Book Title: Jain Sukta Sandoha
Author(s): Kailassagarsuri
Publisher: Kailas Kanchan Bhavsagar Shraman Sangh Seva Trust Mumbai

View full book text
Previous | Next

Page 133
________________ ShiMahayeJainrachanaKendra www.sobatrm.org Acha Shail and 张荣盛器際蒂蒂蒂蒂涨涨涨赛赛继游游带涨涨涨器张密资 सुवष्णरुप्पस्स उपन्यया भवे सिया हु केलाससमा असंखया। नरस्स लुद्धस्स न तेहिं किंचिइच्छा हुजागाससमा अणतिया। जहा य अंडप्पभवा बलागा अंडं बलागप्पभवं जहा य । एमेव मोहाययणं खु तण्डं मोहं च तव्हाययणं वयति ॥८॥ निम्ममो निरहंकारो निरसंगो चत्तगाखो । समो य सबभूएसु ससेसु थावरेसु य ।। ८१ ।। उ० अ० १९ नत्थि चरितं सम्मत्तविहणं दसणे उ भइयत्वं । सम्मत्तचरित्ताई जुगवं पुवं व सम्मत्तं ॥ ८२ ॥ उ० अ०२८ मिच्छादसणरत्ता सनियाणा हु हिंसगा । इय जे मरंति जीवा तेसिं पुण दुल्लहा बोही ।। ८३ ॥ उ० अ० ३६ सम्मईसणरत्ता अनियाणा मुक्कलेसमोगाढा । इय जे मरंति जीवा सुलहा तेसिं भवे बोही ॥ ८४ ।। उ० अ० ३६ देवदाणवगंधव्या जक्वावस्वसकिन्नरा । बंभयारी-नमसंति दुकरं जे करंति ते ।। ८५ ॥ उ० अ० १६ मा पेह पुरा पणामए अभिकंखे उवहिं धुणित्तए । जो दुमण तेहिं णो गया ते जाणंति समाहिमाहियं ॥८६॥ मू.अ.२ समरेसु अगारेसु संधीसु य महापहे । एगो एगित्थिए सद्धि व चिठे न संलवे ।। ८७ ।। उ० अ०१ जहा कुक्कुडपोयरस निच्चं कुललओ भयं । एवं खु बंभयारिस्स इत्थीविम्गहओ भयं ॥ ८८ ॥ द.अ.८ हत्थपायपडिच्छिन्नं कन्ननासविगप्पिों । अवि वाससई नारिं बंभयारी विवजए ।। ८९ ।। द० अ०८ जहा बिरालावसहस्स मूले न मूसगाणं वसही पसत्था । एमेव इत्थीनिलयस्स मझे न बंभयारिस्स खमो निवासो॥९॥ सव्वं विलवियं गीयं सव्वं नर्से विडं विणा । सब्वे आहरणा भारा सव्वे कामा दुहावहा ॥ ९१ ॥ उ० अ० १३ सल्लं कामा विसं कामा कामा आसीविसोवमा । कामे पत्थेमाणा, अकामा जति दुग्गई ॥ ९२ ॥ उ० अ०९ चीराजिणं निगिणिणं जडी संघाडि मुंडिणं । एयाई पि न तायति दुस्सीलं परियागय ॥ ९३ ॥ ३० अ०५ 张密密密語路带黎黎黎黎黎黎黎藤聽樂器带密密密 For Private And Personal use only

Loading...

Page Navigation
1 ... 131 132 133 134 135 136 137 138 139 140 141 142 143 144 145 146 147 148 149 150 151 152 153 154 155 156 157 158 159 160 161 162 163 164 165 166 167 168 169 170 171 172 173 174 175 176