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॥ॐ श्रीजिनाय नमः ॥
साधुप्रतिक्रमणादि सूत्राणि. दा.
परमपूज्य परमगुरु श्रीमन्महोपाध्यायजी श्री १००८ श्रीसुमतिसागरजी महाराज तथा पं० मुनि-श्रीमणिसागरजी महाराजके सद्उपदेशसे.
छपवाकर प्रकट कर्ताःश्रीमालवदेश "उजन" नगर निवासी अमोलकचंदजी चतर तथा सोरठ देश जामनगरांतरगत
"बंथली" ग्राम निवासी जगजीवन जीवराज कोठारी. प्रतयः, १००० श्री वीर निर्वाण संवत् २४५१
विक्रम संवत् १९८१ ॥ भेट ॥ जुहारमल मिश्रीलाल पालरेचा के, जैनबन्धु प्रिंटिंग प्रेस, इंदौर में छपा.
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॥ जाहिर खबर ॥ भेट! भेट!!
भेट ''! - (१) देव द्रव्य निर्णयः (२) बृहत्पर्युपणा निर्णय पूर्वार्द्ध. (३) बृहत्पर्युषणा निर्णय उत्तरार्द्ध. (४) बृहत्पर्युषणा निर्णय सम्पूर्ण. (५) बृहत्पर्युषणा निर्णय का सारांश भूमिका पीठिका. (६) आगमानुसार मुंहपत्ति का निर्णय.
छपरहे हैं. (७) श्रीजिन प्रतिमा को वंदन-पूजन करनेकी अनादि सिद्धि. (८) श्रीकल्पमूत्रकी कल्पद्रुम कलिका टीका का हिन्दी भाषान्तर.
छपवाने का विचार है. (९) आचारांग सूत्र हिंदी भाषा. (१०) दशवकालिक मूत्र हिंदी भाषा. (११) सत्य धर्मकी परीक्षा, अर्थात् जगत् मान्य जैन धर्म. (१२) सच्ची देव पूजा. (१३) श्वेताम्बर दिगम्बर विवाद निर्णय. (१४) अनादि सच्चा क्षत्रीय धर्म.
सर्व पुस्तकें भेट मिलने के ठिकानेः१ श्री जिनदत्त मूरिजी ज्ञान भण्डार, ठिः-गोपीपुरा शीतलवाडी, मु. सूरत (गुजरात) २ श्री जिन कृपाचन्द्र सूरि जैन ज्ञान भण्डार, ठिः-मोरसली गली नया जैन मन्दिर, मु. इन्दौर (मालवा)
३ श्री महावीर जेन पुस्तकालय ठिः-रामपुरा बाजार, कोटा (राजपुताना)
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'नमः सिद्धम् ॥
साधुसाध्वी योग्य प्रतिक्रमणादि सूत्र विधि संग्रह.
|| श्री नवकार मंत्र ||
णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्व साहूणं, एसो पंच णमुक्कारो, सव्व पावप्पणासणो, मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवइ मंगलं ॥ इति ॥ ॥ १ ॥ करोमि भन्ते ॥
करेमिभन्ते! सामाइयं। सव्वं सावज्जं जोगं पच्चक्खामि । जावज्जीवाए तिविहं तिविहेणं, मणेणं वायाए कारणं, न करमि, न कारवेमि, करंतंपि अन्नं न समणुजाणामि, तस्स भंते! पडिकमा मि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥ इति ॥
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साधु
कतिक्र०
॥२॥ इच्छामि ठामि ॥ इच्छामि ठामि काउसग्गं, जो मे देवसिओ अइयारो कओ, काइओ, वाइओ, माणसिओ उस्सुत्तो, उम्मग्गो, अकप्पो, अकरणिज्जो, दुज्झाओ, दुविचिंतिओ,अणायारो, अणिच्छियब्बो, असमण पाउग्गो, नाणे तह दंसणे चरित्ते, सुएसामाइए, तिण्हं गुत्तीणं, चउण्हं कसायाणं, पंचण्हं महव्वयाणं, छण्हं जीबनिकायाणं, सत्तण्हं पिण्डेसणाणं, अट्ठण्हं पवयणमाउणं, नवण्हं बंभचेरगुत्तीणं, दसविहे समणधम्मे, की ४ समणाणं जोगाणं, जं खंडियं जं विराहियं । तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।। इति ॥ | इच्छाकारेण संदिसह भगवन देवसियं आलोउं, इच्छं, आलोएमि, जो मे देवसिओ अइयारो कओ, बाकी पाठ ऊपर प्रमाणे और इच्छामि पडिक्कमिउं, जो में देवसिओ अइयारो कओ, इत्यादि।
॥३॥ देवसिक अतिचारः॥ ___ठाणे कमणे चंकमणे, आउत्ते अणाउत्ते, हरियकायसंघट्टे, वीयकायसंघट्टे थावरकायंसघट्टे, छप्पइया संघट्टे, देहरे उपासरे बाहिरभूमि जावतां आवतां पृथ्वीकाय अप्पकाय तेऊकाय वाऊकाय वनस्प
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तिकाय, वेइंद्री तेइन्द्री चौरिन्द्री पंचेंद्री जीवप्रतें संघट्ट परिताप उपद्रव उपजाव्यो. देहरे उपासरे जावतां || आवतां निस्सही आवस्सही कहेवी वीसारी, गुरुतणो वचन तहात्त करी सरदह्यो नहीं, मात्रो अविधे 3 परिठव्यो, जो कोई दिवस संबंधिपाप दोष लाग्यो होय ते सव्वे हुं मन वचन कायायें करी तस्स मिच्छामि | दुकडं ॥ सव्वस्स वि देवसिय दुचिंतिय दुब्भासिय दुचिठिअ, इच्छाकारेण संदिस्सह, इच्छं, तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥ इति ॥ दैवसिक अतिचारः॥
. ॥४॥ रात्रिक अतिचारः॥ ___ संथारा उवट्टणकी आउट्टणकी परिअणकी पसारणकी छप्पइया संघट्टणकी अचक्खू विसयकायकी । रात्रिसंबंधी पाप दोष लाग्यो, आहट्ट दोहट्ट चिन्तव्यो, आर्त रौद्रध्यान ध्यायो, धर्मध्यान शुक्लध्यान ध्यायो नहीं, संथारो पाछो वालतां, मात्रो अविधे परिठवतो. जो कोई रात्रिसंबंधी पाप दोष ला
ग्यो होय, ते सब्बे हुं मन वचन कायायें करी तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥ सव्वस्स वि राइअ दुचिंतिअ, | दुब्भासिअ, दुच्चिट्टिअ इच्छाकारेण संदिस्सह, इच्छं, तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥इति॥रात्रिक अतिचारः॥
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साधु०
॥ २ ॥
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॥ ५ ॥ श्री श्रमणसूत्र ॥
णमो अरिहंताणं, करेमि भन्ते सामाइयं०, चत्तारि मंगलं- अरिहंता मंगलं, सिद्धामंगलं, साहुमंगलं, केवलिपण्णत्तो धम्मोमंगलं । चत्तारि लोगुत्तमा - अरिहंता लोगुत्तमा, सिद्धालोगुत्तमा, साहुलोगुत्तमा, केवलिपण्णत्तो धम्मोलोगुत्तमा । चत्तारिसरणं पवज्जामि - अरिहंते सरणं पवज्जामि, सिसरणं पवज्जामि, साहुसरणं पवज्जामि, केवलिपण्णत्तं धम्मं सरणं पवज्जामि || इच्छामि पडिक्कमिडं जो मे देवसिओ०, इच्छामि पडिक्कमिउं इरिआवहिआए०, इच्छामि पडिक्कमिउं पगामसिज्जाए, निगामसिज्जाए, संथाराउब्वट्टणाए, परिअट्टणाए, आउट्टणपसारणयाए, छप्पइया संघट्टणाए, कुइए कक्कराइए, छीए, जंभाइए, आमोसे, ससरक्खामोसे, आउलमाउलाए, सोअणवत्तिआए, इत्थीविप्परिआसिआए, दिट्ठीविपरिआ - सिआए, मणविष्परिआसिआए, पाणभोअणविप्परिआसिए, जो मे देवसिओ अइआरो कओ तस्स मि च्छामि दुक्कडं ॥ पडिक्कमामि गोअरचरिआए, भिक्खायरिआए उग्वाडकवाडउग्धाडणाए साणावच्छादारा संघट्टणाए, मंडीपाहुडिआए, बलिपाहुडिआए, ठवणापाहुडिआए, संकिए सहस्सागारे, अऐ
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| प्रतिक्र०
सूत्र.
।। २ ।।
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| सणाए, पाणभोअणाए, बीअभोअणाए, हरिअभोअणाए, पच्छाकम्मिआए, पुरेकम्मिआए, अदिठ्ठहडाए, | दगसंसठ्ठहडाए, रयसंसठ्ठहडाए, पारिसाडणिआए, पारिठावणिआए, ओहासणभिक्खाए, जं उग्गमेणं, | ₹ उप्पायणेसणाए, अपरिसुद्धं पडिग्गहिअं, परिभुत्तं वा, जं न परिदृविअं तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥
पडिकमामि चाउकालं सज्झायस्स अकरणयाए, उभओकालं भंडोवगरणस्स अप्पडिलेहणाए, | दुप्पडिलेहणाए, अप्पमजणाए, दुप्पमज्जणाए, अइक्कमे, वइकमे, अइआरे, अणायारे, जो मे देवसिओ || अइयारो कओ तस्स मिच्छामि दुकडं॥ ____ पडिकमामि एगविहे असंजमे पडिकमामि दोहिं बंधणेहिं रागवंधणेणं, दोसबंधणेणं. पडिक्कमामि तिहिं । दंडेहिं, मणदंडेणं, वयदंडेणं, कायदंडेणं. पडिक्कमामि तिहिं गुत्तीहिं, मणगुत्तीए, वयगुत्तीए, कायगुत्तीए. पडिकमामि तिहिं सल्लेहि, मायासल्लेणं, निआणसल्लेणं, मिच्छादसणसल्लेणं. पडिकमामि तिहिं गारवेहि, | इवीगारवेणं, रसगारवेणं, सायागारवेणं. पडि० तिहिं विराहणाहिं, नाणविराहणाए, दंसणविराहणाए, चरित्तविराहणाए. पडि० चाहिं कसाएहिं, कोहकसाएणं, माणकसाएणं, मायाकसाएणं, लोभकशाएणं.
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साधुसाध्वी
।। ३ ।।
पडि० चउहिं सन्नाहिं, आहारसन्नाए, भयसन्नाए, मेहुणसन्नाए, परिग्गहसन्नाए पडि० चउहिं विकहाहिं, | इत्थिकहाए, भत्तकहाए, देसकहाए, रायकहाए. पडि० चउहिं झाणेहिं, अद्वेणं झाणेणं, रुद्देणं झाणेणं, धम्मेणं झाणेणं, सुक्केणं झाणेणं. पडि० पंचहिं किरिआर्हि, काइआए, अहिगरणियाए, पाउसिआए, पारितावणिआए, पाणाइवाए किरिआए. पडि० पंचहिं कामगुणेहिं, सद्देणं, रूवेणं, रसेणं, गंधेणं, फासेणं. पडि० पंचहिं महव्वएहिं, पाणाइवायाओ वेरमणं, मुसावायाओ वेरमणं, अदिन्नादाणाओ वेरमणं, मेहुणाओवेरमणं, परिग्गहाओ वेरमणं. पडि० पंचहिं समिइएहिं, इरिआसमिइए, भासासमिइए, एसणास मिइए, आयाणभंडमत्त निख्खेवणासमिइए, उच्चारपासवण खेलजलसिंघाणपारिट्ठावणिआसमिइए. पडि० छहिं जीवनिकाएहिं, पुढविकाएणं, आउकाएणं, तेउकाएणं, वाउकाएणं, वणस्सइकायणं, तसकाएणं, पडि० छहिं लेसाहिं, किण्हलेसाए, नीललेसाए, काउलेसाए, तेउलेसाए, पम्हलेसाए, सुकलेसाए- पडि० सत्तहिं भयठाणेहिं, अट्टहिं मयठाणेहिं, नवहिं वंभचेर गुत्तिहिं, दसविहे समण धम्मे, इगारसहिं उवास गपडिमाहिं, वारसहिं भिक्खुपाडमाहिं, तेरसहि किरिआठाणेहिं, चउद्दसहिं भूअगामेहिं, पन्नरसहिं परमाहम्मिएहिं,
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प्रतिक्रमण सूत्र.
॥ ३ ॥
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MSRCINECRACKRAM
सोलसहिं गाहासोलसएहिं, सत्तरसविहे असंजमे, अठारसविहे अबभे, एगुणवीसाए नायज्झयणेहिं, वीसाए ।
असमाहिठाणेहिं, इकवीसाए सवलेहिं ,बावीसाए परीसहेहि, तेवीसाए सुअगडज्झयणेहिं,चउवीसाए देवेहि, 13 | पणवीसाए भावणाहिं, छब्बीसाए दसाकप्पववहाराणं उद्देसणकालेहिं, सत्तावीसाए अणगारगुणेहिं, अट्टावीसाए आयारपकप्पेहिं , एगुणतीसाए पावसुअपसंगेहिं, तीसाए मोहणीअठाणेहिं, इगतीसाए सिद्धाइगुणेहिं, बत्तीसाए जोग संगहेहिं, तित्तीसाए आसायणाए, अरिहताणं आसायणाए, सिद्धाणं आसा| यणाए, आयरियाणं आसायणाए, उवज्झायाणं आसायणाए, साहूणं आसायणाए, साहुणीणं आसा3 यणाए, सावयाणं आसायणाए, सावियाणं आसायणाए, देवाणं आसायणाए, देवीणं आसायणाए, इह| लोगस्स आसायणाए, परलोगस्स आसायणाए, केवलिपन्नत्तस्सधम्मस्स आसायणाए, सदेवमणुआसुरस्स | लोगस्स आसायणाए, सबपाणभूअजीवसत्ताणं आसायणाए, कालस्स आसायणाए, सुअस्स आसायणाए, सुअदेवयाए आसायणाए, वायणारिअस्स आसायणाए, जंवाइद्धं, वच्चामेलिअं, हीणक्खरं, अच्चक्खरं, पयहीणं, विणयहीणं, घोसहीणं, जोगहीणं, सुठुदिन्नं, दुटु पडिच्छियं, अकाले कओ सज्झाओ,
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साधुसाध्वी
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OURRAHIMIRISASIRIRICHI
* कालेन कओ सज्झाओ, असज्झाइए सज्झाइअं, सज्झाइए न सज्झाइअंतस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥ नमो चउ-पतिक्रमण
वीसाए तित्थयराणं, उसभाइ महावीर पजवसाणाणं, इणमेव निग्गंथं पावयणं सच्चं, अणुत्तरं, केवलिअं, सूत्र.
