Book Title: Chaityavandan Stuti Stavanadi Sangraha Part 01
Author(s): Purvacharya
Publisher: Master Umedchand Raichand
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Achar
४९५
तस अनुसारे गीतारथ कृत, वृत्यादिक विस्तारजी ॥ पंच प्रकारे सज्झाय करें मुनि. पाले पण व्यवहारजी ॥ ३ ॥ देश विरति पंचम गुण ठाणे, पंच पकारे तरीयाजी ॥ मानव गति चौदश गुणठाणा, पंचदश भुमिज वरियाजी ॥ पंचवीस नंदें सुर भाख्या, साचा समकीत धारीजी ॥ शक्ती अनुसार सघला करज्यो, जिनशासन रखवाली जी ॥ ४ ॥ इति ॥
॥ अथ ज्ञानपंचमीनी स्तुति ॥ ॥ श्री तीर्थकर वीर जिणंदा, सिद्धारथ कुल गगन दिणंदा, त्रिशला राणी नंदा ॥ कहे ज्ञानपंचमी दिन सुखकंदा, मति श्रुतावरणी मटे भव फंदा, अ. नाण कुंभी मयंदा ॥ दूग चउ भेद अहावीश वृंदा, समकित मतिथी उल्लसे आनंदा, छेदे दरमति दंदा ॥ चउद नेदे धारो श्रुत चंदा, ज्ञानी दोयना पद अरविंदा, पुजो नाव अमंदा ॥ १ ॥ अवतरिया सवि जगदाधार, अवधिनाण सहित निरधार, पामे परम करार ॥ मागशिर शुदि पंचमी दिन सार, श्रावण शुदि पंचमी सुभवार, सुविधि नेम
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