बहुत से सुभट रणमें चलकर आ भिड़े । (संवरके सामने आते ही) कई वीर तो स्वयं ही मर गए और कई मार डाले गए, जो घातिया कर्म (मोहको छोड़कर,तीन थे) दलमें प्रचण्ड थे, उनको तप नामके शूरने खण्ड-खण्ड कर दिया । व्याख्या-अज्ञान, अदर्शन, अवीर्य नामके अनेक वीर युद्धभूमिमें आकर लड़ने लगे । उनमेंसे अनेक वीर तो तत्काल ही नष्ट हो गए और कुछ अन्तर्मुहर्तकाल में मर गए । आदीशप्रभु में केवलज्ञान, केवलदर्शन, वीर्य आदि गुण प्रकट हो गए और वे सकलपरमात्मा अर्हन्तदेव बन गए । कर्मसिद्धान्तसे हमें यह शिक्षा मिलती है कि जब तुम अपनी आत्मामें रत्नत्रय, धर्म आदि स्वभावोंको प्रकट करोगे और आदीश्वर प्रभुकी तरह

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