Book Title: Anusandhan 1995 00 SrNo 05
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 65
________________ (५८) तथा चाहुः भवित्री भूतानां परिणतिमनालोच्य नियतां पुरा यद्यत्किञ्चिद्विहितमशुभं यौवनमदात्। पुनः प्रत्यासत्रे महति परलौकैकगमने तदेवैकं पुंसां व्यथयति जराजीर्णवपुषाम्॥ -उत्तराध्ययन वृत्ति एम जणाय छे के हारिल वाचक-हरिगुप्त वाचकनी भर्तृहरिना वैराग्य शतक समान आजे अप्राप्त एवी कोई अद्भुत रचना हती, तेमांथी ए सौ पद्यो लेवायां छे. उद्योतन सूरि कृत कुवलयमालाकहा (इ. स. ७७८)नी प्रशस्ति अनुसार हरिगुप्त वाचक हूणराज तोरमाणना गुरु हता. अने एक परंपरा-गाथामां हरिभद्रना अवसाननी मिति सं. ५८५ ई. स. ५२९ अपायेली छे ते हरिभद्रनी न होतां हरिगुप्त वाचकनी होवानो तर्क त्रिपुटी महाराज आदि विद्वानोनो मत छे, जे ठीक जणाय छे. ए लक्षमा लेतां प्रस्तुत अप्राप्त कृति इस्वी. ५००नी आसपासना अरसानी, अने एथी उमास्वातिनी कृतिओ पछी दोढसो एक वर्ष बादनी छे. आ टांकणे उमास्वातिना पृथक् पृथक् कृतिओना पद्यो- मूळमाथी अने उध्धृत थया होय तेवा असली पण अनुपलब्ध कृतिओमांथी अहीं तुलनार्थे रजु करूं छु : दग्धे बीजे यथाऽत्यन्तं, प्रादुर्भवति नाङ्कुरः। कर्मबीजे तथा दग्धे, नारोहति भवाङ्कुरः॥ सभाष्य तत्त्वार्थाधिगमसूत्र क्रोधात् प्रीतिविनाशं मानाद् विनयोपघातमाप्नोति । शाठ्यात्प्रत्ययहानिः सर्वगुणविनाशनं लोभात्।। कलरिभितमधुरगान्धर्वतूर्ययोषिविभूषणरवाद्यैः। श्रोत्रावबद्धहदयो हरिण इव विनाशमुपयाति ।। स्नानाङ्गरागवतिकवर्णकधूपाधिवासपटवासैः। गन्धभ्रमितमनस्को मधुकर इव नाशमुपयाति ॥ मिष्टान्नपानमांसौदनादिमधुररसविषयगृद्धात्मा। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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