Book Title: Anusandhan 1995 00 SrNo 05
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
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(४१)
जिणेवर हिव विवहारि-रासिहि वासिहं आविअउ कम्मि अणंतउ कालु अणंतकाइ कुलि ठाविअउ ॥३ दुविह पुढवि दग तेअ वाय वणस्सइ विगलतिअ जलचर पमुह दु भेअ पज्जत्तापज्जत्त ठिअ इअ अडयाल पयार तिरिअ तणी गइ संकमिउ तह दंसण विण देव हउं असंखभव परिभविउ ।।४ संकड-कुंभीपाय-असिवण-वेअरणी-रसिहं सामलिपत्ति विचित्ति छेअण-पहरण-सयवसिहिं सत्तय लक्ख निवासि जिणवर मई तुम्ह आण-विणु दुसह सहिअ दुहरासि पज्जात्तापज्जत्ति पुणु॥५ भरहेरवइ विदेहि ए तिन्निय पंच य गुणिआ अढाइअ दीवेसुं कम्मभूमि पनरह भणिआ हेमवयं हरिवास तह रम्मय एरनवय चउपण गुणिया वीस तीस हवई दस कुरु साहि।। ६ सत्तसत्त इग पासि सत्त सत्त बीजई गमई हिमगिरि दाढ चउक्कि तिम सिहरी अ सेलिहिं हवइं छपन्नंतर दीव इअ भणिअई जिणसासणिहिं लवण समुद्द-मझारि निवसई सासइ आसणिहिं।। ७ कम्म कम्मह भूमि छपनंतर दीव जुअ पज्जत्तापज्जत्त भेदिहिं बिहुँ आग्गलि बि सय इग सय मुच्छिअ भेअ मिलिअ तिडुत्तर तिनि सय इउ मणुअत्तणि नाह [ह]- उं हिंडिअ तुह पय रहिय॥८
(भाषा) परमाहम्मिअ पंनरस, भवणेसर दस जाणि। सोलह वितर जोइसिअ, चर-थिर दस य वक्खाणि ॥ ९ नव लोगंतिअ किब्बिसिय, तिनि अ कप्पह बार। जिंभय दस गेविज्ज नव, पंचाणुत्तर सार। १०
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