Book Title: Anusandhan 1995 00 SrNo 05
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 40
________________ (३३) चोखापुंज नालेर गुंहली। चिहुं दिशि मुंक्या दीपक वली ॥२१ ॥ समोसरण उपरि जिनबिंब । चउमुख मुंक्यो तिहां अविलंब । पहिलं हाथि लेई लांगली। नांदि फीरी मुंकइ ते वली ।।२२।। किरियामां जोईइ जे वेस। वीरइ ते धार्यो सुविशेस। लोक मिल्या तिहां लखगान । धर्मवीवाहनी जांणे जांन ।।२३ ।। आठ थुई वंदावइ देव । नंदीसर (सुत) संभलावइ ततखेव । कहइ गुरु समकित आलाप । टालइ सवि मिथ्यामति व्याप ।।२४।। समकित आलावो ते धरइ । पंड थकी कहीइं नवि फरइ । समकित विण जे व्रत आखडी । बोडइ शिर जेहवी राखडी ॥ २५ ।। भणइ गुरु आलापक सार । वीरो जोडइ हाथ उदार। शीलव्रततणो उच्चार । इंणि परि कीधो जयजयकार ॥२६ ॥ सात खमासण द्यइ चित्त धरी । वास ठवइ गुरु हाथि करी । नित्थारपारग होहु जगीस। इंणि परि द्यइ सुगुरु आसीस ।। २७ ।। सुहव गाय गीत रसाल । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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