Book Title: Apbhramsa Kavya Saurabh
Author(s): Kamalchand Sogani
Publisher: Apbhramsa Sahitya Academy

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Page 12
________________ पाठ-1 पउमचरिउ सन्धि-22 अपने घर पहुँचे हुए कोशलनगर (अयोध्या) के (राज-) पुत्र, राजा (राम) के द्वारा पत्नि-सहित अषाढ़ की अष्टमी के दिन जिनेन्द्र का अभिषेक किया गया । 22.1 [1] देवताओं के साथ हजारों युद्धों में कठिनाई से मारे जानेवाले दशरथ के द्वारा (भी) जिनेन्द्र का अभिषेक किया गया। [2] (अभिषेक के पश्चात्) जिनेश्वर के तन को धोनेवाला दिव्य गन्धोदक (सुगन्धित जल) देवियों (राज-पत्नियों) के लिए (कञ्चुकी के साथ) भेजा गया। [3] कञ्चुकी केवल (रानी) सुप्रभा के (पास) नहीं पहुंचा। हर्ष से पुलकित शरीरवाला स्वामी (राजा) कहता है-[4] "हे (सुडोल) स्त्री ! कहो (तुम) मन में दुःखी क्यों (हो) ? (और) पुरानी चित्रित भीत की तरह स्थिर (और) निस्तेज (क्यों हो)?[5] (राजा को) प्रणाम करके सुप्रभा के द्वारा कहा जाता है-हे प्रभु ! मेरे सम्बन्ध में चर्चा से क्या (लाभ)? [6] हे देव ! यदि मैं (सुप्रभा) भी इस प्रकार (आपके लिए) प्राणों से प्यारी (होती), तो (सुप्रभा) गन्धोदक क्यों नहीं पाती ? [7] उसी समय पर कञ्चुकी (जिसका) मुख शरद (ऋतु) की पूर्णिमा के चन्द्रमा की तरह (वृद्धावस्था के द्वारा) निरन्तर सफेद किया गया (था)। [8] (जिसका) दन्त (-समुह) टूट गया (था), (जो) जड़ (था), (जिसके) हाथ में लकड़ी (थी), (जिसके द्वारा) पथ नहीं देखा गया, (जिसकी) वाणी लड़खड़ाती हुई (थी) (सुप्रभा के) पास पहुँचा। पत्ता-दशरथ के द्वारा (कञ्चुकी) निन्दा किया गया (और कहा गया कि) हे कञ्चुकी ! तुम्हारे द्वारा देर क्यों की गई ? (जिससे) सुप्रभा के द्वारा जिन-वचन के सदृश गन्धोदक शीघ्र नहीं पाया गया । 22.2 [1] (राजा को) प्रणाम करके, उसके द्वारा भी इस प्रकार कहा गया-हे देव ! (मेरे) दिन चले गये, यौवन खिसक गया, [2] बुढ़ापा प्रारम्भिक आयु (युवावस्था) को सफेद करता हुआ पा गया, और कुलटा (स्त्री) की तरह सिर पर चढ़ा हुया विद्यमान है । [3] गति टूट गई (है), हड्डियों के जोड़ों के बन्धन खुल गये (हैं), कान सुनते नहीं हैं), प्रांखें बिल्कुल अन्धी (हैं)। [4] सिर हिलता है, मुख में वाणी लड़खड़ाती है । दाँत घट गये (हैं), शरीर की कान्ति नष्ट हो चुकी (है) । [5] खून क्षीण हो चुका (है); केवल अपभ्रंश काव्य सौरभ ] [ 3 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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