Book Title: Anusandhan 1995 00 SrNo 05
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
View full book text
________________
(७७)
पहेलां कदी जोयुं नथी. खोटी किंमत करीए तो अमे पापमां पडीए. आनी साची किंमत कोई करी शके तेम होय तो एक राजा विक्रमादित्य निष्णात रत्नपारखु तरीके एनी ख्याति छे.' ब्राह्मण विक्रम पासे पहोंच्यो. विक्रमे पूछ्युं एटले तेणे रत्न क्यांथी मळ्युं ते जणाव्युं. विश्वास राखी रत्न बे दिवस पूरतुं पोताने सोंपवा विक्रमे तेने संमत कर्यो अने तेने राजप्रासादमां ज राख्यो. बलिराजा सर्वश्रेष्ठ रत्नपारखु होवाथी विक्रम आगिया वेताळने साथै लई तेना उपर सवार थईने पाताळमां बलिराजाना भवनद्वारे आवी पहोंच्यो. त्यां कृष्ण द्वारपाळ हता. तेमणे विक्रमने पूछ्युं, 'शा कामे आव्या छो ?' विक्रमे कह्युं, 'जईने बलिने कहो के महत्त्वने कामे राजा तमने मळवा मागे छे.' कृष्णे बलिने आ संदेशो को एटले बलिए कह्युं, 'आवनारने पूछी जो के ते युधिष्ठिर छे ? केम के राजा तो युधिष्ठिर ज कहेवाय' कृष्णे जई विक्रमने पूछ्युं, एटले विक्रमे कह्युं, 'जईने एम कहो के मंडलेश्वर मळवा मागे छे.' कृष्णे बलिने आ संदेशो कह्यो एटले बलिए पुछाव्युं, 'शुं रावण मळवा मांगे छे ? मंडलेश्वर तो रावण ज कहेवाय !' कृष्णे आ प्रमाणे जणाव्युं एटले विक्रमे कह्युं, 'एम कहो के कुमार मळवा आव्यो छे.' तेना उत्तरमां बलिए पूछाव्युं के 'शुं कार्तिकेय आव्यो छे, लक्ष्मण छे ? पातालवासी नागपुत्र धवलचंद्र छे ? के पछी वालिपुत्र, रामदूत अंगद छे ? कुमारो तो ए ज कहेवाय'. एटले वळी पाछु विक्रमे कहेवराव्यं, 'के दास, सेवक आव्यो छे'. बलिए पार्छु पुछाव्युं, 'शुं हनूमान आव्या छे ? सेवक तो हनूमान ज'. छेवटे विक्रमे कहेवराव्युं, 'कोटवाळ मळवा मागे छे'. बलिए कृष्ण द्वारा पुछाव्यं, 'शुं विक्रम मळवा आव्यो छे ?' विक्रमे हा कही अने आदेश मळतां बलिराजा पासे पहोंच्यो. बलिए पूछयुं, 'तुं रत्ननी किंमत पूछवा आव्यो छे ने?' हा कहीने विक्रमे रत्न देखाड्यं बलिए कयुं, 'युधिष्ठिर आवा अठ्याशी हजार रत्ननुं नित्य सुपात्रोने दान करता. तेमांनुं एक क्यांक दडी गयुं अने छेवटे ब्राह्मणने भोंयमांथी मळ्युं. केम के कालबळे ए बधां रत्नो धरतीमां दटाई गयां. तो विक्रम, तारी तो शी गणना ?' विक्रमे कह्युं, 'साचुं, महाराज, पण मारे जाणवुं छे के युधिष्ठिरने आटली बधी संपत्ति क्यांथी सांपडी हती?' बलिए कह्युं, 'तेना चार भाईओए दिग्विजय करीने ते आणी हती. पहेलांना युगमां चमत्कृत नामना एक दळदरी कथाधारीए रुद्रनी आराधना करी. प्रसन्न थईने रुद्रे कैलासनी पासे एक रत्न - सुर्वणमय नगरीनुं निर्माण करी तेने आपी. चमत्कृते तेनो उपभोग कर्यो. तेना मृत्यु पछी रुद्रे धूळनी वृष्टि करीने ते दाटी दीधी. ज्यारे सहदेव उत्तर दिशामां दिग्विजय माटे गयो त्यारे स्ट्रे पोताना गणोने
Jain Education International
For Private & Personal Use Only
www.jainelibrary.org

Page Navigation
1 ... 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110