Book Title: Barsasutra
Author(s): Dipak Jyoti Jain Sangh Mumbai
Publisher: Dipak Jyoti Jain Sangh Mumbai

View full book text
Previous | Next

Page 175
________________ 405 और स्थवीर प्रभास ये दोनों स्थवीरों ने तीन सौ तीन सौ श्रमणों को वाचना दी थी, इस कारण से हे आर्यो ऐसा कहा जाता हैं कि श्रमण भगवान महावीर के नव गण और ग्यारह गणधर थे । (२०३) श्रमण भगवान महावीर के ये सब ग्यारह गणधर द्वादशांगी के ज्ञाता थे, चौदह पूर्व के वेत्ता थे और • समग्र गणि पिटक के धारक थे। वे सब पानी बिना एक महिना का अनशन कर राजगृह नगर में काल धर्म पाये यावत् सर्व दुःखों से मुक्त हुए। श्री महावीर 'प्रभु' के मोक्ष में जाने के पश्चात् स्थवीर इन्द्रभूति और आर्य सुधर्मा ये दोनों स्थवीर परिनिर्वाण पाये । (२०४) जो इस समय श्रमण निर्ग्रन्थ विचरण करते है-विद्यमान है वे सब आर्य सुधर्मा अनगार के संतान है यानी इनकी शिष्य संतान की परंपरा के है शेष सभी गणधर शिष्य संतान बिना के विच्छेद पाये थे । (२०५) श्रमण भगवान महावीर काश्यप गौत्रीय थे के अंते वासी शिष्य थे। । उनके अग्निवेशायन गौत्रीय स्थवीर आर्य सुधर्मा नाम ation Inters For Private & Personal Use Only 169 404500 40 500 405

Loading...

Page Navigation
1 ... 173 174 175 176 177 178 179 180 181 182 183 184 185 186 187 188 189 190 191 192 193 194 195 196 197 198 199 200 201 202 203 204 205 206 207 208 209 210 211 212 213 214 215 216 217 218 219 220 221 222 223 224