Book Title: Bruhat Sangrahani
Author(s): Chandrasuri
Publisher: Umedchand Raichand Master
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२२५ . अनुक्रमे (हुति ) के० थया छे. तथा ( नमिनेमिय) के० नमिनाथ अने नेमनाथना वचमां ( जयनामा) के० जय नामनो चक्रवर्ती थयो छे. अने (नेमिपासंतरे ) के० नेमनाथ तथा पार्श्वनाथना वचमां (बंभो ) के० ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती थयो छे. ॥ ३९९॥ ___ हवे वासुदेवनां सात रत्न कहे छे. चकं धणुहं खग्गो, मणी गया तहय होइ वणमाला ॥ संखो सत्त इमाई, रयणाई वासुदेवस्स ॥ ४०० ॥ ३०?
अर्थ-(चकं ) के० चक्र, (धणुहं ) के० धनुष्य, (खग्गो) के० खड्ग, (मणी) के० मणि, (गया) के० गदा, (तहय) के० तेमज (वणमाला) के वनमाला अने ( संखो) के० संख-(इमाई) के० ए (सत्तरयणाई) के० सात रत्न (वासुदेवस्स ) के० वासुदेवनां (होइ) के० होय छे. ॥ ४०० ॥ .... जंबुद्धीपमा उत्कृष्टथी अने जघन्यथी एक वखते केटलां रत्न होय ते कहे छे. जंबूदीवे चउरो, सयाई वीसुत्तराई उक्कोसं ॥ रयणाई जहन्नं पुण, हुंति विदेहमि छप्पन्ना ॥ ४०१॥ . अर्थ-(जंबूद्दीवे) के० जंबुद्धीपने विषे (उक्कोसं) के० उत्कृपृथी (चउरो सयाई) के पारसो अने (वीसुतराई ) के० वीश अधिक एटले चारसो वीश ( रयणाई ) के० रत्नो होय छे. (पुण) के० वली ( जहन) के० जघन्यथी (विदेहमि ) के० महाविदेह क्षेत्रमा (छप्पन्ना) के० छप्पनरत्न हुंति के होय छे.(उत्कृष्टा त्रीश चक्रवर्ती होय त्यारे चारसो वीश अने जघन्यथी चार होय त्यारे छप्पन रत्न होय छे. ॥ ४०१ ॥ मनुष्यनुं गतिद्वार पूर्ण थयु.

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