Book Title: Agam 10 Ang 10 Prashna Vyakaran Sutra Panhavagarnaim Terapanth
Author(s): Tulsi Acharya, Nathmalmuni
Publisher: Jain Vishva Bharati

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Page 67
________________ पण्हावागरणाई अलियवयणस्स फलविवागपदं १५. तस्स य अलियस्स फलविवागं अयाणमाणा वड्दति महत्भयं अविस्सामवेयणं दोहकालं बहुदुक्खसंकडं नरय-तिरिय-जोणि । तेण य अलिएण समणुबद्धा पाइद्धा पुणब्भवंधकारे भमंति भीमे दुरगतिवसहिमुवगया ॥ १६. तेय दीसंतिह दुग्गगा दुरंता परवसा अत्थभोगपरिवज्जिया असुहिता 'फुडियच्छवी बीभच्छा विवन्ना" खरफरुस-विरत्त-ज्झाम-झुसिरा निच्छाया लल्ल-विफल-वाया असक्कतमसक्कया अगंधा अचेयणा दुभगा अकता काकस्सरा हीणभिण्णघोसा विहिंसा जडवहिरंधया य मम्मणा अकंत-विकय'-करणा णीया णीयजण-निसेविणो लोग-गरहणिज्जा भिच्चा असरिस जणस्स पेस्सा दुम्मेहा लोक-वेद-अज्झप्प-समयसुतिवज्जिया नरा धम्मबुद्धि-वियला ॥ १७. अलिएण य 'ते डज्झमाणा" असंतएणं अवमाणण-पट्ठिमंस-अहिक्खेव-पिसुणभेयण गुरु - बंधव - सयण - मित्तवक्खारणादियाइं अभक्खाणाई बहुविहाई पावेंति अमणोरमाइं हियय-मण-दुमकाई जावज्जीवं दुरुद्ध राई' अणिटुख रफरुसवयणतज्जण-निब्भच्छण-दोणवदणविमणा कुभोयणा कुवाससा कुवसहीसु किलिस्संता नेव सहं नेव निव्वइं उवलभंति अच्चंत-विपुल-दक्खसय-संपलिता। १८. एसो सो अलियवयणस्स फलविवाओ इहलोइनो पारलोइनो अप्पसुहो बहुदुक्खो महब्भओ बहुरयप्पगाढो दारुणो कक्कसो असानो वाससहस्सेहि मुच्चइ, न य अवेदयित्ता अत्थि हु मोक्खोत्ति-एवमासु नायकुलनंदणो महप्पा जिणो उ वीरवरनामधेज्जो, कहेसी य अलिय-वयणस्स फलविवागं ।। निगमण-पदं १६. एयं तं वितियपि अलियवयणं लहुसगलहु-चवल-भणियं भयंकर-दूहकर अयसकर-वेरकरगं अरतिरति-रागदोस-मणसंकिलेस-वियरणं अलिय-नियडिसादि-जोगबहुलं नीयजण-निसेवियं निस्संस अप्पच्चयकारक परमसाहगरहणिज्ज परपीलाकारकं परमकण्हलेससहियं दुग्गतिविनिवायवतणं भवपुणब्भवकरं चिरपरिचियमणुगयं दुरंत । वितियं अधम्मदारं समत्तं । -त्ति बेमि॥ १. फुडियच्छविधीभच्छविवन्ना (ख,ग,घ,च,वृ)। ४. तेण य डज्झमाणा (ग)। २. जडबहिरमका (क, ख, ग, घ, च, बृपा)। ५. अणुवमाणि (व); अमणोरमाई (वा)। ३. विकत (ख, ग, च); अकृतानि विकृतानि ६. दुद्धराई (क)। च विरूपतयाकृतानि (वृपा)। ७. संपउत्ता (ग)। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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