Book Title: Anusandhan 1995 00 SrNo 05
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
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(३४)
वाजिंत्र वाजइ नवनव ताल । देवराइ तिहां बहुलां दान । परीयागत वधारयु वान ।।२८ ।। दश दिवस करइ रातीजगा । नुहंतरीया जन साहम्मी सगा । धर्मगोठिइ इमराति विहाय । परभाति लहिणि (?) देवराय ।।२९ ॥ महापूज आदीसरतणी। गुरुपूजा वली कीधी घणी । वधार्यो जिनतणो भंडार । साधुभक्ति करइ अपार ॥३० ॥ संघ जमाड्यो ऊलटपणइ । भाट भोजक कीरति बहु भणइ । घरे आवी गुस्ने पधरावि । वस्त्र पात्र दीधां वहिरावि ।। ३१ ।। साधर्मिक धरि लहिणी कीध । सेर सेर मोदक वस्त्रादिक दीध । इंणिपरि चुथु व्रत उच्वर्यु । वीरइ सुकृत पोतुं भर्यु ॥३२ ॥ संवत सोल अडतालो जेह । (१६४८) वली लींबडीनइ पाडइ तेह । चैत्य करावी थाप्या स्वामि । आरासमय जिन शांति अभिराम ॥३३ ॥ धन वावर्यु महोत्सव करी । सेठ वीरा कीरति विस्तरी । संवत सोल चउपना सार । (१६५४) माघ वदि एकमनइं १ रविवार ॥३८ ॥
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