Book Title: Anusandhan 1995 00 SrNo 05
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

View full book text
Previous | Next

Page 9
________________ (२) "धूमावली"- प्रकरणम् ॥ असुरिंदसुरिंदाणं किनरगंधव्वचंदसूराणं। विज्जाहरियसुराणं सजोगसिद्धाण सिद्धाणं॥१॥ मुणियपरमत्थवित्थर-विगिट्ठविविहतवसोसियंगाणं । सिद्धिवहुनिब्भस्कंठियाण जोगीसराणं च॥२॥ जे पुज्जा भगवंतो तित्थयरा रागदोसतमरहिया। विणयपणएण तेसिं समुद्धओ मे इमो धूओ ॥३॥ तित्थंकरपडिमाणं कंचणमणिरयणविद्रुममयाणं। तिहुअणविभूसगाणं सासय-सुरवरकाणं च॥४॥ चमरबलिप्पमुहाणं भवणवईणं विचित्तभवणेसु। जाओ य अहोलोए जिणिंदचंदाण पडिमाओ॥५॥ जाओ य तिरियलोए किनरकिंपुरिसभूमिनयरेसु। गंधव्वमहोरगजक्खभूय तह(य)रक्खसाणं च ॥६॥ जाओ य दीवपव्वय-विज्जाहरपवरसिद्धभवणेसु। तह चंदसूरगहरिक्ख-तारगाणं विमाणेसु॥ ७॥ जाओ य उड्डलोए सोहम्मीसाणवरविमाणेसु। जाओ मणोहरसणंकुमारमाहिंदकप्पेसु॥ ८॥ जाओ य बंभलोए-लंतयसुक्के तहा सहस्सारे। आणयपाणयआरण-अच्चुयकप्पेसु जाओ य॥ ९॥ जाओ गेविज्जेसुं जाओ वरविजयवेजयंतेसु। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

Loading...

Page Navigation
1 ... 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 ... 110