Book Title: Anusandhan 1995 00 SrNo 05
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
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(५६)
एमणे ढांक, गिरिनगर, अने मथुरा (ना स्तूपना दर्शनार्थे) यात्राओ करेली. शत्रुजयनी तळेटीमां इ.स. ८१७ थी पहेलां एमना नामथी 'पालित्तपुर' किंवा 'पादलिप्तपुर' (पालित्तानक, पालिताणा)नी स्थापना थयेली. विशेषमा तेमणे शत्रुजय पर जिनालयोनी स्थापना करेली, अने मोटे भागे ए पहाड पर ज सल्लेखना करी काळगति पामेला. त्रीजा पादलिप्तसूरि ते विद्याधरकुलना मंडन गणीना शिष्य हता. निर्वाणकलिका (प्रायः इस्वी ९७५) तेमनी रचना छे. (कर्णाट देशमा) 'मण्णखेड' (अत्यार- 'मळखेड' पहेलानुं 'मान्यखेटक')मा 'कृष्ण भूभुज' एटले के राष्ट्रकूट कृष्ण (तृतीय) ने जे पादलिप्त सूरि मळ्या हशे ते समयनी दृष्टिए आ वीजा पादलिप्त सूरि होवा घटे. तेओ पण शत्रुजय साथे संकळायेला होवानुं लागे छे; केमके शैलीनी दृष्टिए तेमज अंदरनी वस्तुने हिसाबे दशमां शतकमां मूकी शकाय तेवी एक अन्य रचना-पुण्डरीकप्रकीर्णक अपरनाम सारावली-प्रकीर्णक-पण तेमनी ज कृति जणाय छे, जेनो आधार लई शत्रुजयना आदिनाथना बिंबना उध्धारक जावडशाह (प्रायः इस्वी १०००१०५०)ना समयमां थयेला द्वितीय वज्रस्वामीए लघुशनुंजयकल्पनी रचना कोली; अने ए बनेने नजर सामे राखी तपागच्छीय धर्मकीति गणी (पछीथी धर्मघोष सूरि) ए शत्रुजयकल्प (आ.ई.स. १२४) रच्यो अने ए त्रणेना आधारे खरतरगच्छीय जिनप्रभसूरिए स्वरचित कल्पप्रदीप अंतर्गत "शत्रुजय गिरिकल्प"नी इ.स. १३२९ मां रचना करेली. (नामसाम्यने कारणे आ बन्ने पश्चात्कालीन कर्ताओए द्वितीय वज्रने प्राचीन वज्रस्वामी (आर्य वज्र, इस्वीसननी प्रथम शताब्दी) अने तृतीय पादलिप्त सूरिने आदि पादलिप्तसूरि (आ.ई.स. २००-२२५) मानी लीधेला.
विशेष नोंध:- अजितदेवसूरिना मोहोन्मूलनवादस्थलमा जे पादलिप्त सूरिना प्रतिष्ठाकल्पनी वात छे ते आ त्रीजा पादलिप्त सूरिनी रचना होई शके छे; अने त्यां जे हरिभद्रसूरि रचित प्रतिष्ठाकल्पनो उल्लेख छे ते आदि हरिभद्र सूरिनो होय तो पण तेमां जे प्रतिष्ठाविधि बतावी हशे ते मध्यकालीन प्रतिष्ठाग्रन्थोना कथनोनी तुलनामां
घणी सादी अने ढूंकी होवी जोईए. एमना समयमां मध्ययुगथी आरंभायेली अति - विस्तारपूर्ण जटिल अने अनेकविध प्रकारनी सामग्रीओ मांगी लेती स्नानविधिओनी रमझट बोलावी प्राचीन प्रतिमाओने अने तेमना अभिलेखोने घसीने चोपट, लीसालपट करी नाखवानी प्रवृत्तिनो हजी अभाव हतो.
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