Book Title: Jinagam Katha Sangraha
Author(s): Bechardas Doshi
Publisher: Kasturbhai Lalbhai Smarak Nidhi Ahmedabad
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[२१० ]
अभिसमेसि - ( अभिसमेषि
अभि + सम् + एषि )
जानता है। अमई- (अमतिम् ) दुर्बुद्धि । अम्मयाओ - ( अंविकाः )
माताएँ। अम्मो!'- (अम्ब !) हे माता । अरुचमाणम्मि --- (अरुच्यमाने)
पसन्द नहीं आवे ऐसा। अलोवेमाणा-(अलुम्पमानाः)
लोप नहीं करते हुए। अल्लियावेति-(आलीयते) धुसाड
देता है, रख लेता है। अल्लीण - (आलीनप्रमाणयुक्त
पुच्छः) बरावर लगा हुमा
और प्रमाणयुक्त है पुच्छ जिसका । अल्लेसोहि - (अलेश्यैः ) जिनमें
दूसरे रंग नहीं मिले हों
वैसे [रंगों से 11 अवउडाबंधणं-(दे०)* हाथ को
पीठ के पीछे बांधना ।
अवखित्ते--(अपक्षिप्तः) ललचाया
हुआ । अवदालिय°-(अवदारितवदन
विवरनिर्लालिताप्रजिह्वः) फाडे हुए मुखरूप विवर से, जिसका जिह्वा का अग्र
भाग लटकता है। अवगय० -(अपगततृणप्रदेशवृक्षः) जिस प्रदेश में तृण
और वृक्ष नहीं है । अवहस्थिजण-(अपहस्तयित्वा)
तिरस्कार करके । अवहिए-(अपहृतः) अपहृत। अवहिय ति -(अपहृता इति)
अपहत हुई थी, इस कारण
से ।
अवंगुयदुवारे-(अपावृतद्वारः)
जिनका गृहद्वार हमेशा
खुला रहता है। अवियाउरी-(भविजनयित्री)
जन्म नहीं देनेवाली।
* दे०=देश्य ।
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