पडिपुन्नं, नेआउअं, संसुध्धं,सल्लगत्तणं, सिधिमग्गं,मुत्तिमग्गं, निजाणमग्गं निव्वाणमग्गं,अवितहमविसंधि : 8 सव्वदुक्खप्पहीणमग्गं. इत्थंठिआजीवा सिझंति, बुझंति, मुचंति,परिनिव्वायंति, सव्वदुक्खाणमंतं करंति.
| तं धम्मं सद्दहामि, पत्तिआमि, रोएमि, फासेमि, पालेमि अणुपालेमि, तं धम्म सद्दहतो, पतिअंतो, रोअंतो, ₹ फासंतो, पालंतो, अणुपालंतो तस्स धम्मस्स केवलिपन्नत्तस्स अब्भुष्ट्रिओमि आराहणाए विरओमि विराह*णाए. असंजमं परिआणामि, संजमं उवसंपज्जामि.अबंभं परिआणामि, बंभ उवसंपज्जामि.अकप्पं परिआPणामि, कप्पं उवसंप्पज्जामि. अन्नाणं परिआणामि, नाणं उवसंपज्जामि. अकिरिअं परिआणामि, किरिअं
उवसंपज्जामि. मिच्छत्तं परिआणामि, सम्मतं उवसंपज्जामि. अबोहिं परिआणामि, बोहिं उवसंपज्जामि. अमग्गं परिआणामि, मग्गं उवसंपज्जामि. जं संभरामि, जं च न संभरामि. जं पडिकमामि, जं च न 8 पडिकमामि . तस्स सव्वस्स देवसिअस्स अइआरस्स पडिकमामि, समणोहं संजय-विरय-पडिहय-पच्च
-ৰে- ৰসৰ-ৰসৰে- ,
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* खाय पावकम्मे, अनिआणोदिहिसंपन्नो मायामोसं विवज्जिओ. अबाइज्जेसु दीवसमुद्देसु पन्नरससु
कम्मभूमीसु, जावंत केवि साहू, रयहरण गुच्छ पडिग्गह धारा,पंचमहव्वयधारा अठारससहस्ससीलंगधारा अक्खआयारचरित्ता ते सव्वे सिरसा मणसा मत्थएण वंदामि. खामेमि सव्वजीवे, सव्वे जीवा खमंतु मे ॥ मित्ती मे सव्वभूएसु, वेरं मज्झं न केणई ॥१॥ एवमहं आलोइ अ निंदिअ गरहिय दुगंछिअं| सम्मं ॥ तिविहेण पडिकतो वंदामि जिणे चउव्वीसं॥२॥इति ॥ साधु प्रतिक्रमण सूत्रम् ॥
॥६॥ पाक्षिक अतिचारः॥ ___नाणंमि दंसणमि अ, चरणमि तवंमि तहय विरयंमि॥आयरणं आयारो, इय एसो पंचहा भाण
ओ॥१॥ज्ञानाचार, दर्शनाचार, चारित्राचार, तपाचार, वीर्याचार, ए पंचविध आचार मांहि जे कोई | * अतिचार पक्ष दिवस मांहिं सूक्ष्म वादर जाणतां अजाणतां हुओ होय ते सविहुं मन वचन कायाए : करी मिच्छामि दुक्कडं ॥ १॥
तत्र ज्ञानाचारे आठ अतिचार ॥ काले विणए बहुमाणे, उवहाणे तहय निन्हवणे ॥ वंजण अत्थ
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साधुसाध्वी
॥ ५ ॥
तदुभए, अट्टविहो नाणमायारो ॥ २ ॥ ज्ञानकालवेला मांहें पढ्यो गुण्यो परावत्यों नहीं, अकाले पढ्यो, विनयहीन, बहुमानहीन, योगोपधानहीन, अनेरा कन्हे पढयो, अनेरो गुरु कह्यो, देववंदण वांदणे पडिकमणे सज्झाय करतां पढतां गुणतां कूडो अक्षर कानें मात्रें आगलो ओछो भण्यो गुण्यो, सूत्रार्थ तदुभकूड कलां, काजो अणऊधयों, डांडा अणपडिलेह्या, वस्ति अणसोध्यां अणपवेयां, असज्झाइ अणोज्झा कालवेला मांहिं, श्रीदशवैकालिक प्रमुख सिद्धान्त पढ्यो गुण्यो परावत्यों, अविधें योगोपधान कीधा कराव्या, ज्ञानोपगरण पाटी पोथी ठवणी कवली नोकरवाली सांपडा सांपडी दस्तरी वही कागलिआ ओलिआ तें पग लाग्यो, थूक लाग्यो, थूकें करी अक्षर भांज्यो, ज्ञानवंत ते प्रद्वेष मच्छर वह्यो, अंतराय अ | वज्ञा आशातना कीधी, कुणहिपतें तोतलो बोबडो देखी हस्यो, वितस्यों, मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान मनपर्यवज्ञान, केवलज्ञान, ए पांच ज्ञान तर्ण आशातना कीधी. ज्ञानाचार विपड़ओ अनेरो जे कोई अतिचार पक्ष दिवस मांहिं सूक्ष्म बादर जाणतां अजाणतां हुआ होय ते सवि हुं मन वचन कायाए करी मिच्छामि दुक्कडं ॥ २ ॥
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प्रतिक्रमण सूत्र.
॥ ५ ॥
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दर्शनाचारे आठ अतिचार॥निस्संकिअ निक्कंखिअ, निन्वितिगिच्छा अमूढदिट्ठीअ॥ उवबूह- 18 थिरी करणे, वच्छल्ल पभावणे अट्ट॥३॥ देव गुरु धर्मतणे विषे निस्संकपणो न कधिो, तथा एकान्त निश्चय है। धों नहीं, धर्म संबंधिआ फलतणे विषे निस्संदेह बुद्धिधरी नहीं, साधु साध्वी तणी निंदा जुगुप्सा कीधी, मिथ्यात्वीतणी पूजा प्रभावना देखी संघमाहिं गुणवंत तणी अनुपवृंहणा, आस्थिरीकरण, अवात्सल्य, अ-18 प्रीति, अभक्ति निपजावी. तथा देवद्रव्य गुरुद्रव्य साधारणद्रव्य भक्षित, उपेक्षित, प्रज्ञापराधे विणास्यो, विणसंतो उवेख्यो, छतीशक्तिए सारसंभाल न कीधी, ठवणायारय हाथथकी पाड्यो, पडिलेहवो विसार्यो, | जिनभुवनतणी चोरासी आशातना, गुरु प्रते तेत्रीस आशातना कीधी. दर्शनाचार विपइओ अनेरो जे | कोई अतिचार ॥३॥
चारित्राचारे आठ अतिचार॥पणिहाण जोगजुत्तो, पंचहिं समिईहिं तिहिं गुत्तिहिं ॥ एस चरि-| त्तायारो, अट्ठविहो होइ नायब्वो ॥४॥ इरियासमिति, भासासमिति, एषणासमिति, आदानभंडमत्तनि| क्षेवणासमिति, उच्चारपासवणखेलजल्लसिंघाण पारिट्ठावणियासमिति, मनोगुप्ति वचनगुप्ति, कायगुप्ति,
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सूत्र.
साधुसाध्वी ए अष्ट प्रवचनमाता, रूडीपरे पाली नहीं, साधुतणे धर्म सदैव, श्रावकतणे धर्मे सामायिक पोसह लीधे, प्रतिक्रमण || जे कांइ खंडन विराधना कीधी होय, चारित्राचार विषइओ,अनेरा जे कोइ अतिचार० ॥ ४॥
विशेषतश्चारित्राचारे तपोधनतणे धर्मे॥वयछकं कायछकं, अकप्पो गिहिभायणं॥ पलिअंक निसिज्जा जए, सिणाणं सोभवज्जणं ॥५॥ व्रतपट्के पहिले महाव्रतें, प्राणातिपात, सूक्ष्म बादर त्रस थावर जीवतणी | ॐ विराधना हुई.बीजें महावतें क्रोध लोभ भय हास्य लगें जूठो बोल्यो. तीजें अदत्तादान विरमणमहाव- | ४ तें ॥ सामिजीवादत्तं, तित्थयरअदत्तं तहेव य गुरुहिं॥ एवमदत्तं चउहा, पण्णत्तं वीयराएहि ॥१॥ स्वामि अ-*
दत्त, जीव अदत्त, तीर्थकर अदत्त, गुरु अदत्त, ए चतुर्विध अदत्तादान मांहि जे कांइ अदत्त परिभोगव्यो । चोथे महाव्रतें॥ वसहीकहनिसिजिदिय, कुड्डिंतर पुश्वकीलिए पणिए ॥ अइमायाहार विभूसणाई, नवबं|| भचेर गुत्तिओ॥१॥ए नव वाड सुधी पाली नहीं, सुहणे स्वप्नान्तरे दृष्टि विपर्यास हुओ. पंचमें महाव
तें धर्मोपगरणने विषे, इच्छा मूर्छा गृद्धि आसक्ति धरी, अधिको उपगरण वावों, पर्व तिथी पडिलेह- 18 3 वो विसार्यो, छट्टे रात्री भोजन विरमण व्रतें, असुरोभात पाणी कीधो, छारोद्गार आव्यो, पात्रे पात्राबंधे तक्रा
KASARHARASHARANAS
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॥
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दिकनो छांटो लाग्यो, खरड्यो रह्यो, लेप तेल ओषधादिक तणो संनिधि रह्यो, अतिमात्रायें आहार | लीधो, का मत विपइयो अनेरो जे कोई आतचार० ॥६॥
कायपाक, गामतपमारे नीसारे पग पडिलेहवा विसार्या, माटी बीटुं खडी धावडी अरणेटो पापाणतणी वातली ऊपर पग आयो, अप्पकाय वाधारी फूसणा हुआ, वहोरवा गया ऊलखो हाल्यो, | लोटो ढोल्या, काचा पाणी तणा छांटा लाग्या, तेउकाय वीज दीवातणी उजेही हुई, वाउकाय उघाड़ें ।
मुखें बोल्या, महावाय वाजतां कपडा कांबली तणा छेडा साचव्या नहीं, फूंक दीधी, वनस्पतिकाय नील ४ फूल सेवाल थड मूल फूल फल वृक्षशाखा प्रशाखा तणा संघट्ट परंपर निरंतर हुवा , त्रसकाय बेइंद्री है तेइंद्री चउरिंद्री पंचेंद्री काग बग उडाव्या, ढोर त्रासव्यां, बालक बीहाव्यां. पदकाय विषइओ अनेरो
जे कोई अतिचार ॥७॥ ___ अकल्पनीय सज्झा, वस्त्र पात्र पिंड परिभोगव्यो, सिजातरतणो पिंड परिभोगव्यो , उपयोग कीधा पाखे वहोयों, धात्रीदोष, त्रस बीज संसक्त पूर्वकर्म पश्चात्कर्म उद्गम उत्पादना दोष चिंतव्या नहीं,
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साधुसाध्वी
॥ ७ ॥
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गृहस्थतणो भाजन भांज्यो, फोड्यो, वली पाछो आप्यो नहीं, सूतां संथारिया उत्तरपट्टा टळतो अधिको उपगरण वावर्यो, देशतः स्नान मुखें भीनो हाथ लगाड्यो, सर्वतः स्नानतणी वांछा कीधी, शरीरतणो मल फेड्यो, केश रोम नख समार्या, अनेरी कांइ राढी विभूषा कीधी. अकल्पनीय पिंडादि विषओ अनेरो जे कोई अतिचार० ॥ ८ ॥
आवस्य सज्झाए, पडिलेहण ज्झाण भिक्ख अभतट्टे || आगमणे नीगमणे, ठाणे निसिअणे तुअट्टे ॥ १ ॥ आवश्यक उभयकाल व्याक्षिप्त चित्तपणे पडिकमणो कीधो, पडिकमणा मांहिं उघआवी, बेठां पडिकमणुं कीधुं, दिवसप्रतें चार बार सज्झाय, सातवार चैत्यवंदन न कीधां पडिलेहणा आधी पाछी भणावी, अस्तो व्यस्तकीधी, आर्त्त रौद्र ध्यान ध्यायां, धर्मध्यान शुक्लध्यान ध्यायांनहीं, गोचरीगयां बेंतालीश दोष उपजता चिंतव्या नहीं, छती शक्तिए पर्व तिथीए उपवासादिक तप कीधो नहीं, उपासरा देहरामांहिं पेसतां निस्सिही, नीरसतां आवस्सही कहेवी विसारी, इच्छामिच्छादिक दशविध चक्रवाल समाचारी साचवी नहीं, गुरुतणो वचन तहत्तिकरी पडिवज्यो नहीं, अपराध आव्यां मिच्छामि दुक्कडं दीघा
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प्रतिक्रमण सूत्र.
।। ७ ।।
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नहीं, स्थानके रहेतां हरियकाय बीयकाय कीडी तणां नगरां साध्यां नहीं, ओघो मुहपत्ति चोलपट्टो संघट्यो, स्त्री तीर्यचतणा संघट्ट अनंतर परंपर हुवा, वडाप्रतें पसाओ करी, लघुप्रतें इच्छाकार इत्यादिक विनय सांचव्यो नहिं. वय - समणधम्म-संयम, वैयावच्चं च वंभगुत्तीओ ॥ नाणाइतियं तव कोह- निग्गहाई इ चर णमेयं ॥ १ ॥ पिंड विसोही समिड़ भावणा, पडिमाय इंदिय निरोहो | पडिलेहण गुत्तीओ, अभिग्गहो नेव करणंतु ॥ २ ॥ एवंकारे साधुतणें धर्मों एकविध असंयम, तेत्रीश आशातना, प्रमादपद पर्यंत. मूलगुणउत्तरगुण एकसोचालीश अतिचार मांहिं साधुसमाचारी वि० अ० पक्षि० सु० वा० जाणतां, अजा० हुओ होय ते सवि हुं मन वचन कायायें करी मिच्छामि दुक्कडं ॥ ९ ॥ इति ॥ साधु अतिचार ॥
॥ ७ ॥ पाक्षिकसूत्रं ॥
तित्थंकरे अतित्थे, अतित्थसिद्धे अतित्यसिद्धे अ । सिद्धे अ जिणे अ रिसी, महरिसी नाणं च वंदामि ॥ १ ॥ जे इमं गुण रयण सायर । मविराहिऊण तिष्णसंसारा ॥ ते मंगलं करिता, अहमवि आराहणाभिहो || २ || मम मंगलमरिहंता, सिद्धा साहू सुअं च धम्मो अ । खंती गुत्ती मुत्ती, अजव
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साधुसाध्वी
॥ ८ ॥
या मद्दवं चैव ॥ ३ ॥ लोगम्मि संजया जं करिंति, परमारसि देसियमुआरं । अहमवि उवडिओ तं, महव्वय उच्चारणं काऊं ॥ ४ ॥ से किं तं महव्वय उच्चारणा ? महव्वय उच्चारणा पंचविहा पण्णत्ता, राईभोअण वेरमण छट्टा. तं जहा, सव्वाओ पाणाश्वायाओ वेरमणं ॥ १ ॥ सव्वाओ मुसावायाओ वेरमणं ॥ २ ॥ सव्वाओ अदिन्नादाणाओ वेरमणं ॥ ३ ॥ सव्वाओ मेहुणाओ वेरमणं ॥ ४ ॥ सव्वाओ परिग्गहाओ | वेरमणं ॥ ५ ॥ सव्वाओ राईभोअणाओ वेरणमं ॥ ६ ॥
तत्थ खलु पढगे भंते ! महव्वर पाणाइवायाओ वेरमणं, सव्वं भंते! पाणावायं पच्चक्खामि, से सुहुमं वा, वायरं वा, तसं वा, थावरं वा, नेव सयं पाणे अइवाइजा, नेवन्नेहिं पाणे अइवायाविज्जा, पाणे अइवायंते वि, अन्ने न समणुजाणामि जावज्जीवाए तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं, न करोमि, न कारवेमि, करतं पि अन्नं न समणुजाणामि, तस्स भंते ! पडिक्कमामि, निंदामि, गरिहामि, अप्पाणं वोसिरामि ॥ से पाणावाए चउव्विहे पण्णत्ते, तं जहा - दव्वओ, खितओ, कालओ, भावओ. दव्वओ णं पाणाइवार छसु जीवनिकाएसु, खित्तओ णं पाणाइवाए सव्वलोए, कलाओ णं पाणाइवाए
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प्रतिक्रमण
सूत्र
|| 2 ||
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| दिआ वा राओ वा, भावआ णं पाणाइवाए रागेण वा दोसेण वा, पि य मए इमस्म धम्मस्स केवलिपण्णत्तस्म,अहिंसालाखणस्म, मच्चाहिटिअस्म, विणयमूलस्स,खंतिप्पहाणस्स,अहिरण्णसोवाण्णिअस्म, | उवसमप्पभवस्म. नववंभचेरगुत्तस्म, अपयमाणम्स, भिक्खावित्तिअम्म.कुक्खिसंवलम्स. निरग्गिसरणम्स. संपक्खालिअस्म. चत्तदोसम्म, गुणग्गाहिअस्स, निविआरस्स, निवित्तिलक्षणस्म, पंचमहव्वयजुत्तस्स, असंनिहिसंचयम्म. अविसंवाइअस्म, मंमारपारगामिअस्स, निव्वाणगमणपज्जवसाणफलस्स. पुदिव अनाणयाए, अमवणयाए, अबोहिआए. अणभिगमेणं, अभिगमेण वा. पमाएणं रागदोसपडिवद्धआए, बालयाए, मोहयाए, मंदयाए, किड्डयाए, तिगारवगुरुआए, चउक्कसाओवगएणं, पंचिंदिअवसट्टेणं, पडि-४ पुण्णभारिआए, मायामुक्खमणुपालयंतेणं, इहं वा भवे, अन्नेसु वा भवग्गहणेसु पाणाइवाओ कओ वा, काराविओ वा, कीरंतो वा परेहिं समणुन्नाओ, तं निंदामि, गरिहामि, तिविहं तिविहेणं मणेणं, वायाए, कारणं अईअं निंदामि, पडुप्पन्नं संवरेमि, अणागयं पच्चक्खामि. सव्वं पाणाइवायं जावज्जीवाए, अणिस्सिओ हं, नेवसयं पाणे अइवाइज्जा, नेवन्नेहिं पाणे आइवायाविज्जा, पाणे अड्वायंते वि अन्ने न समणु
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साधुसाध्वी
॥ ९ ॥
जाणिज्जा, तं जहा. अरिहंतसक्खिअं, सिद्धसक्खिअं, साहूसक्खिअं, देवसक्खिअं, अप्पसक्खिअं, एवं हवइ भिक्खू वा, भिक्खुणी वा संजय - विरय- पडिहय-पच्चक्खायपावकम्मे, दिआ वाराओ वा, एगओ वा | परिसागओ वा, सुते वा जागरमाणे वा, एस खलु पाणाइवायस्स वेरमणे हिए, सुहे, खमे. निस्सेसिए, | आणुगामिए, पारगामिए सव्वेसिं पाणाणं, सव्वेसिं भूआणं, सव्वेसिं जीवाणं, सव्वेमिं सत्ताणं, अदुक्खणयाए, असोअणयाए, अजूरणयाए, अतिप्पणयार, अपीडणयाए, अपरिआवणयाए, अणुद्दवणयाए, महत्थे, महागुणे, महाणुभावे, महापुरिसाणुचिन्ने, पर मरिसिदेसिए पसत्थे, तं दुक्खक्खयाए, कम्मक्खयाए, मुख्खयाए, बोहिलाभाए, संसारुतारणाए, तिकट्टु, उवसंपज्जित्ता णं विहरामि, पढमे भंते! महव्व उवडिओ मि मव्वाओ पाणाड़वायाओ वेरमणं ॥ १ ॥
अहावरे दोच्चे भंते! महव्वए मुसावायाओ वेरमणं, सव्वं भंते! मुसावायं पच्चक्खामि, से कोहा वा, लोहा वा, भया वा, हासा वा, नेव सयं मुसं वइज्जा, नेवन्नेहिं मुसं वायाविज्जा, मुसं वयंते वि अन्ने न समणुजाणामि, जावज्जीवाए तिविहं तिविहेणं, मणेणं वायाए कारणं, न करोमि, न कारवेमि, करतं
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प्रतिक्रमण सूत्र.
