Book Title: Anusandhan 1995 00 SrNo 05
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
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(६४)
( ज्योतिर्गमय, विचारवलोणुं - १९९५ पृ.३)
आ वांचतांवार ज सांभर्या प्रसिद्ध जैनाचार्य मल्लवादी गणि. थोडाक वखत अगाऊ प्रकाशित ग्रन्थ 'प्रबन्धचतुष्टय (सं. रमणीक शाह, १९९४) मां आ. मल्लवादीप्रबन्धमां, संघ तथा 'मुनि मल्ल' अदृश्य थयेला 'नयचक्र' ग्रन्थने पाछो प्राप्त करवा काजे सरस्वती देवीनी आराधना करे छे ते प्रसंगमां सरस्वती अने मल्ल वच्चे थयेलो संवाद आ प्रमाणे नोंधायो छे :
आराहेइ य संघो सुयदेवि पूयणाइणा निच्चं । दिन्नुवओगा मल्लं रयणीए सा इमं भणइ ॥ ३५५ 'के मिट्ठा ?' तेणुत्तं 'वल्ला' पुण भणइ देवया एवं । छहि मासेहिं गएहिं 'केणं' ती 'घय-गुलेणु 'त्तं ॥ ३५६
(प्र.च. पृ ३४)
अर्थात्, सरस्वती देवीए रात्रे मल्लने पूछ्युंः 'शुं मीठं ?', 'वाल' छ महिना पछी देवीए पुन: पूछयुं : 'शानी साथे ?' 'घी - गोळनी साथे' - मल्ले कह्युं, अने देवी
प्रसन्न.
मल्लवादी क्षमाश्रमण विक्रमना चोथा पांचमा शतकमां थयेला जैन तार्किक साधु छे. आइन्स्टाईन वीसमा सैकाना यहूदी विज्ञानी छे. प्रतिभा, सैका ओना समयगाळाना गेपने अतिक्रमीने के पूरी दईने क्यारे क्यां केवा समान रूपमा प्रकट थाय छे तेनुं आ एक ज्वलन्त दृष्टांत मानी शकाय .
सवाल एटलो ज के जैन प्रबन्धोमां सचवाएला आवा प्रसंगोने २०-२१ मी सदीनी विद्वानो, पंडितो, इतिहासकारो, तेमज उदारमतवादीओ अत्यार सुधी मल्लवादीना प्रसंगने दन्तकथा, चमत्कारकथा तेमज भाविकोनी आस्थाने आकर्षवा माटेनी एक कल्पित, पाछळना प्रवन्धकारोए उमेरेली घटना स्वरूपे वर्णवे छे तथा स्वीकारे छे.
आवा मित्रोनी दृष्टिमां प्रो. आइन्स्टाईननी उपर्युक्त घटना पण एक, एमनी बौद्धिक प्रतिभाने उपसाववा माटे तेमना भक्तगणे उपजावी काढेली, कल्पित दन्तकथा ज समजवी न जोईए ? के जूनुं तेटलुं गपबाजी अने विज्ञान वैज्ञानिकनुं तेटलं ब्रह्मवचन ? के पछी एमना मते बधां - बन्ने गप्पां ज ?
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