Book Title: Gommatasara Karma kanda
Author(s): Nemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
Publisher: Shivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan

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Page 4
________________ स्वाध्याय बन्द कर दिया। चामुण्डरायने पूछा कि स्वाध्याय क्यों बन्द कर दिया गया? नेमिचन्द्राचार्यले कहा कि आगमग्रन्थोंके स्वाध्यायका अधिकार गृहस्थोंको नहीं है। तब इनका ज्ञान हम गृहस्थोंको कैसे हो सकता है? चामुण्डरायके इस प्रश्न के उत्तर स्वरूप नेमिचन्द्राचार्य ने गोम्मटसारकी रचना की। उक्त कथाका सार मैं तो यह समझा हूँ कि षटवण्डागमकी गूढ़ चर्चाएं सामान्य मनुष्य ग्रहण नहीं कर सकता इसलिये उन गूढ चर्चाओंका सरलीकरण करनेके लिये नेमिचन्द्राचार्यने प्रयास किया और प्रयासका नाम 'गोम्मटसार' प्रचलित हुआ। गोम्मटसार दो भागोंमें विभक्त है-जीवकाण्ड और कर्मकाण्ड । जीवकाण्डमें महाकर्मप्राभृत के सिद्धान्तसम्बन्धी जीवस्थान, क्षुद्रबन्ध, बन्धस्वामित्व, वेदनाखण्ड और वर्गणाखण्डका वर्णन किया गया है और कर्मकाण्डमें महाबन्धका । कर्मकाण्डमें महाब-धके अतिरिक्त षट्खण्डागमके प्रकृतिसमुत्कीर्तन तथा जीवट्टाणचूलिका आदिसे भी कितना ही विषय लिया गया है। जीवकाण्डमें बीस-प्ररूपप्पाओंके माध्यमसे ससारी जीवोंका वर्णन किया गया है और कर्मकाण्डमें कर्मोंकी बन्ध, उदय व सत्त्व आदि अवस्थाओंका वर्णन प्रस्तुत किया गया है। जीवकाण्डमें धवलाकी विभिन्न गाथाएँ संकलित हैं और उनका संकलन इस सुन्दरतासे किया गया है कि वे ग्रन्थका अङ्ग बन गई हैं। ग्यारहवीं शताब्दीके विद्वान् आचार्य नेमिचन्द्रसिद्धान्तचक्रवर्तीने उक्त जीवकाण्ड और कर्मकांड . के अतिरिक्त लब्धिसार, क्षपणासार और त्रिलोकसार ये तीन ग्रन्ध भी बनाये हैं। प्रसन्नताकी बात है कि उक्त पाँचों ही ग्रन्थ हिन्दी अनुवादसहित प्रकाशित हो चुके हैं और तत्त्वजिज्ञासुजनोंके स्वाध्यायमें आ रहे हैं। त्रिलोकसारका नवीन संस्करण पूज्यश्री १०५ विशुद्धमती माताजी के द्वारा संपादित और अनूदित होकर अनेक संदृष्टियोंके साथ शांतिवीरनगरसे प्रकाशित हुआ है। जीवकाण्ड व कर्मकाण्डके नवीनसंस्करण सिद्धान्ताचार्य पं. कैलाशचन्द्रजी द्वारा सम्पादित तथा अनूदित होकर केशववर्णी-कृत टीकाके साथ भारतीयज्ञानपीठसे प्रकाशित हुए हैं। लब्धिसार-क्षपणासार रायचन्द्रग्रन्थमालासे तथा जैन सिद्धान्त प्रकाशिनी संस्था कलकत्तासे प्रकाशित हो चुका है। कर्मकाण्ड का प्रस्तुत संस्करण करणानुयोग के विशिष्ट ज्ञाता श्री रतनचन्द्रजी मुख्तार सहारनपुर के सम्पादकत्वमें अनेक संदृष्टियोंके साथ प्रकाशित हो रहा है। सम्पादकने इस टीका में धवला, जय-धवला तथा महाबन्ध आदिसे विषयोंका मिलानकर विषयको स्पष्ट किया है। ग्रन्थकी टीका आचार्यकल्पश्री श्रुतसागरजी महाराज संघस्थ १०५ आर्यिका श्री आदिमती माताजी ने लिखी कर्मकाण्डमें प्रतिपादित विषयोंसे यह सुनिश्चित कहा जा सकता है कि कर्मसाहित्य का संक्षेपसे साङ्गोपाङ्ग वर्णन करनेवाला यह महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। जबतक कर्मप्रकृतियोंके आसव-बन्ध तथा उनके कारणोंका परिज्ञान नहीं होता तब तक उनकी निवृत्ति का उपाय नहीं किया जा सकता है।

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