Book Title: Dhammapada 11
Author(s): Osho Rajnish
Publisher: Rebel Publishing House Puna

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Page 298
________________ समाधि के सूत्र : एकांत, मौन, ध्यान क्षणभर को तुम्हारा तराजू भी थिर हो सकता है, जब न तुम इस तरफ झुके, न उस तरफ झुके। __रस्सी पर चलते किसी नट को देखा है! वही कला समता को पाने की कला है। ठीक मध्य में है। जरा यहां-वहां हुआ कि गिरेगा। अगर जरा बाएं की तरफ झुक जाता है, तो खतरा। दाएं तरफ झुक जाता है, तो खतरा। अगर बाएं तरफ झुक जाता है नट, तो तत्क्षण अपने को दाएं तरफ झुका लेता है, ताकि संतुलन फिर कायम हो जाए। दाएं तरफ झुकने लगता है, तो बाएं तरफ झुका लेता है, ताकि फिर संतुलन कायम हो जाए। नट प्रतिपल बाएं-दाएं के बीच अपने को मध्य में सम्हालता है। बुद्ध ने कहा है : ध्यान की प्रक्रिया रस्सी पर चलने जैसी प्रक्रिया है। ध्यान का अर्थ है : अभी कुछ-कुछ झुकना हो रहा है, कभी बाएं, कभी दाएं; कभी दाएं, कभी बाएं। समाधि का अर्थ है : अब कहीं भी झुकना नहीं हो रहा है। समता थिर हो गयी। ध्यान उपाय है; समाधि अंतिम फल है। ध्यान के वृक्ष पर समाधि का फूल खिलता है। ___ यह जो समता है, इसे कभी-कभी क्षणभर को तुम सम्हाल ले सकते हो। और उसी से तुम्हें धर्म का द्वार खुलेगा। कभी बैठे हो शांत, उस क्षण में सम्हालो। चलो रस्सी पर। न सुख से विरोध, न दुख से विरोध। न सुख की आकांक्षा, न दुख की आकांक्षा। ध्यान रखना : अक्सर लोग वही कर लेते हैं, जो नट कर रहा है। जब सुख उन्हें काफी परेशान करने लगता है, चिंताओं से भरने लगता है, तो वे कहते हैं : सुख तो दुख लाता है। इसलिए सुख से उनका विरोध हो जाता है। इन्हीं को तुम त्यागी कहते हो, जिनका सुख से विरोध हो गया है। जिनके मुंह में सुख कडुवा हो गया है। अब ये उलटी आकांक्षा करने लगते हैं, ये दुख की आकांक्षा करने लगते हैं। इस दुख की आकांक्षा से ही तुम्हारी सारी तपश्चर्या निर्मित होती है। पहले ये खोजते थे अच्छी सुख-शय्या। अब खोजते हैं कंकड़-पत्थर, कांटे भरी भूमि! पहले ये खोजते थे सुस्वादु भोजन; अब अगर सुस्वादु भोजन भी मिल जाए, तो उसे पानी में, नदी में जाकर डुबाकर खराब करके फिर स्वीकार करते हैं। पहले खोजते थे रेशमी वस्त्र; अब अगर रेशमी वस्त्र मिल जाएं, तो उनसे दूर भागते हैं। अब इन्हें खुरदरे, गड़ने वाले वस्त्र चाहिए! तुम जानकर चकित होओगे कि त्याग के नाम पर आदमी ने क्या-क्या किया है! अपने को कोड़े मारे हैं; लहूलुहान किया है। ईसाइयों में एक संप्रदाय ही रहा है कोड़े मारने वाले साधुओं का। सुबह उनकी पहली प्रार्थना यही थी कि वे अपने को खड़ा करके नग्न, कोड़े मारें; लहूलुहान कर लें। जो जितने ज्यादा कोड़े मारे, वह उतना बड़ा साधु। और लोग देखने आते! गांवभर की भीड़ लग जाती। यह प्रार्थना का समय साधु का-जब वह कोड़े मारता है-सब देखते। लोगों के देखने के 285

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