॥ ९ ॥
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पि अन्नं न समणुजाणामि, तस्स भंते ! पडिकमामि, निंदामि, गरिहामि, अप्पाणं वोसिरामि. से मुसा-3 ४] वाए चउविहे पण्णत्ते, तं जहा. दबओ, खित्तओ, कालओ, भावओ, दवओणं मुसावाए सव्वदव्वेसु, | खित्तओ णं मुसावाए लोए वा अलोए वा, कालओ णं मुसावाए दिआ वा राओ वा, भावओ णं मु| सावार रागेण वा दोसेण वा, जं पिय मए इमस्स धम्मस्स केवलिपण्णत्तस्स, अहिंसालक्खणस्स, सच्चा| हिटिअस्स, विणयमूलस्स, खंतिप्पहाणस्स, अहिरण्णसोवण्णियस्स, उवसमप्पभवस्स, नववंभचेरगुत्तस्स, | अपयमाणस्स, भिक्खावित्तिअस्स, कुक्खिसंबलस्स, निरग्गिसरणस्स, संपक्खालिअस्स, चत्तदोसस्स, गु-| | णग्गाहिअस्स, निविआरस्स, निवित्तिलक्खणस्स, पंचमहव्वयजुत्तस्स, असंनिहिसंचयस्स, अविमंवा-3 | इअस्स, संसारपारगामिअस्स, निव्वाणगमणपजवसाणफलस्स, पुदि अन्नाणयाए, असवणयाए, अबो| हियाए, अणभिगमेणं, अभिगमेण वा, पमाएणं रागदोसपडिबद्धयाए, बालयाए, मोहयाए, मंदयाए, है | किड्डयाए, तिगारवगुरुआए, चउकसाओवगएणं, पंचिंदिअवसट्टेणं, पडिपुण्णभारियाए, सायासुक्खम| णुपालयंतेणं, इहं वा भवे अन्नेसु वा भवग्गहणेसु, मुसावाओ भासिओ वा, भासाविओ वा, भासिजतो
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साधुसाध्वी
॥१०॥
COCALCCAX
| वा परेहिं समणुन्नाओ तं निंदामि, गरिहाभि, तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं, अईअं निंदामि, || पतिक्रमण पडुपन्नं संवरेमि, अणागयं पञ्चक्खामि. सव्वं मुसावायं जावजीवाए, अणिस्सिओ हं, नेव मयं मुसं व. इज्जा, नेवन्नेहिं मसं वायाविजा, मसं वयंते वि अन्ने न समजाणिज्जा. तं जहा. अरिहंतसक्खि. सिद्धसक्खिरं साहसक्विअं, देवसक्खिअं, अप्पसक्खिअं, एवं हवइ भिक्खू वा, भिक्खुणी वा, संजयविरय-पडिहय-पञ्चक्खायपावकम्मे, दिआ वा राओ वा, एगओ वा परिसागओ वा, सुत्ते वा जागर-18 माणे वा, एस खलु मुसावायस्स वेरमणे हिए, सुहे, खमे, निस्सेसिए, आणुगामिए, पारगामिए, सव्वेसि | पाणाणं, सव्वेसि भूआणं, सव्वेसिं जीवाणं, सव्वेसिं सत्ताणं, अदुक्खणयाए, असोअणयाए, अजूरणयाए, अतिप्पणयाए, अपीडणयाए, अपरिआवणयाए, अणुद्दवणयाए, महत्थे, महागुणे महाणुभावे, महा| पुरिसाणुचिन्ने, परमरिसिदेसिए पसत्थे, तं दुक्खक्खयाए, कम्मक्खयाए, मुक्खयाए, बोहिलाभाए. संसा
रुत्तारणाए, तिकट्ट, उवसंपज्जित्ता णं विहरामि. दोच्चे भंते ! महव्वए उवडिओ मि मव्वाओ मुसावा| याओ वरमणं ॥२॥
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| अहावरे तच्चे भंते ! महब्बए अदिन्नादाणाओ वेरमणं, सव्वं भंते ! अदिन्नादाणं पच्चक्खामि, से गामे वा. नगरे वा, अरण्णे वा. अप्पं वा, बहुं वा, अणुं वा, थूलं वा, चित्तमंतं वा. अचित्तमंतं वा, नेव सयं अदिन्नं गिण्डिजा, नेवन्नेहिं अदिन्नं गिहाविज्जा, अदिन्नं गिण्हते वि अन्ने न समणुजाणामि. | जावज्जीवाए तिविहं तिविहेणं मणेणं, वायाए काएणं, न करेमि, न कारवेमि, करंतंपि अन्नं न समणुजाणामि, तस्स भंते ! पडिक्कमामि, निंदामि, गरिहामि, अप्पाणं वोसिरामि. से अदिन्नादाणे चउब्बिहे | | पण्णत्ते, तं जहा. दवओ खित्तओ कालओ भावओ, दव्वओ णं अदिन्नादाणे गहणधाराणजसु दब्बेसु. 31
खित्तओ णं अदिन्नादाणे गामे वा नगरे वा अरण्णे वा, कालओ णं अदिन्नादाणे दिआ वा राओ वा, | भावओणं अदिन्नादाणे रागेण वा दोसेण वा.जंपिय मए इमस्स धम्मस्स केवलिपन्नत्तस्स,अहिंसालक्खणस्स, है | सच्चाहिट्ठिअस्स, विणयमूलस्स, खंतिप्पहाणस्स. अहिरण्णसोवाण्णियस्स, उवसमप्पभवस्स, नववंभचेरगुत्तस्स, अपयमाणस्स, भिक्खावित्तियस्स, कुक्खिसंबलस्स, निरग्गिसरणस्स, संपक्खालियस्स, चत्तदोसस्स, गुणग्गाहियस्स, निविआरस्स, निवित्तिलक्खणस्स, पंचमहव्वयजुत्तस्स, असंनिहिसंचयस्स, अविसंवाइ
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आधुसाध्वी
पतिक्रमण सूत्र.
॥११॥
| यस्स, संसारपारगामिअस्स, निव्वाणगमणपज्जवसाणफलस्स, पुब्बिं अन्नाणयाए, असवणयाए, अबोहि- | याए, अणभिगमेणं, अभिगमेण वा, पमाएणं रागदोसपडिबद्धआए, बालआए, मोहयाए, मंदयाए, कि| ड्डयाए, तिगारवगुरुआए, चउक्साओवगएणं, पंचिंदिअवसट्टेणं, पडिपुण्णभारियाए, सायासुक्खमणुपा- 12 | लयंतेणं, इहं वा भवे अन्नसु वा भवग्गहणेसु, आदिन्नादाणं गहिवा , गाहाविरं वा, धिप्पंतं वा परेहिं |
समणुन्नाओ, तं निंदामि गरिहामि तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए काएणं, अईअंनिंदामि, पडुप्पण्णं | | संवरेमि, अणागयं पञ्चक्खामि. सव्वं अदिन्नादाणं, जावजीवाए, अणिस्सिओ हं नेव सयं अदिन्नं गि-18 | हिज्जा, नेवन्नेहिं अदिन्नं गिहाविज्जा. अदिन्नं गिण्हते वि अन्न न समणुजाणिज्जा, तं जहा, अरिहंत| सक्खिअं, सिद्धसक्खिअं, साहूसक्खिअं, देवसक्खिअं, अप्पसक्खिअं, एवं हवइ भिक्खू वा, भिक्खुणी वा, | संजय-विरय-पडिहय-पच्चक्खाय-पावकम्मे, दिआ वा राओ वा, एगओ वा परिसागओ वा, सुत्ते वा | जागरमाणे वा, एस खलु अदिन्नादाणस्स वेरमणे. हिए सुहे खमे निस्सेसिए आणुगामिए पारगामिए, | 3| सव्वेसिं पाणाणं, सव्वेसिं भूआणं, सव्वेसिं जीवाणं, सव्वेसिं सत्ताणं, अदुक्खणयाए, असोअणयाए, अ
॥११॥
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जूरणयाए, अतिप्पणयाए, अपीडणयाए, अपरिआवणयाए, अणुद्दवणयाए, महत्थे, महागुणे, महाणुभावे, | महापुरिसाणुचिण्णे, परमरिसिदेसिए, पसत्थे, तं दुक्खक्खयाए, कम्मक्खयाए, मुक्खयाए, बोहिलाभाए, | संसारुत्तारणाए, तिकट्ट, उवसंपज्जित्ता णं विहरामि, तच्चे भंते! महब्वए उवडिओ मि सव्वाओ अदिन्ना| दाणाओ वेरमणं ॥३॥
अहावरे चउत्थे भंते ! महव्वए मेहुणाओ वेरमणं, सव्वं भंते ! मेहुणं पञ्चक्खामि. से दिव्वं वा, मा-14 | गुस्सं वा,तिरिक्खजोणि वा, नेव मयं मेहणं सेविजा, नेवन्नेहिं मेहणं सेवाविजा, मेहुणं सेवंते वि अन्ने । न समणुजाणामि, जावज्जीवाए, तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं न करोमि, न कारवेमि, करतं पि अन्नं न समणुजाणामि, तस्स भंते ! पडिकमामि, निंदामि, गरिहामि, अप्पाणं वोसिरामि. से मेहुणे : चउबिहे पन्नत्ते, तं जहा. दवओ खित्तओ कालओ भावओ, दव्वओणं मेहुणे रूवेसु वा रूवसहगएसु । वा, खित्तओणं मेहुणे उढलोए वाअहोलोएवा तिरियलोए वा,कालओणं मेहुणे दिआवाराओवा,भावओणं | मेहुणे रागेण वा दोसेण वा, जंपि य मए इमस्स धम्मस्स केवलिपण्णत्तस्स, अहिंसालक्खणस्स, सच्चाहि
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॥१२॥
धुसाध्वी ध्वी * टिअस्स, विनयमूलस्स, खंतिप्पहाणस्स. अहिरण्णसोवण्णिअस्स, उवसमप्पभवस्स, नववंभचेरगुत्तस्म,अप-5 पतिक्रमण
| यमाणस्स, भिक्खावित्तिअस्स. कुक्खिसंबलस्स, निरग्गिसरणस्म, संपक्खालिअस्म, चत्तदोमस्स. गुणग्गाहिअस्स, निविआरस्म, निवित्तिलक्खणस्स, पंचमहव्वयजुत्तस्स, अमंनिहिसंचयस्स. अविसंवाइअस्म, सं-2 सारपारगामिअस्स, निव्वाणगमणपज्जवसाणफलस्स, पुब्बिं अन्नाणयाए, असवणयाए, अबोहियाए, अण-1 भिगमेणं, अभिगमेण वा, पमाएणं रागदोसपडिबद्धयाए,बालयाए. मोहयाए, मंदयाए, किड्डयाए, तिगार- | | वगुरुआए,चउकसाओवगएणं. पंचिंदिअवसट्टेणं,पडिपुण्णं भारियाए, सायासुक्खमणुपालयंतेणं, इह वा भवे
अन्नेसु वा भवग्गहणेसु, मेहणं सेविअंवा, सेवाविअंवा,सेविज्जंतं वा परेहिं समणुन्नाओ.तं निंदामि, गरिहामि, तिविहं तिविहेणं, मणेणं वायाए काएणं, अईयं निंदामि, पडप्पन्नं संवरेमि, अणागयं पच्चक्खा| मि, सव्वं मेहुणं जावज्जीवाए, अणिस्सिओहं, नेव सयं मेहुणं सेविज्जा, नेवन्नेहिं मेहुणं सेवाविज्जा,मेहुणं | सेवंते वि अन्ने न समणुजाणिज्जा, तं जहा. अरिहंतसक्खिअं, सिद्धसक्खिअं, साहुसक्खिअं, देवसक्खिअं. ४ अप्पप्तक्खिअं, एवं हवई भिक्खू वा भिक्खुणी वा, संजय-विरय-पडिहय-पच्चक्वाय-पावकम्मे, दिआ
॥१२॥
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| वा राओ वा, एगओ वा परिसागओ वा, सुत्ते वा जागरमाणे वा, एस खलु मेहुणस्स वेरमणे, हिए सुहे, 1 खमे, निस्सेसिए, आणुगामिए, पारगामिए, सव्वेसि पाणाणं, सव्वेसिं भूआणं, सव्वेसिं जीवाणं, सव्वेसि ।
सत्ताणं, अदुक्खणयाए, असोअणयाए, अजूरणयाए, अतिप्पणयाए, अपीडणयाए, अपरिआवणयाए,अ-18 णुद्दवणयाए, महत्थे, महागुणे, महाणुभावे, महापुरिसाणुचिन्ने, परमरिसिदेसिए पसत्थे, तं दुक्खक्खयाए, कम्मक्खयाए, मुक्खयाए, बोहिलाभाए, संसारुत्तारणाए, तिकट्ट. उवसंपजित्ता णं विहरामि, चउत्थे भंते! | 2 महव्वए उवट्टिओमि सव्वाओ मेहणाओ वेरमणं ॥ ४ ॥ . अहावरे पंचमे भंते! महब्बए परिग्गहाओ वेरमणं, सव्वं भंते! परिग्गहं पच्चक्खामि, से अप्पं वा| बहुं वा अणुं वा थूलं वा चित्तमंतं वा अचित्तमंतं वा, नेव सयं परिग्गहं परिगिहिजा, नेवन्नेहिं परिग्गहं परिगिण्हाविज्जा, परिग्गहं परिगिण्हते वि अन्ने न समणुजाणामि, जावजीवाए, तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए काएणं, न करेमि, न कारवमि, करंतंपि अन्नं न समणुजाणामि, तस्स भंते! पडिकमामि, निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि. से परिग्गहे चउबिहे पण्णत्ते, तं जहा. दव्वओ खित्तओ
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R
मृत्र.
