Book Title: Jain Sukta Sandoha
Author(s): Kailassagarsuri
Publisher: Kailas Kanchan Bhavsagar Shraman Sangh Seva Trust Mumbai
View full book text
________________
Sa
an kan
条条密密密密密密落落落落落落落落婆亲密亲密亲密部部
सङ्गाद् भवन्त्यसन्तोऽपि रागद्वेषादयो द्विषः । मुनेरपि चलेच्चेतो यत् तेनान्दोलितात्मनः ॥४॥ योद्वि० प्र.लो. १०९ धर्मार्थ यस्य वित्तेहा, तस्यानीहा गरीयसी । प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य, दादस्पर्शनं वरम् ।।५।। पराशरस्मृति ग्लो. २३३ परिग्रहार्थमारम्भमसंतोषाद्वितन्वते । संसारवृद्धिस्तेनैव, गृहीत तदिदं व्रतम् ।।६॥ उ० भा० अ० व्या०१०९ दोससयमूलजालं, पुवरिसिचिव जिय जइ यं तं । अत्थं वहसि अणथं कीस अणत्यं तव चरसि ॥७॥ संग्रहे साग्रहाः सन्ति, कीटाद्या अपि कोटिशः । दानेऽतिविदुराः प्रायो देवा अपि न केचन ॥८॥ सु० पृ० १६८ मृछिन्नधियां सर्व जगदव परिग्रहः । मूल्छेया रहितानां तु, जगदेवापरिग्रहः ॥९।। ज्ञा०प० श्लोक ८ चित्तेऽन्तग्रंथगहने बहिनिग्रंथता वृथा । त्यागात् कंचुकमात्रस्य, भुजङ्गो नहि निर्विपः ॥१०॥ ज्ञा०प० श्लो. ४
२७ पञ्चमहाव्रतभावनाः मनोगुप्त्येषणादेर्याभिः समितिभिः सदा । दृष्टान्नपानग्रहणेनाऽहिंसां भावयेत्सुधीः॥१॥ हास्थलोभभयक्रोधप्रत्याख्यानेनिरन्तरम् । आलोच्य भाषणेनापि, भावयेत् सुनृतं वृतम् ॥ २॥ आलोच्यावग्रह याश्चाऽभीक्ष्णावग्रहयाचनम् । एतावन्मात्रमेवेतदित्यवग्रहधारणम् ॥ ३॥ समानधार्मिकेभ्यश्च तथावग्रहयाचनम् । अनुज्ञाषितपानानासनमस्तेयभावना ॥ ४ ॥ स्वीपण्डपशुमद्वेश्मासनकुड्यान्तरोज्झनात् । सरागस्वीस्थात्यागात् प्राग्रतस्मृतिवर्जनात् ।। ५ ॥ स्त्रीरम्याङ्गेक्षणस्वाङ्ग संस्कारपरिवर्जनात् । प्रणीतात्यशनत्यागाद्ब्रह्मचर्य तु भावयेत् ॥६॥
*-88-93-93-9-2009888888***-
**-98888
For Private And Personal Use Only

Page Navigation
1 ... 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112 113 114 115 116 117 118 119 120 121 122 123 124 125 126 127 128 129 130 131 132 133 134 135 136 137 138 139 140 141 142 143 144 145 146 147 148 149 150 151 152 153 154 155 156 157 158 159 160 161 162 163 164 165 166 167 168 169 170 171 172 173 174 175 176