Book Title: Anusandhan 1995 00 SrNo 05
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
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(३२)
पोष्यां साधुतणां बहु पात्र ।।१४ ।। शत्रुजय महात्म्य सांभली। ललितप्रभसूरिनइ मुखस्ली । भेटीस्यइ शत्रुज ज्याहरिं। कडाविगइ खास्यि त्याहरइ ॥ १५॥ भलो संवत सोल चुयालीस १६४४ । संघ लेई वीरो सुजगीस। श्री ललितप्रभसूरीश्वर साथि । धर्ममारग वावरतो आथि । १६ । पग पग गुरु भक्ति अणुसरइ । जेह कथन कहइ ते करइ । इंणि परि भेटयो विमलगिरींद । पूज्या रूडई आदि जिणंद ॥१७॥ अनेक सिद्ध थया कांकरइ । वीरो अणसण लेवा करइ । ललितप्रभसूरी कहइ सुणो। फल भावई थयो अणसण तणो ।१८ । काल भाव ओछां संघयण । मन आजनां काचां मयण । तिहां ताई काया नवि पाडवी । धर्मसाधन हुइ जिहां घडी ॥१९ ॥ इम अनुमति गुरुह नवि दीध । वीरइ पण गुस्वयण ज कीध । तव ते लाभ अनेरो धरइ । शीलव्रत लेवा मन करइ ॥ २० ॥ बाजुठइ गुरुलई बइसारि । आगलि समोसरणनई धारि ।
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१. नांदि।
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