साधुसाध्वी कालओ भावओ, दव्वओ णं परिग्गहे सचित्ताचित्तमीसेसु दव्वेसु, खित्तओ णं परिग्गहे सव्वलोए, का- प्रतिक्रमण ॥१३॥ लओ णं परिग्गहे दिआ वा राओ वा, भावओ णं परिग्गहे अप्पग्घे वा महग्घे वा, रागेण वा दोसेण वा,
जं पि य मए इमस्स धम्मस्स केवलिपण्णत्तस्स, अहिंसालक्खणस्स, सच्चाहिटिअस्स, विणयमूलस्स, खंति| पहाणस्स, अहिरण्णसोवण्णिअस्स, उवसमप्पभवस्स, नववंभचेरगुत्तस्स, अपयमाणस्स, भिक्खावित्तिअस्स, | 3| कुक्खिसंबलस्स, निरग्गिसरणस्स, संपक्खालिअस्स, चत्तदोसस्स, गुणग्गाहिअम्स, निविआरस्स, निवि-13 |त्तिलक्खणस्स, पंचगहब्बयजुत्तस्स, असंनिहिसंचियस्स, अविसंवाइअस्स, संसारपारगामिअस्स, निव्वाण- | गमणपज्जवसाणफलस्स, पुद्वि अन्नाणयाए, असवणयाए, अबोहियाए, अणभिगमेणं, अभिगमेण वा, पमाएणं, रागदोसपडिबद्धयाए, बालयाए, मोहयाए, मंदयाए, किड्डयाए, तिगारवगुरुयाए, चउक्कसाओवगएणं, | | पंचिंदिअवसट्टेणं, पडिपुन्नं भारयाए, सायासुक्खमणुपालंतेणं, इहं वा भवे अन्नेसु वा भवग्गहणेसु, परि| ग्गहो गहिओ वा, गाहाविओ वा, धिप्पंतो वा परेहिं समणुन्नाओ,तं निंदामि गरिहामि तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कायेणं, अईअंनिंदामि, पड्डुप्पन्नं संवरेमि,अणागयं पञ्चक्खामि, सव्वं परिग्गरं जाव
॥१३॥
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| जीवाए, अणिस्सिओ हं, नेव सयं परिग्गहं परिगिहिज्जा, नेवन्नेहिं परिग्गहं परिगिहाविज्जा, परि-18 ग्गहं परिगिण्हते वि अन्ने न समणुजाणिज्जा, तं जहा. अरिहंतसक्खिअं, सिद्धसक्खिअं, साहसक्खिअं, देवसक्खिअं,अप्पसक्खिअं, एवंहवइ भिक्खूवा, भिक्खुणीवा, संजय-विरय-पडिहय-पच्चक्खाय-पावकम्मे, | दिआ वा राओ वा, एगओ वा परिसागओ वा, सुत्ते वा जागरमाणे वा, एस खलु परिग्गहस्स वेरमणे,
हिए सुहे खमे निस्सेसिए, आणुगामिए, पारगामिए, सव्वेसिं पाणाणं, सव्वेसिं भूआणं, सव्वेसि जीवाणं, * सव्वेसिं सत्ताणं, अदुक्खणयाए, असोअणयाए, अजूरणआए, अतिप्पणयाए, अपीडणयाए, अपरिआवण| याए, अणुद्दवणयाए, महत्थे, महागुणे, महाणुभावे, महापुरिसाणुचिन्ने, परमरिसिदेसिए, पसत्थे, तं दुक्ख| क्खयाए, कम्मक्खयाए, मुक्खयाए, बोहिलाभाए, संसारुत्तारणाए, तिकट्ट, उवसंपज्जित्ता णं विहरामि, & | पंचमे भंते ! महब्बए उवडिओ मि सव्वाओ परिग्गहाओ वेरमणं ॥५॥
अहावरे छट्टे भंते ! वए राईभोअणाओ वेरमणं सब्वं भंते! राईभोअणं पच्चक्खामि, से असणं वा पाणं वा खाइमं वा साइमं वा, नेय सयं राईभोअणं भुंजिज्जा, नेवन्नेहिं राईभोअणं भुंजाविज्जा, राई
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साधुसाध्वी
॥ १४ ॥
|
| भोअणं भुंजंते वि अन्ने न समणुजाणामि, जावज्जीवाए तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं, न क| रेमि, न कारवेमि, करंतं पि अन्नं न समणुजाणामि, तस्स भंते! पडिकमामि, निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि . से राई भोअणे चउव्विहे पण्णत्ते, तं जहा- दव्वओ खित्तओ कालओ भावओ, दव्वओ णं रा | ईभोअणे असणे वा पाणे वा खाइमे वा साइमे वा, खित्तओ णं राईभोअणे समयखि ते, कालओ णं राई भोजणे दिआ वा राओ वा, भावओ णं राई भोअणे तित्ते वा कडुए वा कमाए वा अंबिले वा महुरे वा लवणे वा, रागेण वा दोसेण वा, जंपिय मए इमस्स धम्मस्स केवलिपण्णत्तस्स, अहिंसालक्खण सच्चा हिडिअस्स, विणयमूलस्स, खंतिप्पहाणस्स, अहिरण्णसोवण्णिअस्स, उवसमप्पभवस्त्र, नवबंभचेरगुत्तस्स, अपयमाणस्स, भिक्खावित्तिअस्स, कुक्खिसंबलस्स, निरग्गिसरणस्स, संपक्खालिअस्स, चत्तदोसस्म, गुणग्गाहिअस्स, निव्विआरस्स, निव्वित्तिलक्खणस्स, पंचमहव्वयजुत्तस्स, असंनिहिसंचयस्स, अविसंवाइअस्स, संसारपारगामिअस्स, निव्वाणगमणपज्जव माणफलस्स, पुव्विं अन्नाणयाए, असवणयाए, अबोहियाए, अणभिगमेणं, अभिगमेण वा, पमाणं रागदोसपडिबद्धयाए, बालयाए, मोहयाए, मंदयाए, किड्डड्याए, तिगारवगुरु
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प्रतिक्रमण
सूत्र.
॥ १४ ॥
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* आए, चउक्साओवगएणं पंचिदिअवसट्टेणं, पडिपुण्णभारिआए, सायासुक्खमणुपालयंतेणं, इहं वा भवे, & अन्नेसु वा भवग्गहणेसु वा, राइभोअणं भुत्तं वा, मुंजाविअं वा, भुजतं वा परेहिं समणुनाओ,तं निंदामि, |
गरिहामि, तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं अईअंनिंदामि, पडुप्पण्णं संवरेमि, अणागयं पच्चक्खामि, सव्वं राईभोअणं जावज्जीवाए, अणिस्सिओ हं, नेव सयं राई भुंजिज्जा, नेवन्नेहिं राई भुंजाविज्जा, राइं भुजंते वि अन्ने न समणुजाणिज्जा, तंजहा, अरिहंतसक्खिअं, सिद्धसक्खिअं, साहसक्खिअं,देवसखिअं,अप्पसक्खिअं, एवं हवइ भिक्खू वा,भिक्खुणीवा,संजय-विरय-पडिय-पच्चक्खाय-पावकम्मे,दिआ
वा,राओवा, एगओवा परिसागओवा, सुत्ते वा जागरमाण वा, एस खलु,राइभोअणस्स वेरमणे, हिए हिए है सुहे खमे निस्सेसिए आणुगामिए,पारगामिए,सब्वेसिं पाणाणं,सव्वेसिंभुआणं सव्वेसिंजीवाणं,सब्वेसिं सत्ताणं,
अदुक्खणयाए, असोअणआए, अजूरणयाए, अतिप्पणयाए, अपीडणयाए, अपरिआवणयाए, अणुद्दव-| | णयाए, महत्थे, महागुणे, महाणुभावे, महापुरिसाणुचिन्ने, परमरिसिदेसिए पसत्थे, तं दुक्खक्खयाए, कम्म-2 क्खयाए, मुक्खयाए, बोहिलाभाए, संसारुत्तारणाए, तिकडु, उवसंपजित्ता णं विहरामि. छट्टे भंते ! वए
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साधुसाध्वी
॥१५॥
मूत्र.
| अन्भुटिओमि सब्वाओ राईभोयणाओ वेरमणं ॥६॥ इच्चेइआई पंचमहव्वयाई राईभोअणवेरमण छट्ठाई प्रतिक्रमण | अत्तहिअट्टाए उवसंपजित्ता णं विहरामि ॥ १॥
अप्पसत्था य जे जोगा,परिणामा य दारुणा॥ पाणाइवायस्स वेरमणे, एस वुत्ते अइक्कमे ॥१॥ति| व्वरागा य जा भासा, तिव्वदोसा तहेव य ॥ मुसावायस्स वेरमणे, एस वुत्ते अइक्कमे ॥ २॥ उग्गहं च। | अजाइत्ता, अविदिन्नेव उग्गहे ॥ अदिन्नादाणस्स वेरमणे, एम वुत्ते अइकमे ॥३॥ सदा रूवा रसा गंधा, 3 | फासाणं पविआरणे॥मेहुणस्स वेरमणे, एस वुत्ते अइक्कमे ॥४॥ इच्छा मुच्छा य गेही अ, कंखा लोभे *
अदारुणे। परिग्गहस्स वेरमणे, एस वुत्ते अइक्कमे ॥५॥ अइमत्ते अ आहारे, सूरे खित्तम्मि संकिए ॥ | राईभोयणस्स वेरमणे, एस वुत्ते अइक्कमे ॥६॥ दंसण-नाण-चरित्ते, अविराहित्ता ठिओ समणधम्मे॥ पढमं | | वयमणुरक्खे, विरयामो पाणाइवायाओ॥७॥दसण-नाण-चरित्ते, अविराहित्ता ठिओ समणधम्मे ॥ बीयं | वयमणुरक्खे, विरयामो मुसावायाओ ॥८॥ दंसण-नाण-चरित्ते, अविराहिता ठिओ समणधम्मे ॥ तइयं | वयमणुरक्खे, विरयामो अदिन्नादाणाओ॥९॥ दंसण-नाण-चरित्ते,अविराहित्ता ठिओ समणधम्मे॥ चउत्थं ||
॥१५॥
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| वयमणुरक्खे, विरयामो मेहुणाओ ॥१०॥ दसण-नाण-चरित्ते, अविराहित्ता ठिओ समणधम्मे ॥ पंचमं || वयमणुरक्खे, विरयामो परिग्गहाओ ॥११॥ दसण-नाण-चरित्ते, अविराहित्ता ठिओ समणधम्मे ॥ छ|| वयमणुरक्खे, विरयामो राईभोयणाओ ॥ १२ ॥ आलय-विहार-समिओ, जुत्तो गुत्तो ठिओ समणधम्मे॥ पढमं वयमणुरक्खे, विरयामो पाणाइवायाओ ॥१३॥ आलय-विहार-समिओ, जुत्तो गुत्तो ठिओ समणधम्मे ॥ बीअं वयमणुरक्खे, विरयामो मुसावायाओ ॥१४॥ आलय-विहार-समिओ, जुत्तो गुत्तो ठिओ समणधम्मे ॥ तइयं वयमणुरक्खे, विरयामो अदिनादाणाओ॥१५॥ आलय-विहार-समिओ, जुत्तो गुत्तो । ठिओ समणधम्मे ॥ चउत्थं वयमणुरक्खे, विरयामो मेहुणाओ ॥ १६ ॥ आलय-विहार-ममिओ, जुत्तो | गुत्तो ठिओ समणधम्मे ॥ पंचमं वयमणुरक्खे, विरयामो परिग्गहाओ ॥१७॥ आलय-विहार-समिओ,
जुत्तो गुत्तो ठिओ समणधम्मे ॥ छठें वयमणुरक्खे, विरयामो राईभोयणाओ ॥ १८ ॥ आलय-विहार| समिओ, जुत्तो गुत्तो ठिओ समणधम्मे ॥ तिविहेण अप्पमत्तो, रक्खामि महब्बएं पंच ॥१९॥ सावज| जोगमेगं, मिच्छत्तं एगमेव अन्नाणं ॥ परिवजंतो गुत्तो, रक्खामि महव्वए पंच ॥ २० ॥ अणवज्जजो
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साधुसाध्वी गमेगं, सम्मत्तं एगमेव नाणं तु ॥ उवसंपन्नो जुत्तो, रक्खामि महब्बए पंच ॥२१॥ दो चेव. रागदोसे, प्रतिक्रमण ॥१६॥ दुण्णि अ झाणाइं अट्टरुद्दाइं ॥ परिवज्जतो गुत्तो रक्खामि महव्वए पंच ॥२२॥ दुविहं चरित्तधम्म,दुन्नि
अ झाणाई धम्म-सुक्काई॥ उवसंपन्नो जुत्तो, रक्खामि महव्वए पंच ॥२३॥ किण्हा नीला काउ, तिनिअर लेसाओ अप्पसत्थाओ॥ परिवज्जतो गुत्तो, रक्खामि महव्वए पंच ॥ २४ ॥ तेउ पम्हा सुक्का, तिन्नि अ | लेसाओ सुप्पसत्थाओ॥ उवसंपन्नो जुत्तो, रक्खामि महब्बए पंच ॥२५॥मणसा मणमच्चविऊ, वाया-|| | सच्चेण करणप्सच्चेण ॥ तिविहेण वि सच्चविउ, रक्खामि महब्बए पंच ॥ २६॥ चत्तारि अदुहसिज्झा, चउरो सन्ना तहा कसाया य ॥ परिवजंतो गुत्तो, रक्खामि महब्बए पंच ॥ २७॥ चत्तारि अ सुहसिज्झा, चविहं संवरं सभाहिज्जा ॥ उवसंपन्नो जुत्तो, रक्खामि महव्वए पंच ॥ २८ ॥ पंचेव य काम--
गुणे, पंचव य अण्हवे महादोसे ॥ परिवजंतो गुत्तो, रक्खामि महब्वए पंच ॥ २९ ॥ पंचिदिअसंवरणं, | ४) तहेव पंचविहमेव सज्झायं ॥ उवसंपन्नो जुत्तो, रक्खामि महब्बए पंच ॥ ३०॥ छज्जीवनिकायवहं, छप्पि ४ अ भासाओ अप्पसत्थाओ॥ परिवज्जतो गुत्तो, रक्खामि महन्वए पंच ॥३१॥ छव्विहमभितरयं,बझं
॥१६॥
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पि अ छव्विहं तवो कम्मं ॥ उवसंपन्नो जुत्तों, रक्खामि महव्वए पंच ॥ ३२ ॥ सत् य भयट्टाणाई, संतविहं चैव नाणविभंगं ॥ परिवजंतो गुत्तो, रक्खामि महव्वए पंच ॥ ३३ ॥ पिंडेसण-पाणेसण, उग्गह सत्ति कया महज्झयणा ॥ उवसंपन्नो जुत्तो, रक्खामि महत्वए पंच ||३४|| अट्ठ य मयट्टाणाई, अट्ठ य कम्माई तेसिं बंधं च ॥ परिवज्जंतो गुत्तो, रक्खामि महव्वए पंच ॥ ३५ ॥ अट्ठय पवयणमाया, दिट्ठा अटूविह निहिं ॥ उवसंपन्नो जुत्तो, रक्खामि महव्वए पंच || ३६ || नव पावनिआणाई संसारत्था य नवविहा जीवा ॥ परिवज्जं तो गुत्तो, रक्खामि महत्वए पंच ॥ ३७॥ नव वंभचेरगुत्तो, दुनवविहं बंभचेरपरिसुद्धं ॥ उवसंपन्नो जुत्तो रक्खामि महव्वए पंच ॥ ३८ ॥ उवघायं च दसविहं, असंघरं तह य संकिलेसं च ॥ पविज्जंतो गुत्तो, रक्खामि महव्वर पंच ॥ ३९ ॥ सच्चसमाहिट्ठाणे, दस चेत्र दसओ समणधम्मं च ॥ उवसंपन्नो जुत्तो, रक्खामि महव्वए पंच ॥ ४० ॥ आसायणं च सव्वं, तिगुणं इक्कारसं विवज्जंतो | परिवजंतो गुत्तो, रक्खामि महव्वए पंच ॥ ४१ ॥ एवं तिदंडविरओ, तिगरणसुद्धा तिमलनिसलो. ॥ तिविहेण पडिकतो, रक्खामि महव्वए पंच ॥ ४२ ॥
२ ॥
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मूत्र.
