Book Title: Agam 35 Chhed 02 Bruhatkalpa Sutra
Author(s): Devendramuni
Publisher: SuDharm Gyanmandir Mumbai

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Page 461
________________ १० ८०. वाहिमवणेइ भावे, कुणइ अभावे तयं तु पढमति । बिइअमवणेइ न कुणइ, तइयं तु रसायणं होइ । एवं एसो कप्पो दोसा- भावेऽवि कज्जमाणो अ। सुन्दरभावाओ खलु, चारित्तरसायणं होइ ॥ एवं कप्पविभागो, तइओसहनायओ मुणेयव्वो । भावत्थजुओ इत्थ उ, सव्वत्थवि कारणं एयं ।। -कल्पसमर्थनम् गा० ३१-३२-३३पृ०३ ८१. पुरिमचरिमाणकप्पो, मंगलं वद्धमाणतित्थम्मि। इह परिकहिया जिणगणहराइथेरावलिचरित्त । --पर्युषणाकल्पार्थ बोधिनी टीका में उद्धृत पृ०, ११ ८२. आचारात्तपसाकल्पः, कल्पः कल्पद्रुरीप्सिते । कल्पो रसायनं सम्यक , कल्पस्तत्त्वार्थदीपक : --कल्पसमथनम्, कल्प महिमां श्लोक १ पृ० ३ ८३. एगग्गचित्ता जिणसासणम्मि, पभावणा पूअपरायणा जे । तिसत्तवारं निसुणंति कप्पं, भवन्नवं ते लहुसा तरंति ॥ -कल्पसमर्थनम् कल्पमहिमा गा. ४ पृ३ ८४. उत्तराध्ययन अध्य० २९ प्रश्न ९ ८५. उत्तराध्ययन अ० २९ प्रश्न १४ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org


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