Book Title: Kasaypahudam Part 14
Author(s): Gundharacharya, Fulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
Publisher: Bharatvarshiya Digambar Jain Sangh
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पढमसमए णिवत्तिदअपुव्वफद्दयपरूवणा गमणदंसणादो । एवमेदेसि पमाणपरूवणं कादूण संपहि एदेसिं चेव सरूवविसेसावहारणद्वमविभागपडिच्छेदप्पाबहुअं परूवेमाणो सुत्तपबंधमुत्तरं भणइ_ * पढमसमए जाणि अपुव्वफद्दयाणि तत्थ पढमस्स फद्दयस्स आदिवग्गणाए अविभागपडिच्छेदग्गं थोवं ।
६४५७. पढमसमए णिव्वत्तिदाणमपुव्वफद्दयाणं मझे जं पढमं फद्दयं तदादिवग्गणाए अविभागपडिच्छेदसमूहो सव्वजीवेहितो अणंतगुणपमाणो होदूण उवरिमपदावेक्खाए थोवो त्ति भणिदं होइ ?
*विदियस्स फद्दयस्स आदिवग्गणाए अविभागपडिच्छेदमणंतभागुत्तरं।
5 ४५८. एत्थेवं सुत्तत्थपरूवणा कायव्वा--अणंता भागा अणंता भागा अणंतभागेहिं उत्तरमणंतभागुत्तरं अणंतभागन्महियमिदि वुत्तं होइ । पढमस्स फद्दयस्स सरिसधणियसव्वपरमाणणमविभागपडिच्छेदसमूहमेगपुंज कादण तत्तो विदियफद्दयादिवग्गणाए सरिसधणियसव्वाविभागपडिच्छेदसमूहो किंचूणदुगुणपमाणत्तादो अणंतभागुत्तरो होदि त्ति एसो एत्थ सुत्तत्थसंगहो ।
४५९. संपहि एदस्सेवत्थस्स फुडीकरणं वत्तइस्सामो। तं जहा--पढमफदयस्स आदिवग्गणायामादो विदियफद्दयादिवग्गणायामो विसेसहीणो होदि, स्थानान्तरसम्बन्धी स्पर्धकोंके भाजित करनेपर इनके प्रमाणका आगमन देखा जाता है। इस प्रकार इनके प्रमाणका कथन करके अब इनके ही स्वरूपविशेषका अवधारण करनेके लिए अविभागप्रतिच्छेदोंके अल्पबहुत्वका प्ररूपण करते हुए आगेके सूत्रप्रबन्धको कहते हैं
* प्रथम समयमें जो अपूर्व स्पर्धक निष्पन्न होते हैं उनमेंसे प्रथम स्पर्धककी आदिवर्गणाका अविभागप्रतिच्छेदपुंज सबसे स्तोक है।।
$ ४५७. प्रथम समयमें निष्पन्न हुए अपूर्वस्पर्धकोंमें जो प्रथम स्पर्धक है उसकी आदिवर्गणाके अविभागप्रतिच्छेदका समूह सब जीवोंसे अनन्तगुणा होकर उपरिमपदकी अपेक्षा सबसे थोड़ा है यह उक्त कथनका तात्पर्य है।
* दूसरे स्पर्धककी आदि वर्गणाके अविभागप्रतिच्छेद अनन्तवें मागप्रमाण अधिक हैं।
६४५८. यहाँ इस प्रकार सूत्रकी प्ररूपणा करनी चाहिये-अनन्तबहुभाग अनन्तबहुभाग इस प्रकार अनन्तबहुभागसे उत्तर अनन्तभागोत्तर कहलाता है। अनन्तभाग अधिक हैं यह इसका तात्पर्य है, क्योंकि प्रथम स्पर्धकके सदृश धनवाले परमाणुओंके अविभागप्रतिच्छेदोंके समूहको एक पुज करके उससे दूसरे स्पर्धकको आदिवर्गणाके सदृश धनवाले सब परमाणुओंका अविभागप्रतिच्छेदसमूह कुछ कम दूने प्रमाणवाला होनेसे अनन्तभागोत्तर है यह यहाँपर सूत्रका समुच्चय रूप अर्थ है।
४५९. अब इसी अर्थका स्पष्टीकरण बतलावेंगे। वह जैसे-प्रथम स्पर्धककी आदिवर्गणा के आयामसे दूसरे स्पर्धककी आदि वगंणाका आयाम विशेष हीन होता है, क्योंकि एक स्पर्धककी