Book Title: Bruhat Sangrahani
Author(s): Chandrasuri
Publisher: Umedchand Raichand Master
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२१९ अने ( इयरे ) के० समूर्छिम मनुष्यने ( उक्कोसो) के० उत्कृष्टथी जन्ममरणनो विरह ) के० विरहकाल (चउवीस ) के० चोवीस मुहूर्त्तनो जाणवो. वली गर्भज तथा समूर्छिम मनुष्यने ( जन्ममरणेसु ) के० जन्ममरणने विषे विरहकाल ( समओ) के एक समयनो जाणवो. तथा गर्भज अने समूच्छिम मनुष्यनी उपजवानी ( जहप्णसंखा) के० जघन्य संख्या ( सुरसमाणा) के० देवताना सरखी जाणवी. एटले एक समये एक बेत्रणथी आरंभी संख्याता असंख्याता उपजे तथा मरण पामे एम जाणवू. ॥ ३८५ ॥
हवे कयो जीव मरा मनुष्यगतिमां आवे ? ते गतिद्धार कहे छे. सत्तममहिनेईए, तेऊ वाऊ असंख नरतिरिए॥ मुनूण सेसजावा, उप्पज्जंति नरभवंमि ॥ ३८६ ॥ 300 ____ अर्थ-(सत्तममहिनेरईए) के० सातमी नरक पृथ्वीना नारकी, (तेऊ) के० तेउकायना जीवो, (वाऊ) के० वायुना जीवो तेमज ( अमंख नरतिरिए) के० असंख्याता आयुष्याला युगलीया मनुप्य अने तिर्यच. ए पांच जातीना जीवोने (मृत्तूण ) के० मूकीने (सेस जीवा) के० वाकीना सर्वे जीवा (नरभवंमि ) के० मनुष्य भवने विषे ( उप्पज्जति ) के० उपजे छे. ॥ ३८६ ॥ सुरनेरइएहिं चिय, हवंति हरि अरिह चक्कि बलदेवा॥ चउविहसुर चक्किबला,वेमाणिय हुंति हरि अरिहा ॥३८॥ ___अर्थ-(हरि) के० वासुदेव, (अरिह) के० अरिहंत, (चकि) के० चक्रवर्ती अने (बलदेवा ) के० बलदेव ए चार (सुरनेरइएहिं) के० देवता अने नारकीनी गतिथी आवेला (चिय ) के० निश्रे ( हवंति ) के० होय छे. वली ( चक्किबला ) के० चक्रवर्ती तथा

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