साधुसाध्वी
___ इच्चेइअं महब्वयउच्चारणं थिरत्तं सल्लुद्धरणं, धिइबलं ववसाओ, साहणट्ठो पावनिवारणं, निका- प्रतिक्रमण ॥१७॥ | यणा भावविसोहि पडाग्गहरणं, निजूहणाराहणा गुणाणं, संवरजोगो पसत्थज्झाणो, वउत्तया जुत्तया य,
नाणे परमट्टो उत्तमट्ठो य, एस खलु तित्थकरेहि, रइरागदोसमहणेहिं, देसिओ पवयणस्स सारो, छज्जीवनीकायसंजमं, उवएसिअं,तेलुकसक्कअं ठाणं, अब्भुवगया नमोत्थु ते, सिद्ध, बुद्ध, मुत्त, निरय, निसंग, माणमूरण, गुणरयणसायर, मणंतमप्पमेअं,नमोत्थु ते महइ महावीर वद्धमाणसामिस्स, नमोत्थु ते अरहओ, 15 | नमोत्थु ते भगवआ, तिकट्ट. एसा खलु महव्वयउच्चारणा कया ॥३॥ ___ इच्छामो सुत्तकित्तणं काउं, नमो तेसिं खमासमणाणं, जेहिं इमं वाइयं, छविहमावस्मयं भगवंतं तं जहा.
सामाइअं, चउवीसत्थओ, वंदणयं, पडिकमणं, काउसग्गो, पच्चक्खाणं. सव्वेसि पि एअम्मि छबिहे आवरस्सए भगवंते ससुत्ते, सअत्थे, सगंथे, सनिजुत्तीए, ससंगहणिए, जे गुणा वा, भावा वा, अरिहंतेहिं, भगवं४ तेहिं,पण्णत्ता वा, परूविआ वा, ते भावे सद्दहामो, पत्तियामो, रोएमो, फासेमो, पालेमो, अणुपालेमो, ते भावे ||
सदहंतेहिं, पत्तिअंतेहिं, रोअंतेहिं, फासंतेहिं, पालंतेहिं अणुपालंतेहिं, अंतोपक्खस्स जं वाइअं, पढिअं,
॥१७॥
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परिअट्टि पुच्छिअं, अणुपेहिअं, अणुपालिअं, तं दुक्खक्खयाए, कम्मक्खयाए, मुक्खयाए, बोहिलाभाए, 18/ है संसारुत्तारणाए. तिकट्ट, उवसंपज्जित्ता णं विहरामि.अंतोपक्खस्स, जं न वाइअं, न पढिअं, न परिट्टिअं, 8 18 नपुच्छिअं,नाणुपेहि, नाणुपालिअं, संते बले, संते वीरिए, संते पुरिसकारपडिक्कमे, तस्स आलोपमो,पडि-14 | कमामो, निंदामो, गरिहामो, विउट्टेमो, विसोहेमो, अकरणयाए अन्भुढेमो, अहारिहं तवोकम्मं, पायच्छित्तै ।
पडिवज्जामो, तस्स मिच्छामि दुकडं ॥ ४ ॥ | नमो तेसिं खमासमणाणं, जेहिं इमं वाइअंअंगबाहिरं उकालि भगवंतं, तं जहा. दसवेआलिअं,
कप्पिआकप्पिअं, चुल्लकप्पसुअं, महाकप्पसुअं, उवाइअं, रायप्पसेणिअं,जीवाभिगमो, पण्णवणा, महापन्न| वणा, नंदी, अणुओगदाराई, देविंदत्थुओ, तंदुलविआलिअं, चंदाविज्जिअं, पमायप्पमायं, पोरिसिमंडलं, | मंडलप्पवेसो, गणिविज्जा, विज्जाचारणविणिच्छओ, झाणविभत्ती, आणविभत्ती, मरणविभत्ती, आय-15 । विसोहि, संलेहणासुअं, वीयरायसुअं, विहारकप्पो, चरणविसोहि, आउरपच्चक्खाणं, महापचक्खाणं, स
व्वेसि पि एअम्मि, अंगबाहिरे उकालिए, भगवंते, ससुत्ते, सअत्थे, सगंथे, मनिज्जुत्तिए, ससंगहणिए, जा
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मूत्र.
॥१८॥
साधुसाध्वी | गुणा वा, भावा वा, अरिहंतेहिं, भगवंतेहिं, पण्णत्ता वा, परूविआ वा, ते भावे सद्दहामो, पत्तिआमो, रो- पतिक्रमण
एमो, फासेमो, पालेमो, अणुपालेमो, ते भावे सदहंतेहिं, पत्तिअंतेहिं, रोअंतेहिं, फासंतेहिं, पालंतेहिं, अणुपालंतेहिं, अंतोपक्खस्स, जं वाइअं, पढिअं, परिअट्टिअंपुच्छिअं, अणुपेहिअं, अणुपालिअं, तं दुक्खक्ख-11 याए, कम्मक्खयाए, मुक्खयाए, बोहिलाभाए, संसारुत्तारणाए, तिकट्ट, उवसंपज्जित्ताणं विहरामि, अं. | तोपक्खस्स, जं न वाहअं, न पढिअं, न परिअट्टिन पुच्छिअं, नाणुपहिअं, नाणुपालिअं, संते बले, संत । | वीरिए, संते पुरिसकारपरिफमे, तस्स आलोएमो, पडिकमामो, निंदामो, गरिहामो, विउट्टेमो, विमोहेमो, ४ अकरणयाए अब्भुट्टेमो, अहारिहं तवोकम्म, पायच्छित्तं पडिवज्जामो, तस्स मिच्छामि दुकडं ॥५॥
नमो तेसिं खमासमणाणं, जेहिं इमं वाइअं अंगबाहिरंकालिअंभगवंतं, तं जहा, उत्तरज्झयणाई, दसा * कप्पो, ववहारो, इसिभासिआई, निसीहं, महानिसहं, जंबुद्दीवपण्णत्ती, सूरपण्णत्ती, चंदपन्नत्ती, दीवसागर-2
पन्नत्ती,खुड्डियाविमाणपविभत्ती,महलिआविमाणपविभत्ती,अंगचूलिआए, वग्गचूलिआए,विवाहचूलिआए, १० ४ अरुणोववाए, वरुणोववाए, गरुलोववाए, धरणोववाए, वेलंधरोववाए, वेसमणोववाए, देविंदोववाए, उट्ठ
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Jain Education I
सुए, समुट्ठाणसुए, नागपरिआवलिआणं, निरयावलिआणं, कम्पिआणं, कप्पवडिंसिआणं, पुष्फिआणं, पुष्पिचूलिआणं, वण्हीयाणं, वहीदसाणं, आसीविसभावणाणं, दिडिविसभावणाणं, चारण सुमिणभावणाणं, महासुमिणभावणाणं, तेअग्गिनिसग्गाणं, सव्वेहिं पि एअंमि अंगवाहिरे कालिए भगवंते, ससुत्ते, सअत्थे, सगंथे, सणिज्जुत्तिए, ससंगहणिए, जे गुणा वा, भावा वा, अरिहंतेहिं, भगवतेहिं, पण्णत्ता वा, परुवीओ वा, | ते भावे सद्दहामो, पत्तिआमो, रोएमो, फासेमो, पालेमो, अणुपालेमो, ते भावे सद्दहंतेहिं, पत्तिअंतेहिं, रोयं| तेहिं, फासंतेहिं, पालंतेहिं, अणुपालंतेहिं, अंतोपक्खस्स जं वाइअं, पढिअं, परिअट्टिअं, पुच्छिअं, अणुपेहिअं अणुपालिअं, तं दुक्खक्खयाए, कम्म क्खयाए, मुक्खयाए, बोहिला भाए, संसारुचारणाए तिकडु, उवसंपज्जित्ताणं विहरामि, अंतोपक्खस्स जं न वाइअं, न पढिअं, न परिअहिअं, न पुच्छिअं, नाणुपहिअं, नाणुपालिअं, संते बले, संते वीरिए, संतेपुरिसक्कारपरिक्कमे, तस्स आलोयमो, पडिक्कमामो निदामो गरिहामो विउमो विसोमो अकरणयाए अब्भुट्ठेमो अहारिहंतवोकम्मं. पायच्छित्तं पडिवज्जमो तस्समिच्छामिदुक्कडं ॥ ६ ॥ नमोतसिं खमासमणाणं, जेहिं इमं वाइअं दुवालसंगं गणिपिडगं भगवंतं, तंजहा, आयारो, सुअगडो,
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सूत्र.
साधुसाध्वी है ठाणं, समवाओ, विवाहपन्नत्ती,नायाधम्मकहाओ,उवासगदसाओ, अंतगडदसाओ, अणुत्तरोक्वाइअदसा- पतिक्रमण ॥ १९॥
ओ, पण्हावागरणं, विवागसुअं, दिदिवाओ, सव्वेहिं पि एअंमि दुवालसंगे गणिपिडगे भगवंते, ससुत्ते, । सअत्थे, सगंथे, सणिज्जुत्तिए, ससंगहणिए, जे गुणा वा, भावावा, अरिहंतेहिं, भगवंतेहिं, पन्नत्ता वा, परूविआ वा, ते भावे सहहामो, पत्तिआमो, रोएमो, फासेमो, पालेमो,अणुपालेमो, ते भावे सद्दहंतेहिं, पत्तिअं६ तेहिं, रोयंतेहिं, फासंतेहिं, पालंतेहिं,अणुपालंतेहिं, अंतोपरखस्स,जं वाइअं,पढिअं, परिअट्टिअं, पुच्छि, द अणपहिअं.अणपालिअंतं दक्खक्खयाए कम्मक्खयाए. मक्खयाए बोहिलाभाए, संसारुत्तारणाए.तिहै कट्ट, उवसंपज्जित्ता णं विहरामि. अंतोपक्खस्स जं न वाइअं,न पढिअं, न परिअट्टिअं,न पुच्छिअं, नाहै। णुपेहिअं, नाणुपालिअं, संते बले, संते वीरिए,संते पुरिसकारपरिकमे, तस्स आलोएमो, पडिकमामो, नि। दामो, गरिहामो, विउट्टेमो, विसोहेमो, अकरणयाए अन्भुटेमो, अहारिहं तवोकम्मं, पायच्छित्तं पडिवज्जा-1 मो, तस्स मिच्छामि दुकडं ॥ ७॥
नमो तेसिं खमासमणाणं, जेहिं इमं वाइअं दुवालसंगं, गणिपिडगं, भगवंत, तं जहा. सम्मं कारणं, 8
॥१९॥
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Jain Education I
फासंति, पालंति, पूति, तीरंति, किहंति, सम्मं आणाए आराहंति, अहं च नाराहेमि, तस्स मिच्छामि दुक्कडं | ॥८॥ सुअदेवआ भगवई, नाणावरणी अकम्म संघायं ॥ तेसिं खवेउ सययं, जेसिं सुअसायरे भत्ती ॥१॥ इति पाक्षिकसूत्रं समाप्तं ॥ ७॥
॥ ८ श्री पाक्षिकखामणा ॥
इच्छामि खमासमणो पिअं च मे जंभे, हट्टाणं, तुट्ठाणं, अप्पायंकाणं, अभग्गजोगाणं, सुसीलाणं, सुव्वयाणं, सायरिय उवज्झायाणं, नाणेणं, दंसणेणं, चरित्तेणं, तवसा अप्पाणं, भावेमाणाणं, बहुसुभेण भे दिवसो पक्खो, (चाउमासिओ, संवच्छरिओ) वकतो, अन्नो य भे कल्लाणेणं, पज्जुवट्ठिओ, सिरसा, मणसा, मत्थपण वंदामि ॥ १ ॥ इति ॥ गुरुवचनं ॥ तुभेहिं सम्मं,
इच्छामि खमासमणो, पुव्विं चेइआई वंदित्ता, नमंसित्ता, तुब्भण्हं पायमूले, विहरमाणेणं, जे केह बहुदेवसिआ, साहुणो दिट्ठा समाणा वा, वसमाणा वा, गामाणुगामं दुइज्जमाणा वा, राइणिआसं पुच्छति,
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सूत्र.
साधुसाध्वी है। उमराइणिआ वंदति,अजया वदति अज्जियाओ वंदंति,सावया वंदति सावियाओ वंदंति,अहं पि निस्सल्लो, प्रतिक्रमण
| निक्कसाओत्तिकट्ट, सिरसा, मणसा, मत्थएण वंदामि ॥२॥इति ॥गुरुवचनं ॥ अहमविवंदामि चेइआई॥ ____इच्छामि खमासमणो, अब्भुष्टिओहं, तुब्भण्हं, संतिअं, अहाकप्पं वा, वत्थं वा, पडिग्गहं वा, कंबलं । वा, पायपुच्छणं वा,रयहरणं वा, अक्खरं वा, पयं वा, गाहं वा, सिलोगं वा, मिलोगढ़ वा, अझं वा, हे वा, पसिणं वा, वागरणं वा, तुब्भेहिं, यत्तेण दिन्नं, मए अविणएण, पडिच्छिअं, तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥३॥ इति॥ गुरुवचनं ॥ आयरियसंतिअं॥
इच्छामि खमासमणो, अहमपुबाई, कयाइं च मे, कियकम्माई, आयारमंतरे, विणयमंतरे, सेविओ, । सेवाविओ, संगहिओ, उवग्गहिओ, सारिओ, वारिओ, चोइओ, पडिचोइओ, चिअत्ता मे, पडिचोयणा, It १ अब्भुटिओ हं,तुन्भण्हं तवतेयसिरीए, इमाओ चाउरंतसंसारकंताराओ, साह, नित्थरिस्सामि तिकट्ट, | सिरसा, मणसा, मत्थएण वंदामि ॥ ४ ॥ इति ॥ गुरुवचनं ॥ ८॥ नित्थारगपारगा होह ॥
॥ इति पाक्षिकक्षामणा संपूर्णा ॥
CASECUREMORSCORRRRRENCY
शा॥ २० ॥
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कसकर
॥९॥ श्रीदशकालिक सूत्रके ४ अध्ययन ॥ धम्मो मंगलमुक्किटं, अहिंसा संजमो तवो॥ देवा वितं नमसंति, जस्स धम्मे सया मणो ॥१॥ जहा | | दुमस्स पुप्फेसु, भमरो आवियइ रसं ॥ न य पुष्पं किलामेइ, सो अ पीणेइ अप्पयं ॥२॥ एमेए समणा | वुत्ता, जे लोए संति साहुणो ॥ विहंगमा व पुप्फेसु, दाण-भत्तेसणे रया॥३॥ वयं च वित्तिं लब्भामो, | न य कोइ उवहम्मइ ॥ अहागडेसु रीयंते, पुप्फेसु भमरा जहा ॥ ४ ॥ महुकारसमा बुद्धा, जे भवंति अणिस्सिया ॥ नाणापिंडरया दंता, तेण वुच्चंति माहुणो॥५॥त्ति बेमि ॥ दुम्मपुष्फिअज्झयणं ॥१॥
कहं नु कुज्जा सामण्णं, जो कामे न निवारए ॥ पए पए विसीयंतो, संकप्पस्स वसं गओ ॥१॥18 वत्थ-गंध-मलंकार, इथिओ सयणाणि य ॥ अच्छंदा जे न भुंजंति, न से चाइ त्ति वुच्चइ ॥२॥ जे | अ कंते पिए भोए, लद्धे वि पिटि कुबई ॥ साहीणे चयइ भोए, से हु वाइ ति वुच्चइ ॥३॥ समाइ पेहाइ परिव्वयंतो, सिआमणो निस्सरइ बहिद्धा ॥ न सा महं नोवि अहं पि तीसे, इच्चेव ताओ विण- 12 इज रागं ॥ ४ ॥ आयावयाही चय सोगमलं, कामे कमाही कमियं खु दुक्खं ॥ छिंदाहि दोसं विणइ-18|
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साधुसाचा ज्ज रागं, एवं सुही होहिसि संपराए ॥५॥ पक्खंदे जलियं जोई, धूमके दुरासयं ॥ निच्छंति वंतयं
प्रतिक्रमण
प्रतिक्रमण ॥ २१॥ भोत्तुं, कुले जाया अगंधणे ॥६॥ धिरत्थु ते जसोकामी, जो तं जीवियकारणा॥ वंतं इच्छसि आवेडं, है। सूत्र.
