Book Title: Anusandhan 1995 00 SrNo 05
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 37
________________ (३०) वीराकृतसुकुतसंचय चउपई ॥ वीरा सुत ...... ....... सोल सोलत्तरइ जाणि १६१६ । हेममय आभरण जडाव । जिन अंगई कराव्यां सभाव ॥१॥ बिंब भराव्युं रूपातj -द्रव्य खरच्यु अतिघj प्रतिष्ठा करावीया सार। विद्याप्रभसूरि गुरुपधरावि ॥२ ॥ घर देहरासर कराव्युं नवं । तेहर्नु पुण्य असंख्यातुं हवं । स्नात्र महोत्सव स्वजन संतोष ॥३॥ संवत सोल सांत्रीसइ सार (१९३७) संखेश्वरनो संघ उदार। काढ्यो संघ जमाड्यो भलो। जिन शासन कीधो ऊजलो ।।४ ॥ नव अंगे गुरु पूजा कीध । याचक्नई बहु दानज दीध । संघपति तिलक घरइ कंठमाल । वार्जित्र वाजइ गाइ बाल ॥ ५ ॥ संवत सोल सांत्रीसई वली । विद्याप्रभसूरि दुखदली। देवंगत निर्वाण कल्याण । दोसी वीरो साधइ सुजाण ॥६ ॥ शुभ मांडवी रचावी करी । आडंबर रचना सवि धरी । सोनां रूपां फूल उच्छाल । करणी सवि कीधां संभालि ।।७।। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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