Book Title: Bramhavilas
Author(s): Nathuram Premi
Publisher: Jain Granth Ratnakar Karyalay

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Page 270
________________ wwwwwwwwww recerc a PREPARWRRORDPORNSRPEPARAMEnweness १२६४ ब्रह्मविलासमे • कहा होय नित रटै राम मुख पठका । जो वस नाही तोहि पसेरी अठ्ठका ॥ २८ ॥ कहा मुंडाये मूंड बसे कहा महका । कहा नहाये गंग नदीके तट्टका ।। कहा कथाके सुने वचनके पढका। जो वस नाही तोहि पसेरी अहका ॥ २९ ॥ चौपाई १६ मात्रा. है कहा कहों जियकी जड़ताई । मोपें कछु वरनी नहिं जाई॥ आरज खंड मनुष्यभव पायो । सो विपयनसँग खेल गमायो॥३०॥ से आगे कहो कौन गति जैहो । ऐसे जनम बहुर कहाँ पैहो । इ अरे तू मूरख चेत सवेरे । आवत काल छिनहि छिन नेरे ॥३१॥ है जवलों जमकी फौज न आवै । तवलों जो मनको समुझावै ॥ आतम तत्त्व सिद्धसम राजै । ताहि विलोक मर्नभय भाजै ॥३२॥ वहुत बात कहिये कहु केती । कारज एक ब्रह्म ही सेती॥ ( ब्रह्म लखै सो ही सुख पावै । भैया सो परब्रह्म कहावै ॥ ३३ ॥ चौपाई १५ मात्रा. नगर आगरे जैनी बसे। गुण मणिरिद्ध वृद्धि कर लसै ॥ तिहँ थानक मन ब्रह्म प्रकाश। रचना कही 'भगोतीदास' ३४ - इति मनबत्तीसी। soodsalterede productos PADMADRAGEANUANVEGaulterawpowessivertervavecocsexystewwwwwwwwwwwww ___ अथ स्वभबत्तीसी लिख्यते। दोहा. स्वपनेवत संसारमें जागे श्रीजिनराय ।। तिनके चरन चितारके, वंदत हों मन लाय ॥१॥ (१) आठ पसेरीका मन । WardPREPARMANPATRISMANARDARPARIVARIES

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