से ते मरणं भवे ॥ ७ ॥ अहं च भोगरायस्स, तं च सि अंधगवन्हिणो मा॥कुले गंधणा होमो, संजमं निहुओ चर ॥ ८॥ जइ तं काहिसि भावं, जा जा दिच्छसि नारिओ ॥ वायाविधु व्व हडो, अहि| अप्पा भविस्सनि ॥ ९॥ तीसे सो वहणं सुच्चा, संजयाइ सुभासियं ॥ अकुंसेण जहा नागो, धम्मो सं-18 | पडिवाइओ ॥ १०॥ एवं करंति संबुद्धा, पंडिआ पवियक्खणा ॥ विणिअटुंति भोगेसु, जहा से पुरि-18
सुत्तमो ॥ त्ति बेमि ॥ ११ ॥ इति सामन्नपुब्वियज्झयणं ॥२॥ | संजमे सुष्ठिअप्पाणं, विप्पमुक्काण ताइणं ॥ तेसिमेअमणाइन्नं, निग्गंथाणं महेसिणं ॥१॥ उद्देसिअं कीअगडं, नियागमभिहडाणि अ॥ राइभत्ते सिणाणे अ, गंधमल्ले अ वीअणे ॥२॥ संनिही गि
हिमत्ते अ.राअपिंडे किमिच्छए। संवाहण दंतपहोअणाअ, संपुच्छण, देह पलोअणा अ ॥३॥ अट्ठावए | ॥२१॥ 18 अ नालीए, छत्तस्स य धारणट्ठाए ॥ तेगिच्छं पाहणापाए, समारंभं च जोइणो ॥४॥सिज्जाअरपिंडं च,8
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| आसंदी पलिअंकए ॥ गिहतर निसिज्जा अ, गायस्सुव्वट्टणाणि अ॥५॥ गिहिणो वेआवडिअं, जा | + अ आजीववत्तिआ॥ तत्तानिबुडभोइत्तं, आउरस्सरणाणि अ॥६॥ मूलए सिंगबेरे अ, उच्छुखंडे है
अ निबुडे ॥ कंदे मूले अ सचित्ते, फले बीए अ आमए ॥ ७ ॥ सोवच्चले सिंघवे लोणे, रोमालोणे अ
आमए ॥ सामुद्दे पंसुखारे अ, कालालोणे अ आमए ॥८॥ धुवणत्ति वमणे अ, वत्थीकम्म विरेअणे ॥ Bअंजणे दंतवण्णे अ, गायाभंगविभूसणे ॥ ९॥ सव्वमेअमणाइन्नं, निग्गंथाणं महेसिणं ॥ संजमंमि अ8 | जुत्ताणं. लहभूअविहारिणं ॥ १०॥ पंचासव परिण्णाया, तिगुत्ता छसुं संजया ॥ पंचनिग्गहणा धीरा, राष्ट्र निग्गंथा उज्झुदंसिणो ॥ ११ ॥ आयावयंति गिम्हेसु, हेमंतेसु अवाउडा ॥ वासासु पडिसंलीणा संजया । सुसमाहिआ॥ १२ ॥ परिसहरिउदंता, धूअमोहा जिइंदिआ॥ सब दुक्ख पहीणहा, पक्खमंति महे-18 | सिणो ॥१३॥ दुक्कराई करित्ताणं, दुस्सहाई सहेतु अ॥ केइत्थ देवलोएसु, केइ सिझंति नीरया ॥१४॥
खवित्ता पुवकम्माई, संजमणे तव्वेण अ॥ सिद्धिमग्ग मणुप्पत्ता, ताइणो परिनिव्वुडे ॥ त्ति बेमि ॥१५॥ ४ इति खुडुआयार कहज्झयणं संमत्तं ॥ ३॥
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साधुसाध्वी
॥ २२ ॥
सुअं मे आउसंतेणं, भगवया एवमक्खायं, इह खलु छज्जीवणिआ नाम अज्झयणं, समणणं भगवा महावीरेणं, कासवेणं पवेहुआ सु अक्खाया सुपन्नत्ता सेअं मे अहिजिउं अज्झयणं धम्मपन्नत्ती ॥ कयरा खलु साछज्जीवणिआ नामअज्झयणं समणेणं भगवया महावीरेणं कासवेणं पवेइआ सुअक्खाया सुपन्नत्ता सेअं मे अहिज्जिउं अज्झयणं धम्मपन्नत्ती । इमा खलु सा छज्जीवणिआ नाम अज्झयणं समणेणं भगवया महावीरेणं कासवेणं पवेश्या सुअक्खाया सुपन्नत्ता सेअं मे अहिज्जिउं अज्झयणं धम्मपन्नत्ती ॥
तं जहा पुढविकाइआ, आउकाइआ, तेजकाइआ, वाउका आ, वणस्सइकाइआ, तसकाइआ, पुढवि चित्त मंतमखाया अणेगजीवा पुढोसता अन्नत्थ सत्थ परिणएणं, आउ चित्तमंतमक्खाया अनंगजीवा पुढोसत्ता अन्नत्थ सत्थ परिणएणं. तेउ चित्तमंतमवखाया अणेगजीवा पुढोसत्ता अन्नत्थ सत्थ परिणणं, वाउ चित्तमं तमक्खाया, अणेगजीवा पुढोसत्ता अन्नत्थ सत्थ परिणएणं वणस्सः चित्तमं तमक्खाया, अणेगजीवा पुढोसत्ता अन्नत्थ सत्थ परिणएणं ॥ तं जहा. अग्गबीआ, मूलबीआ, पोरबीआ, खंधबीआ, बीअरु हा, संमुच्छिमा, तणलधा, वणस्सइकाइआ सबिआ चित्तमंतमक्खाया अणेगजीवा पुढोसत्ता अन्नत्थ
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प्रतिक्रमण
सूत्र.
॥ २२ ॥
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सत्थ परिणएणं । से जे पुण इमे अणेगे बहवे तसा पाणा, तं जहा, अंडया, पोयया, जराउआ, रसया, सं- 18 | सेइमा, संमुच्छिमा, उभिआ, उववाइआ, जसि केसिंचि पाणाणं अभिकंतं पडिकंतं संकुचिअं पसारिअं करुयं भंतं तसि पलाइअं आगइगइविन्नाया जे अकीडपयंगा। जे य कुंथुपिपीलिआ। सव्वे बेइंदिया | 8 सव्वे तेइंदिया सव्वे चउरिदिआ सव्वे पंचिंदिआ सव्वे तिरिक्खजोणिआ सव्वे नेरइआ सब्वे मणुआ है Mसव्वे देवा सब्वे पाणा परमाहाम्मआ सो खलछट्टो जीवनीकाओतसकाउत्ति पवच्चइ ॥ इच्चा
जीवनिकायाणं नेवसयं दंडं समारंभिज्जा नेवन्नेहिं दंडं समारंभाविज्जा दंडं समारंभंते वि अन्नं न स-18 & मणुजाणामि जावजीवाए तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए काएणं न करोमिन कारवेमि करतं पिअ॥ न तू २ समणुजाणामि तस्स भंते पडिक्कम्मामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वासिरामि ॥
पढमे भंते महब्बए पाणाइवायाओ वेरमणं सव्वं भंते पाणइवायं पच्चक्खामि से सुहुमं वा बायरं 2 ४वा तसं वा थावरं वा नेव सयं पाणे अइवाइजा नेवन्नेहिं पाणे अइवायाविजा पाणे अइवायंतेवि अन्ने न | ४ समणुजाणामि जावजीवाए तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कायेणं न करोमि न कारवमि करतंपि अन्ने |
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सूत्र.
साधुसाध्वी न समणुजाणामि तस्स भंते पडिक्कमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि । पढमे भंते महव्वए है ते प्रतिक्रमण ॥२३॥ है उवडिओमि सव्वओ पाणाइवायाओ वेरमणं ॥१॥ अहावरे दुच्चे भंते महव्वए मुसावायाओवेरमणं। सव्वं है।
भंते मुसावायं पच्चक्खामि से कोहा वा, लोहा वा, भयावा, हासावा। नेव सयं मुसं वइज्जा नेवन्नेहिं मु|सं वायाविज्जा मुसं वयंतेवि अन्ने न समणुजाणामि जावजीवाए तिविहं तिविहेणं मणणं वायाए कारणं ३ | न करोमि न कारवेमि करतंपि अन्नं न समणुजाणामि तस्स भंते पडिक्कमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं ४ | वोसिरामि । दुच्चेभंते महब्बए उवडिओमि सव्वाओ मुसावायाओ वेरमणं ॥२॥ अहावरे तच्चेभंते महव्वए अदिन्नादाणाओ वेरमणं । सव्वंभंते अदिन्नादाणं पच्चक्खामि से गामे वा नगेर वा रणे वा अ
अणुंवाथूलं वा चित्तमंतं वा अचित्तमंतं वा नेवसयं अदिन्नंगिण्हिज्जानिवन्नेहिं अदिन्नगिण्हा१ विज्जा अदिन्नंगिण्हंतेवि अन्ने न समणुजाणामि जावजीवाए तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए काएणं न ४ करेमि न कारवमि करतंपि अन्नं न समणुजाणामि तस्स भंते पडिक्कमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं ॥२३॥
वोसिरामि । तच्चेभंते महव्वए उवडिओमि सव्वओ अदिन्नादाणाओ वेरमणं ॥३॥ अहावरे चउत्थे भंते
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महब्बए मेहुणाओ वेरमणं सव्वं भंते मेहुणं पच्चक्खामि मे दिव्वं वा माणुसंवा तिरिक्खजोणिअंवानेव-18 २ सयं मेहुणं सेविज्जा नेवन्नेहिं मेहुणं सेवाविज्जा मिहुणं सेवंतेवि अन्ने न समणुजाणामि जावजीवाए ति-
विहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं न करेमि न कारवेमि करतंपि अन्नम्मणुजाणामि तस्स भंते प-2 13 डिक्कमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि । चउत्थे भंते महब्बए उवडिओमि सव्वाओ मेहुणाओ|
वेरमणं॥४॥अहावरे पंचमभंते महब्बए परिग्गहाओ वेरमणं सव्वंभंते परिग्गहं पच्चक्खामि से अप्पं वा बहुं || छावा अणुंवा थूलं वा चित्तमंतं वाअचित्तमंतं वा नेव सयं परिग्गरं परिगिण्हिज्जा नेवन्नेहिं परिग्गहं परिगिण्हा ||
विज्जा परिग्गहं परिग्गिण्हंतेवि अन्ने न समणुजाणिज्जाजावजीवाए तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं न करोमि न कारवेमि करतंपि अन्नं न समणुजाणामि तस्सभंते पडिक्कमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं है। वोसिरामि,पंचमे भंते महब्बए उवडिओमि सव्वाओ परिग्गहाओवरमणं॥५॥अहावरे छठे भंते वए राइभो-2 अणाओ वेरमणं सव्वं भंते राइभोअणं पञ्चक्खामि से असणं वा पाणं वा खाइमं वा साइमं वा नेव सयं| राई मुंजेज्जा नेवन्नेहिं राई भुंजाविज्जा राई भुंजतेवि अन्ने न समणुजाणिज्जा जावजीवाए तिविहं ति-18
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सूत्र.
