Book Title: Gnatadharmkathanga Sutram Part 01
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: A B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
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ज्ञाताधर्मकथाङ्गना वर्मास्वामी जम्बू स्वामिनमाह-एवं खलु जम्बू इत्यादि
मूलम् ---एव खल्लु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं चपानाम नयरी होत्था वन्नओ, तीसेणं चंपाए नयरीए बहिया उत्तर पुरस्थिमे दिसिभाए सुभूमिमाए नामं उज्जाणे होत्था, सव्वोउ य पुप्फफलसमिद्धे सुरम्से नंदणवणे इव सुह सुरभिसीयलच्छायाए समणुबद्ध, तस्स णं सुभूमिभागस्त उज्जाणस्स उत्तरओ एगदेसमि माल्लुया कच्छए वन्नओ, तत्थ ण एगा वणमऊरी दो पुटे परियागये पिछुडी पंडुरे निव्वणे निरुवहए भिन्नमुट्रिप्पमाणे मऊरी अंडए पसवइ पसवित्ता सएणं पक्खवाएणं सारक्खमाणी संगो. वमाणी संविट्रेमाणी विहरइ. ॥ सू. २॥ __'एवं खलु जम्बू:, इत्यादि
टीका--तस्मिन काले तस्मिन् समये चस्मानाम नगरी आसीत्, वर्णका वर्णनग्रन्थः चम्पानगर्या वणनं प्रागुक्तम्, 'तीसेणं' तस्याश्चम्पाया
टीकार्थ--(भंते) हे भदत ( जइणं समणेणं भगवया महावीरेणं ) यदि श्रमण भगवान महावीरने (व्हायाधम्मकहाणं विइय अज्झयणस्स) ज्ञाता धर्म कथा के द्वितीय अध्ययन का (अयमढे पणत्ते) यह भाव-अर्थ प्ररूपित किया है तो (तअस्स णं भते ! मायज्झयणम्स के अढे पण्णरो ) तृतीय ज्ञाताध्ययन का क्या अर्थ प्रकट किया हैं। इस प्रकार जंबू स्वामी की वात सुनकर सुधर्मा स्वामींने उनसे कहा कि-"मू. १"
टोकाथ-(भंते) 3 rd! (जइणं समणेणं भगवया महावीरेणं श्रम भगवान महावी२ (हायाधम्मकहाणं विइयअज्झयणस्स) ज्ञाता धर्म थाना मीon मध्ययनन। (अयमढे पण्णत्ते) मा माव-म निषित ज्या छ, तो (तइअस्स णं भते ! णायज्झयणस्स के अ? पण्णेत्ते) alon adu मध्ययन। શો અર્થ બતાવ્યું છે? આ રીતે જંબૂ સ્વામીની વાત સાંભળીને સુધર્માસ્વામીએ તેમને કહ્યું–કે પસૂત્ર ૧
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