Book Title: Anusandhan 1995 00 SrNo 05 Author(s): Shilchandrasuri Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad View full book textPage 7
________________ ६. केटलाक कथाघटको ६८-८० १ परपुरुषनो संग निवारवा स्त्रीने पेटमां संताडी राखवी २. बोलायेला बचनो अकस्मात् सांभळी भळतो. ज अर्थ लेता हत्याराथी उगारो थवो ३. चार मूर्खाओ ४ गामडाह्यानो अज्ञानविलास : होदड जोशी ५. अक्कलना ओथमीर ६. अज्ञान ढांक्युं न रहे ७. उत्तम पुत्र प्राप्तिनुं शरती वरदान ८. खाउधरो शिष्य ९. सामान्य शब्दोनु मार्मिक अर्थघटन ह. भायाणी ७. प्रयोगनी पगदंडी ८१-८४ १. 'सीझवू' के 'सीजq' २. 'सुनासणा' ३. झंबइकगीत, वधु एक उहाहरण ४. गोरखनाथ, एक पद ह. भायाणी नवप्रकाशित साहित्यनो परिचय प्रकाशन-माहिती ८. अज्ञातकर्तृक अर्हत्प्रवचनसूत्र-सविवरण सं. शीलचंद्रविजय गणि ८८ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.orgPage Navigation
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