साधुसाध्वी होता
ध्वाला विहेणं मणेणं वायाए कारणं न करेमि न कारवमि करतंपि अन्ने न समणुजाणामि तस्स भंते पडिक्कमामि प्रतिक्रमण ॥ २४॥ निंदाभि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि, छठे भंते वए उवटिओमि सव्वाओ राइभोअणाओ वेरमण॥६॥
इच्चेयाइं पंच महव्वयाई राइभोअणवेरमणछट्टाई अत्तहिअट्ठआए उवपज्जिता णं विहरामि ॥६॥
से भिक्खु वा भिक्खुणी वा संजय विरय पडिहय पच्चक्खाय पावकम्मे दिआवाराओवा एगओवा परिसागओवा सुत्ते वा जागरमाणे वा से पुढविंवा भित्तिं वा सिलं वा लेटुवा ससरक्खं वा कायं ससरक्खं वा वत्थं | हत्थेणं वा पाएणवा कट्टेण वा किलिंचेणवा अंगुलिआए वा सिलागाए वा सिलागहत्येण वा नआलिहिज्जान | विलिहिज्जा न घट्टिज्जा न भिंदिज्जा अन्नं न आलिहाविज्जा न विलिहाविजा न घटाविज्जा न भिंदा
विज्जा अन्नं आलिहंतं वा विलिहंतं वा घटुंतं वा भिंतं वा न समणुजाणामि जावजीवाए तिविहं ति१ विहेणं मणणं वायाए कारणं न करोमि न कारवेमि करतंपि अन्ने न ममणुजाणामि तस्सभंते पडिक्क- 2 B/मामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि॥१॥ से भिक्खु वा भिक्खुणी वा संजय विरय पडिहय ॥२४॥ पच्चक्खाय पावकम्मे दिआवा राओ वा एगओ वा परिसागओ वा सुत्ते वा जागरमाणे वा से उदंगं ।
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18 वाआसं वा हिमं वा महिअंवा करंग वा हरतणुगं वा सुद्धोदगंवा उदउल्लं वा कायं उदउल्लंवा वत्थं ससिणिद्धं वा ।
कायं समिणिद्धंवा वत्थं न आमासिज्जा न संफसिजा न आविलिज्जा न पविलिज्जा न अक्खोडिज्जा न पक्खोडिज्जा न आयाविज्जा न पयाविज्जा अन्नं न आमुसाविज्जा न संफुमाविज्जा न आवी| लाविज्जा न पवीलाविज्जा न अक्खोडाविज्जा न पक्खोडाविज्जा न आयाविज्जा न पयाविज्जा
अन्नं आमुसंतं वा संफुसंतं वा आवीलंतं वा पविलंतं वा अक्खोडंतं वा पक्खोडतं वा आयावंतं वा । पयावंतं वा न समणुजाणेज्जा जावजीवाए तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं न करेमि न कारवेमि || करतंपि अन्नं न समणुजाणामि तस्स भंते पडिक्कमामि निंदामि गरिहामि अपाणं वोसिरामि ॥२॥ से भिक्खू वा भिक्खुणि वा संजय विरय पडिहय पञ्चक्खाय पावक्कमे दिआवाराओवा एगओवा परिसागओवा सुत्ने वा जागरमाणे वा, से अगाणं वा इंगालं वा मुम्मुरंवा आच्चिं वा जालं वाअलायं वा सुद्धागणिं वा उक्कं वान उंजेज्जा न घटेज्जा न भिदेज्जा न उज्जालेज्जा न पज्जालेज्जा न निवावेज्जा अन्नं न जावेज्जा न घटावेज्जा न भिंदावेज्जा न उज्जालावेज्जा न पज्जालावेज्जा न निव्वा
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साधुसाध्वी
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॥२५॥
मत्र
प्रतिक्रमण ४ वेज्जा अन्नं उजतं वा घतं वा भिदंतं वा उज्जालंतं वा पज्जालंतं वा निव्वावंतं वा न समणुजाणेज्जा जाव-18
जीवाए तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं न करेमि न कारवेमि करतपि अन्नं न समणुजाणामि | तस्स भंते पडिक्कमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥ ३ ॥ से भिक्खु वा भिक्खुणी वा संजय विरय पडिहय पच्चक्खाय पावकम्मे दिआ वा राओ वा एगओ वा परिसागओ वा सुत्ते वा। जागरमाणे वा से सिरण वा विहुयणेण वा तालिअंटेण वा पत्तेण चा पत्तभंगेण वा साहाए वा साहाभ
गेण वा पिहुणेण वा पिहुणहत्थेण वा चेलेण वा चेलकणेण वा हत्थेण वा मुहेण वा अप्पणो वा कायं । हैवाहिरंवावि पुग्गलं न फुमेजा न वीएजा अनं न फुमावेजा न वीआवजा अन्नं फुमंतं वा वीअंतं वा ६ | न समणुजाणेज्जा जावज्जीवाए तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं न करोमि न कारवेमि करतपि है।
अन्नं न समणुजाणामि तस्स भंते पडिक्कमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥ ४॥ से | भिक्खु वा भिक्खुणीवा संजय विरय पडिहय पच्चक्खाय पावकम्मे दिआवाराओवा एगओवा परिसा-18॥२५॥ गओ वा सुत्ते वा जागरमाणे वा से बीएसु वा बीअपहढेसु वारूढेसु वारुढपइट्टेसु वा जाएसुवा जाय-11
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1 पइट्टेसु वा हरिएसु वा. हरिअपइट्टेसुवा छिन्नेसु वा छिन्नपइट्ठेसु वा सचित्तेसु वा सचित्तकोलपडिनिस्सिएसुहै।
वा न गच्छेज्जा न चितुज्जा न निसीएज्जा न तुअमुज्जा अन्नं न गच्छावेज्जा न चिट्ठावेज्जा न निसी आवेज्जा न तुअद्यावेज्जा अन्नं गच्छंतं वा चिटुंतं वा निसीअंतं वातुअटुंतं वा न समणुजाणेज्जा जावजीवाए तिविहं तिविहणं मणेणं वायाए कारणं न करेमि न कारवेमि करतपि अनंन समणुजाणामि तस्स भंते पडिक्कमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥ ५॥ से भिक्खु वा भिक्खुणी वा संजय वि. ४/रय पडिहय पच्चक्खाय पावकम्मे दिआ वा राओ वा एगओ वा परिसागओ वा सुत्ते वा जागर-18
माणे वा से कीडं वा पयंग वा कुंथु वा पिपलिअं वा हत्थंसि वा पायंसि वा बाहुंसि वा ऊरंसि वा उ| दरंसि वा सीसंसि वा वत्थंसि वा पडिग्गहंसि वा कंबलंसि वा पायपुंछणसि वा रयहरणसि वा गोच्छगसि वा उंडगंमि वा दंडगंसि वा पीढगंसि वा फलगंसि वा सेजगंसि वा संथारगनि वा अन्नयरंसि वा। तहप्पगारे उवगरणजाए तओ संजयामेव पडिलेहिअ पडिलेहिअ पमाजअ पमज्जिअ एगंतमवणेज्जा 2 नो णं संघायमावज्जेजा ॥६॥
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साधुसाध्वी
॥ २६ ॥
अजयं चरमाणां अ, पाणभूआई हिंसइ || बंधई पावयं कम्मं, तसे हाइ कडुअं फलं ॥ १ ॥ अजयं चिट्ठमाणो अ, पाणभूआई हिंसइ || बंधई पावयं कम्मं, तंसे होइ कडुअं फलं ॥ २ ॥ अजयं आसमाणो अ, पाणभूआई हिंसई ॥ बंधई पावयं कम्मं तं से हाइ कडुअं फलं ॥ ३ ॥ अजयं सयंमाणो अ, पाणभूआई हिंस || बंधई पावयं कम्मं तं से होइ कडुअं फलं || ४ || अजयं भुजमाणो अ | पाणआई हिंसइ || बंधई पावयं कम्मं तं से होइ कडुअं फलं ॥ ५ ॥ अजयं भासमाणो अ, पाणभूआ हिंसह || बंध पावयं कम्मं तं से होड़ कडुअं फलं ॥ ६ ॥ कहं चरे कहं चिट्टे, कहमासे कहं सये ॥ कहं भुजतो भासतो, पावं कम्मं न बंधइ ? ॥ ७ ॥ जयं चरं जयं चिट्टे जयमासे जयं सये ॥ जयं भुजतो भाषतो पावं कम्मं न बंधइ ॥ ८ ॥ सव्वभूअप्पभूअस्स, सम्यं भूआई पासओ ॥ पहिआसवस्स दंतस्स, पावं कम्मं न बंधइ ॥ ९ ॥ पढमं नाणं तओ दया, एवं चिट्टः सव्वसंजए || अ-नाणी किं काही, किंवा नाही छेअं पावगं ॥ १० ॥ सोचा जाणइ कलाणं, सोच्चा जाणड़ पावगं ॥ उभयं पि जाणइ सोच्चा, जं सेअं तं समायरे ॥ जो जीवे विन याणेड़, अजीवे वि न याणेह ||
११ ॥
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प्रतिक्रमण
सूत्र.
॥ २६ ॥
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RECORNER
| जीवाजीवे अयाणंतो, कह सोनाहीइ संजमं ॥ १२ ॥ जो जीवे वि वियाणेइ, अजीवे वि वियाणेइ ॥ | जीवाजीवे वियाणतो, सोहु नाहीइ संजमं ॥१३॥ जया जीवमजीवे य, दोवि एए वियाणइ ॥ तया गई है। बहुविहं, सबजीवाण जाणइ ॥१४॥ जया गई बहुविहं, सव्वजीवाण जाणइ ॥ तया पुण्णं च पावं च, बंधं मुखवं च जाणइ ॥ १५ ॥ जया पुण्णं च पावं च, बंधे मुख्खं च जाणइ ॥ तया निविंदए भोए, 12 जे दिवे जे अ माणुसे ॥ १६ ॥ जया निविदर भोए, जे दिव्वे जे अ माणुसे ॥ तया चयइ संयोगं, मभितर बाहिरं ॥ १७ ॥ जया चयइ संयोगं, सभितर वाहिरं॥ तया मुंडे भवित्ताणं, पब्वइए अण-18 गारिअं ॥ १८ ॥ जया मुंडे भवित्ताणं, पब्वइए अणगारिअं ॥ तया संवरमुक्टि, धम्मं फासे अणुत्तरं
॥ १९ ॥ जया संवरमुक्किटुं, धम्म फासे अणुत्तरं ॥ तया धुणइ कम्मरयं अघोहि कलुसं कडं ॥२०॥ । जया धुणइ कम्मरयं, अबाहि कलुसं कडं ॥ तया सव्वत्तगं नाणं, दंसणं, चाभिगच्छइ ॥ २१॥ जया , | सव्वत्तगं नाणं, दंसणं चाभिगच्छइ ॥ तया लोगमलोगं च, जिणो जाणइ केवली ॥ २२ ॥ जया लोगमलोगं च, जिणो जाणइ केवली ॥ तया जोगे निलंभित्ता, सेलेसिं पडिवज्जइ ॥ २३ ॥ जया जोगे
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साधुसाध्वी
॥ २७ ॥
निरुभित्ता, सेलेसिं पडिवज्जइ ॥ तया कम्मं खवित्ताणं, सिद्धिं गच्छइ नीरओ ॥ २४ ॥ जया कम्मं खवित्ताणं, सिद्धिं गच्छइ नीरओ ॥ तया लोगमत्थयत्थो, सिद्धो हवइ सासओ || २५ || सुहमायगस्स समणस्स, साया लग्गस्स निगामसाइस्स || उच्छोलणापहोअस्स, दुलहा सुगड़ तारिसगस्स ॥ २६ ॥ तवोगुणपाणस्स, उज्जुमइ खंति संजमरयस्स || परीसहे जिणंतस्स, सुलहा सुगइ तारिसगस्स ॥२७॥ पच्छा वि ते पयाया, खिप्पं गच्छंति अमरभवणाई ॥ जेसिं पिओ तवो संजमो अ, खंती अबंभचेरं च ॥२८॥ इअं छज्जीवणिअं सम्मदिट्टी सया जए || दुल्लहं लहित्तु सामन्नं, कम्मुणा न विराहिज्जासि ॥ त्ति बेमि ॥ २९ ॥ उत्थं छज्जीवणिआ णामज्झयणं संम्मत्तं ॥ ४॥
॥ श्री अजित शान्तिस्तवनम् ॥
अजियं जियसव्वभयं, सतिं च पसंतसव्वगयपावं || जयगुरु संतिगुणकरे दोवि जिणवरे पणिवयामि ॥ १ ॥ गाहा ॥ ववगयमंगुलभावे, तेहं विउलतव निम्मलसहावे || निरुवममहम्पभावे, थोसामि सुदिट्ठसम्भावे ||२|| गाहा ॥ सव्वदुक्खपसंतीणं ॥ सव्वपाव पसंतीणं ॥ सया अजियसंतीणं, नमो अ
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प्रतिक्रमण
सूत्र.
॥ २७ ॥
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|| जिय-संतीणं ॥ सिलोगो ॥ ३॥ अजियजिणसुहपवत्तणं तवपुरिसुत्तमनामकित्तणं ॥ तह य घिइमइ
पवत्तणं, तव य जिणुत्तम संतिकित्तणं ॥ ४ ॥ मागहिया ॥ किरियाविहिसंचियकम्मकिलेसविमुक्खयरं। अजियं निचियं च गुणेहिं महामणिसिद्धिगयं ॥ अजियस्स य संतिमहामणिणो विय संतिकरं । सययं । मम निव्वुइकारणयं च नमसणयं ॥ ५॥ आलिंगणयं ॥ पुरिसा जइ दुक्खवारणं, जइय विमग्गहसु-१
खकारणं ॥ अजियं संतिं व भावओ, अभयकरे सरणं पव जहा ॥ ६ ॥ मागहिया ॥ अरइरइतिमि-18 ६ रविरहिय-मुवरयजरमरणं । सुरअसुरगरुलभुअगवइ-पययपणिवइअं॥ अजियमहमवि य सुनयनयनिउ-18 | णमभयकरं । सरणमुवसरिअ भुविदिविज्जमहियं सययमुवणमे ॥ ७॥ संगययं ॥ तं च जिणुत्तममुत्त
मनित्तमसत्तधरं, अज्जवमद्दवखंतिविमुत्तिप्तमाहिनिहिं ॥ संतिकरं पणमामि दमुतमतित्थयरं, संतिमुणी है | मम संतिसमाहिवरं दिसओ८॥ सोवाणयं। सावत्थि-पुब्बपत्थिवं च वरहत्थी मत्थय पसत्थ विच्छिन्नसंथियं । थिरमरिच्छवच्छं मयगललीलायमाणारगंधहत्थिपत्थाणपत्थियं संथवारिहं ॥ हथिहत्थबाहुं धंतकणगरुअगनिरुवहयपिंजरं, पवरलक्खणोवचियं सोमचारुरूवं । सुइसुह-मणाभिरामपरमरमणिज्जवरदे
बराबर
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॥२८॥
साधुसाध्वी वदंदुहिनिनायमहुरयरसुहगिरं ॥ ९॥ वेढओ ॥ अजियं जिआरिगणं, जिअसव्वभयं भवो हरि ॥ है, प्रतिक्रमण
| पणमामि अहं पयओ. पावं पसमेउ मे भयवं ॥१०॥रासालद्धओ॥ करुजणवय-दृत्थिणाउरनरीसरो। सूत्र.
