Book Title: Anusandhan 1995 00 SrNo 05
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 6
________________ अनुक्रम १. 'धूमावलि'-प्रकरणं संपा. आ. विजयसूर्योदयसूरि १ २. प्राकृतशब्दा संस्कृते नानार्थाः संपा. शीलचंद्रविजय गणी ४ ३. 'शब्दार्थ चन्द्रिका' संपा. मुनि धर्मकीर्तिविजय १२ ___ (पं हंसविजय-विरचित) ४. वे सरस्वती-स्तोत्र संपा. मुनि रत्नकीर्तिविजय २४ ५. हीरविजयसूरिनो लेख संपा. मुनि महाबोधिविजय ३९ ६. शत्रुजय-मंडन-ऋषभदेव-स्तुति ____संपा. मुनि भुवनचन्द्र ४० ७. 'चोवीस-जिन नमस्कार' (अष्टमी,माहात्म्य-गर्भ) संपा. शीलचन्द्रविजय गणि ४४ (वापक यशोविजय-कृत) ८. त्रण चउवीसी विहरमाण-जिन-स्तवन संपा. मुनि कल्याणकीर्तिविजय ४७ (लक्ष्मीसगरसृष्टि-शिष्य-कृत) ९. 'उवहाण पइट्ठा पंचासग' उपरथी फलित थतो एक मुद्दो पं. शीलचन्द्रविजय गणि ५२ १०. उमास्वाति-आर्यसमुद्रनां नवप्राप्त पद्यो विषे मधुसूदन ढांकी ५४ ११. रिस्टोरेशन ऑफ धी ओरिजिनल के. आर. चन्द्र ६० लेग्वेज ऑफ धी अर्धमागधी टेक्स्ट्स : एक परिचय १२. ट्रॅक नोंध ६३-६७ १. वाचक उमास्वाति(?)नुं वधु एक पद्य २. शुं आ गप्पुं गणाय ? ३. 'स्थूर' विषे बे वधु उल्लेखो ४. 'नखच्छोटिका', 'ढौक', 'सुखासिका/दुःखासिका', "ललते' शीलचन्द्रविजय गणि ५. 'पांडवचरित्र-बालावबोध'ना थोडाक शब्दप्रयोगो विषे मुनि भुवनचन्द्र Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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