Book Title: Kasaypahudam Part 14
Author(s): Gundharacharya, Fulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
Publisher: Bharatvarshiya Digambar Jain Sangh

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Page 407
________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे एत्थ सुत्तत्थसंगहो। संपहि तेसु चेवापुव्वफद्दएसु आदिवग्गणाणमविभागपडिच्छेदा एदेण सरूवेणावचिट्ठति त्ति जाणावणद्वमुत्तरसुत्तमोइण्णं * चरिमसमए लोभस्स अपुव्वफद्दयाणमादिवग्गणाए अविभागपलिच्छेदग्गं थोवं । विदियस्स अपुवफदयस्स आदिवग्गणाए अविभागपडिच्छेदग्गं दुगुणं । तदियस्स अपुग्वफद्दयस्स आदिवग्गणाए अविभागपडिच्छेदग्गं तिगुणं । ६५१७. एवं पढमस्स अपुव्वफद्दयस्स आदिवग्गणाए अविभागपडिच्छेदग्गमुद्दिस्सदि-तदित्थफद्दयस्स आदिवग्गणाए अविभागपडिच्छेदग्गं तदिगुणं । एदं च आदिवग्गणाणमविभागपडिच्छेदप्पाबहुअं सरिसधणियपरिच्चागेण एगेगपरमाणुधरिदाविभागपलिच्छेदे चेव घेत्तूण परूविदमिदि दट्ठव्वं, तहाविहविवक्खाए जहण्णफद्दयादिवग्गणादो विदियादिफद्दयादिवग्गणाणं जहाकम दुगुणतिगुणादिकमेणावट्ठाणसिद्धीए णिव्वाहमुवलंभादो। सरिसधणियविवक्खाए पुण णेदमप्पाबहुअं होइ, तत्थ किंचूणदुगुणादिकमेणादिवग्गणाणमवट्ठाणदंसणादो। अणंतराणंतरादो पुण अणंताभागुत्तरादिकमेण पुव्वुत्तमेवप्पाबहुअं होदि त्ति घेत्तव्वं । सेसं सुगमं । संपहि जहा लोभसंजलणमहिकिच्च अप्पाबहुअमेदं परूविदं तहा चेव सेससंजलणाणं पि पादेक्कणिरु भणं कादूण अर्थका समुच्चय है। अब उन्हीं अपूर्व स्पर्धकोसम्बन्धी आदि वर्गणाओंके अविभागप्रतिच्छेद इस रूपसे अवस्थित रहते हैं इस बातका ज्ञान करानेके लिये आगेका सूत्र आया है * अन्तिम समयमें लोभकी आदि वर्गणामें अविभागप्रतिच्छेदपुंज थोड़ा होता है। उससे दूसरे अपूर्व स्पर्धककी आदि वर्गणामें अविभागप्रतिच्छेदपुज ना होता है। उससे तीसरे अपूर्व स्पर्धककी आदि वर्गणामें अविभागप्रतिच्छेदपुज तिगुणा होता है। ६५१७. इस प्रकार प्रथम अपूर्व स्पर्धककी आदि वर्गणाके अविभागप्रदेशपुंज विवक्षित हैं। पुनः वहाँ सम्बन्धी जिस स्पर्धककी आदि वर्गणाके अविभागप्रदेशपुंज हों वह उतना गुणा है। और यह आदि वर्गणाओंके अविभागप्रतिच्छेदोंका अल्पबहुत्व, सदृश धनवाले द्रव्यके त्यागपूर्वक, एक-एक परमाणुमें प्राप्त अविभागप्रतिच्छेदोंको ही ग्रहण कर कहा गया है ऐसा जानना चाहिये, क्योंकि उस प्रकारकी विवक्षामें जघन्य स्पर्धककी आदि वर्गणासे दूसरे आदि स्पर्धकोंकी आदि वर्गणाओंका क्रमसे दुगुणे, तिगुणे आदि क्रमसे अवस्थानकी सिद्धि निर्बाधरूपसे बन जाती है। परन्तु सदृश धनवाले द्रव्यकी विवक्षा करनेपर यह अल्पबहुत्व नहीं बनता, क्योंकि वहाँपर कुछ कम दुगुणे आदि क्रमसे वर्गणाओंका अवस्थान देखा जाता है। परन्तु अनन्तर तदनन्तररूपसे अनन्तभाग अधिक आदिके क्रमसे पूर्वोक्त अल्पबहुत्व ही होता है ऐसा ग्रहण करना चाहिये । शेष कथन सुगम है। अब जिस प्रकार लोभसंज्वलनको अधिकृत कर यह अल्पबहुत्व कहा है उसी प्रकार शेष संज्वलनोंमेंसे भी प्रत्येक संज्वलनको विवक्षित कर यह अल्पबहुत्व कहना चाहिये, १. आ०प्रतौ तदियफद्दयस्स इति पाठः। २. आ०प्रतौ तदियगुणं इति पाठः ।

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