पढमं तओ महाचक्कवाट्टिभोए महप्पभावो, जो बावत्तरिपुरवरसहस्सवरनयर-निगम-जणवयवई, बत्तीसा| रायवरसहस्साणुयायमग्गो ॥ चउद्दसवररयण-नवमहानिहि-चउसहिसहस्सपवरजुबईण सुंदरवई, चुलसी-1
हय-गय-रहसयसहस्ससामी, छन्नवहगामकोडीसामी आसि जो भारहम्मि भयवं ॥११॥ वेडओ॥ तं संति 81 | मंतिकरं, मंतिनं सब्वभया ॥ संतिं थुगामि जिणं, संति विहेउ मे ॥ १२ ॥ रासानंदिरं ॥ इक्खाग! | | विदेहनरीसर ! नरवसहा! मुणिवसहा!। नवसारयससिसकलाणण, विगयतमा विहुअरया ॥ अजिउत्त। मतेअगुणेहिं महामुणिअमिअबला विउलकुला । पणमामि ते भवभयमूरण जगसरणा मम सरणं ॥१३॥ | चित्तलेहा॥ देव-दाणविंद-चंद-सूरवंद हट्ठ-तुट्ट-जिट्ट-परम, लहरूवधंतरूप्पपट्टसेयसुद्धनिद्धधवल! दंतपंति॥ | संति! सत्ति-कित्ति-मुत्ति-जुत्ति-गुत्तिपवर, दित्ततेय वंदधेय सब लोअभाविअप्पभाव णे य पइस मे समाहिं ॥२८॥ ॥१४॥ नारायओ ॥ विमलससिकलाइरेअसोमं, वितिभिरसूरकलाइरेअतेअं॥ तिअसवइगणाइरेअरूवं,
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घरणिधरपवरा इरे असारं ॥ १५ ॥ कुसुमलया || सत्ते य सया अजिअं, सारीरे अ बले अजियं ॥ तव | संजमे अ अजियं, एस थुणामि जिणमजियं ॥ १६ ॥ भुअगपरिरंगियं ॥ सोमगुणेहिं पावर न नव| सरयससी, तेअगुणेहिं पावइ न तं नवसरयरवि || रूवगुणेहिं पावइ न तं तियसगणवई । सारगुणहिं पावर न तं धरणिधरवई ॥ १७ ॥ खिजिअयं ॥ तित्थवरपवत्तयं तमरयर हियं धीरजणथुअच्चिअं चुअकलिकलुसं. संति-सुहपवत्तयं तिगरणपयओ संतिमहं महामुणिं सरणमुवणमे ॥ १८ ॥ ललिअयं ॥ विणओणयसिरिरइअंजलिरिसिगणसंधुअं थिमिअं । विबुहाहव-घणवइ-नरवइ थुअमहिअच्चि बहुसो ॥ अइ रुग्गयसर यदिवायरस महियसप्पभं तवसा । गयणंगणविहरणसमुइअचारणवंदिअं सिरसा ॥ १९ ॥ किसलयमाला || असुरगरुलपरिवंदियं, किन्नरो - रगनमंसियं ॥ देवकोडिसयसुंथुअं, समण संघपरिवदिअं ॥ २० ॥ सुमुहं ॥ अभयं अहं अरयं अरुयं । अजिअं अजिअं पयओ पण ॥ २१ ॥ विज्जवल - सियं ॥ आगया वरविमाणादिव्वकणगरह -तुरय- पहकरसएहिं हुलिअं । ससंभमोअरणखुभिअ- लुलियचलकुंडलं-गय-तिरीडसोहंतमउलिमाला ॥ २२ ॥ वेडओ || जं सुरसंघा सासुरसंघा वेरविउत्ता भत्तिसु
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साधुसाध्वी
॥२९॥
प्रतिक्रमण जुत्ता, आयरभूसिअ-संभमापडिय-सुहसुविम्हिअ-सव्वबलोघा । उत्तमकंचण-रयणपरूविअभासुरभूसण-18 भासुरिअंगा, गायसमोणयभत्तिवसागय-पंजलिपेसियसीसपणामा ॥ २३ ॥ रयणमाला ॥ वंदिऊण थो- सूत्र. ऊण तो जिणं, तिगुणमेव य पुणो पयाहिणं । पणमिऊण य जिणं सुरासुरा, पमुइआ सभवणाई तो है
गया ॥ २४ ॥ खित्तयं ॥ तं महामुणिमहं पि पंजली, राग-दोस-भय-मोहवज्जियं । देव-दाणव-नरिंदवं-2 ४ दिअं संतिमुत्तमहातवं नमे ॥ २५॥ खित्तयं ।। अंबरंतरविआरणिआहिं, ललिअहंसवहुगामणिआहिं॥1
पीणसोणित्थणसालिणिआहिं, सकलकमलदललोयणिआहिं ॥ २६ ॥ दीवयं ।। पीण-निरंतरथणभरवि-181 हैणमियगायलयाहिं, मणि-कंचणपसिढिल-मेहलसोहिअसोणितडाहिं ॥ वरखिखिणि-नेऊर-सतिलय-वलय-18 विभूसणिआहिं, रइकरचउरमणोहर-सुंदरदंसणियाहिं ॥ २७ ॥ चित्तक्खरा ॥ देवसुंदरीहिं पायवंदिआहिं वंदिआ य जस्स ते सुविकमा कमा अप्पणो निडालएहिं मंडणोड्डणप्पगारएहि केहि केहिं वी ।।
अवंग-तिलय-पत्तलेहनामएहिं चिल्लएहिं संगयं गयाहिं । भत्तिसन्निविठ्ठवंदणागयाहिं हुंति ते वंदिया पुणो ॥२९॥ BI पुणो ॥ २८ ॥ नारायओ ॥ तमहं जिणचंदं अजिअं जियमोहं । धुयसबकिलेत पयओ पणमामि ।
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18 ॥ २९॥ नंदिययं ॥ थुअवंदिअस्सा रिसिगण-देवगणेहिं तो देववहुहिं पयओ पणमियस्सा । जस्स
जगुत्तमसासणअस्सा भत्तिवसागयपिडियआहिं । देववरच्छरसा बहुआहिं । सुरवररइगुणपिंडियआहिं |॥ ३० ॥ भासुरयं ॥ वंससद-तंतितालमेलिए, तिउक्खराभिरामसदमीसए कए अ, सुइसमाणणे य सुद्ध | सज्जगीयपायजालघंटियाहिं । वलय-मेहलाकलाव-नेउराभिरामसहमसिए कए य ॥ देवनट्टिआहिं हाव । | भाव-विभमप्पगारएहिं नच्चिऊण अंगहारएहिं वंदिआ य जस्स ते सुविकमा कमा तयं तिलोयसव्वस| त्तसंतिकारयं । पसंतसव्वपाव-दोस-मेसहं नमामि मंतिमुत्तिमं जिणं ॥ ३१ ॥ नारायओ॥ छत्त-चामर | पडाग-जूअ-जवमंडिया-झयवर-मगर-तुरग-सिरिवच्छसुलंछणा ॥ दीव-समुद्द-मंदिर-दिसागयसोहिया सथिय-वसह-सीह-रह-चकवरंकिया (सिरिवच्छसुलंछणा)॥ ३२ ॥ ललिअयं ॥ सहाबलट्टा समइप्पइट्टा,
अदोसदुट्ठा गुणेहिं जिट्टा । पसायसिट्ठा तवेणपुट्ठा, सिरिहिंइट्टा रिसीहिंजुट्ठा ॥ ३३ ॥ वाणवासिया ॥ | ते तवेण धुअसव्वपावया, सव्वलोगहियमूलपावया । संथुया आजिअ-संति पायया हुंतु मे सिवसुहाण दायया ॥ ३४ ॥ अपरांतिका ॥ एवं तव बलविउलं थुअंमए आजअ संतिजिणजुअलं ॥ ववगयकम्म
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सत्र
प्रतिक्रमण साधुसाध्या रयमलं. गइं गयं मासयं विउलं ॥ ३५॥ गाहा ॥ तं बहुगुणप्पसायं, मुक्खसुहेण परमेण अविसायं । ॥३०॥ नासेउ मे विसायं कुणउ अ परिसावि य पसायं ॥ ३६ ॥ गाहा ॥ तं मोएउ अनंदि पावेउ अनंदिसे- I
णम-भिनंदि । परिसा वि अ सुहनंदि, मम य दिसउ संजमे नंदि ॥ ३७॥ गाहा ॥ पक्खिय चाउ-12 | म्मासियसंवच्छरिए अवस्स भणियब्यो । सोअब्वो सब्वेहिं, उवसग्गनिवारणो ऐसो ॥ ३८ ॥ जो पढइ | जो अनिसुणइ, उभओ कालंपि । अजिय संतिथयं नहु हुंति तस्स रोगा पुव्वुप्पुना विणासंति ॥३९॥४॥
जइ इच्छह परमपयं अहवा कित्तिं सुवित्थडां भुवणे । ता तिल्लुक्कुधरणे जिणवयणे आयरं कुणह 8/ 18॥ ४० ॥ इति आजेत-शान्तिस्तवनं संपूर्णम् ॥
॥अथ जयतिहअण स्तोत्रम ॥ जय तिहुअणवरकप्परुक्ख ! जय जिण ! धन्वंतरि !, जय तिहअणकलाणकोस ! दुरिअकरिके-12 सरि ! ॥ तिहु अणजणअविलंघिआण ! भुवणत्तयमामिअ ! कुणसु सुहाई जिणेस ! पास ! थंभणय-12॥३०॥ पुरटिअ ! ॥ १॥ तइंसमरंत लहति झत्ति वरपुत्त कलत्तइ, धण्ण सुवन्न हिरण्णपुण्णजण भुंजइ रजइ।
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४ पिक्खइ मुक्खं असंखसुक्खं तुह पास ! पसाइण, इय तिहुअणवरकप्परुक्ख ! सुक्खइ कुण मह जिण | है॥२॥ जरजजर परिजुण्णकण्णनडुट्ट सुकुट्टिण, चक्खुक्खीण खएण्ण खुण नर सल्लिअ सूलिण ॥ तुह है | जिण सरणरसायणेण लहु हुंति पुण्णं णव, जय धणंतरि पास ! मह वि तुहं रोगहरो भव ॥ ३॥ वि-|
ज्जा-जोइस-मंत-तंत-सिद्धिउ अपयत्तिण, भुवणब्भुउ अट्टविहासद्धि मिज्झइ तुह नामिण ॥ तुह नामिण || | अपवित्तओ वि जण होइ पवित्तओ, तं तिहुअणकल्लाणकोस तुह पास ! निरुत्तओ ॥ ४ ॥ खुद्दपवत्तइ मंत-तंत्त-जंताई विसुत्तइ, चर-थिरगरल-गहुग्गखग्ग रिउवग्ग विगंजइ ॥ दुत्थियसत्थ अणत्थवत्थ ||
नित्थारइ दयकरि, दुरिअई हरउ सुपासदेव ! दुरिअकरिकेसरि ॥ ५॥ तुह आणा थंभेइ भीम-दप्पु-14 है दुरसुरवर-रक्खस-जक्ख-फणिंदविंद-चोराऽनल-जलहर ॥ जल-थलचारिरउद्द-खुद्दपसु-जोइणि-जोइअ, है है इअ तिहुअणअविलंधिआण जय पास ! सुसामिअ !॥ ६॥ पत्थिअ अत्थ अणत्थ तत्थ भात्तिभर
निम्भर, रोमंचंचिअचारुकायाकण्णर-नर-सुरवर ॥ जसु सेवहि कमकमलजुअल पक्खालिअकलिमलु, IP ॐ सो भुवणत्तयसामि पास ! मह मद्दउ रिउबलु ॥ ७॥ जय जोइअमणकमलभसल! भयपंजरकुंजर, ति
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साधुसाध्वी
॥ ३१ ॥
| हुअणजणआणंदचंद ! भुवणत्तयदिणयर ! | जय मइमेइणिवारिवाह ! जय जंतुपिआमह, थंभ अ अ ! पासनाह ! नाहत्तण कुण मह ॥ ८ ॥ बहुविह वन्नु अवन्नु सुष्णु वण्णिओ छप्पणिहि मुक्खधम्म - कामत्थकाम नर नियनियसत्थिहि ॥ जं ज्झायइ बहुदरिसणत्थ बहुनामपसिद्धउ, सो जोड़ अमण| कमलभसल सुह पास पवद्धउ ॥ ९ ॥ भयविव्भलरणजाणिरदसण थरहरिअसरीरय, तरलिअनयण विसुण्ण सुण्ण गग्गिरगिर करुणय || तई सहसात्त सरति हुंति नर नामिअ- गुरुदर, मह विज्झवि सज्झ| सइ पास ! भयपंजरकुंजर ! ॥ १० ॥ पई पास विविअसंतनित्तपत्ततपवित्तिय बाहपवाहपवूढरूढदुह| दाह सुपुलइय || मण्णइ मण्णु सउण्णु पुण्णु अप्पाणं सुर-नर, इय तिहुअणआनंदचंद ! जय पास जिणेसर ! ॥ ११ ॥ तुह कलाण महेसु घंटटंकार वपिल्लिअ, वल्लिरमल्ल महल्लभत्ति सुरवर गंजुल्लिअ ॥ ह ल्लुप्फालअ पंवत्तयति भवणेहि महूसव, इय तिहुअणआणंदचंद ! जय पास सुहुन्भव ॥ १२ ॥ निम्मलकेवल किरणनियर विहुरिअतमपहयर, दंसिअसयलपयत्थसत्य वित्थरिअ पहाभर ॥ कलिकलुसिअजणघूअलोय लोयणह अगोयर, तिमिरइ निरुहय पासनाह भुवणत्तयदिणयर ॥ १३ ॥ तुह समरणजल
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प्रतिक्रमण
सूत्र.
॥ ३१ ॥
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18 वरिससित्तमाणवमइ-मेणि, अवरावरसुहुमत्थबोहकंदलदलरहाण ॥ जायइ फलभरभरिय हरिय दुहदा-18 है हअणोवम, इय मइमेइणिवारिवाह दिस पास मई मम ॥ १४ ॥ कय अविकलकल्लाणवल्लि रल्लूरियदुहवणु, दाविअसग्ग-पवग्गमग्ग दुग्गइगमवारणुं ॥ जय जंतुहजणएण तुल्लं जं जणियहियावहु, रम्मु धम्मु सो जयउ पास जय जंतुपिआमहु ॥ १५॥ भुवणा रणनिवास दारिअ परदरिसणदेवय, जोइणि 2
पूअण खित्तवाल खुद्दासुर पसुवय ॥ तुह उत्तट्ट सुन सुट्ठ अविसंठुलु चिट्टहि, इय तिहुअणवणसीह | & पास ! पावाइ पणासहि ॥ १६ ॥ फणिफणफारफुरंतरयणकररंजिअनहयल, फलिणीकंदल दल तमाल निल्लुप्पलसामल ॥ कमठासुरउवसग्गवग्गसंसग्गअगंजिअ, जय पच्चक्ख जिणेस पास थंभणयपुराष्टि ॥ १७ ॥ मह मणु तरलु पमाणु ने य वाया वि विसंठुलु, नियतणुरवि अविणयसहावु अलसविहिलंघलु ॥ तुह माहप्पु पमाणु देव कारुण्णपवित्तउ, इय मइ मा अवहीरि पास पालिहि विलवंतउ ॥ १८॥ किं किं कपिउ ण य कलुणु किं किं व न जांपेउ, किं व न चिहिउ किछु देव दीणयमविलंबिउ ॥का| सु न किय निष्फललल्लि अह्महेहिं दुहत्तई, तह वि न पत्तउ ताणु किंपि पइं पहु परिचत्तई ॥ १९ ॥
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॥३२॥
साधुसाध्वी है
व तुहु सामिउ, तुहुं माय बप्पु, तुहुं मित्त पियंकर, तुहुँ गइ, तुहुं मइ, तुहुं जि ताणु, तुहुँ गुरु, खमंकरु॥ प्रतिक्रमण
हउं दुहभरभारिउ वराउ राओल निव्भग्गउ, लीणउ तुह कमकमलसरणु जिण पालहि चंगउ ॥ २० ॥ A. पई किवि कयनीरोय लोय किवि पावियसुहसय, किवि मइ मंतमहंत केवि किवि साहिय सिवपय ॥2 | किवि गंजिअरिउवग्ग केवि जसधवलिअभूअल, मई अवहीरहि केण पाम सरणागयवच्छल ॥ २१ ॥ | पच्चुवयारनिरीह नाह निप्पण्णपओअण, तुह जिणपास परोवयार करुणिकपरायण ॥ सत्तु-मित्तसम- &| चित्तवित्ति नय-निदिअसममण, मा अवहीरिअ जुग्गउ वि मई पास निरंजण ॥ २२ ॥ हउं बहुविहदु-14
हतत्तगत्तु तुहं दुहनासणपरु, हउं सुयणहकरुणिकठाणु तुहं निरु करुणापरु ॥ हउं जिणपास असामि& सालु तुहूं तिहुअणसामिअ, जं अवहीरहि मई झंखंत इय पास न सोहिअ ॥ २३ ॥जुग्गा-जुग्गविभा|ग नाह नहु जोअहि तुह समा, भवणुवयारसहाव भाव करुणारस-सत्तम ॥ सम-विसमं किं घणु नियइ | भुवि दाह समंतओ ! इय दुहबंधव पासनाह मई पाल थुणंतउ ॥ २४ ॥ न य दीणह दीणय मुएवि |8|॥३२॥ अन्नुवि किवि जुग्गय, जं जोइविउवयारु करइ उवयारसमुज्जय॥ दीणह दीणु निहीणु जेण तुह नाहिण ४
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चत्तउ, तो जुग्गउ अहमेव पास पालहि मई चंगउ || २५ || अह अणुवि जुग्गयविसु कवि महि दीणह, जं पास वि उवयारु करह तुह नाह समग्गह ॥ सुच्चि किल कलाणु जेण जिण तुम्ह बसीयह, किं अनिण तं चैव देव ! मा मह अवहीरह || २६ || तुह पत्थण नहु होइ विहलु जिण जाणउ किं पुण, हउ दुक्खर निरु सत्तचत्त दुक्कउ उस्सुयमण ॥ तं मण्णउ निमिसेण एउ एओवि जइ लभइ, सच्चं जं भुक्खियवसेण किं उंबरु पच्चइ ॥ २७ ॥ तिहुअणसामिअ पासनाह ! मइ अप्पपयासिउ, किज्जउ जं नियरूवसरिसु न मं बहु जंपिउ | अण्णुण जिण जग तुह समो वि दक्खिण्णु दयासउ, जइ अवगिण्णास तुह जि अहह किं होइस हयासउ ॥ २८ ॥ जइ तुह रूविण किणवि पेअपाइण वे | लवियउ, तवि जाणुं जिणपास तुम्ह हउं अंगीकरिअउ ॥ इय मह इच्छिअजं न होइ सा तुह ओहावणु रक्खंतह नियकित्ति णेय जुज्जइ अवहीरणु ॥ २९ ॥ एव महारिह जत्त देव एहु न्हवणमहसउ, जं अगलियगुणगहण तुम्ह मुणिजणअणिसिद्धउ || इय मई पसिय सुपासनाह थंभणयपुरट्टि, इय मुणिवरु सिरिअभयदेउ विण्णवह अणिदिअ ॥ ३० ॥ इति श्रीस्तम्भन कतीर्थराज श्रीपार्श्वनाथस्तवनम् ॥
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प्रतिक्रमण
सूत्र.
साधुसाध्वी
॥ अथ तपगच्छीयपाक्षिक सकलार्हत् प्रारंभः॥ . ॥३३॥ . सकलाईत्प्रतिष्ठान, मधिष्ठानं शिवश्रियः ॥ भूर्भुवः स्वस्रयीशान, माहत्यं प्रणिदध्महे ॥ १॥ है।
नामाकृतिद्रव्यभावः, पुनतस्त्रिजगज्जनं ॥ क्षेत्रे काले च सर्वस्मि, नर्हतः समुपास्महे ॥ २॥ आदिम पृथिवीनाथ, मादिमं निःपरिग्रहं ॥ आदिमं तीर्थनाथं च ऋषभस्वामिनं स्तुमः ॥ ३ ॥अर्हतमाजितं , विश्व, कमलाकर भास्करं ॥ अम्लानकेवलादर्श संक्रांत जगतं स्तुवे ॥ ४॥ विश्वभव्यजनाराम कुल्या४ तुल्या जयंतु ताः ॥ देशनासमये वाचः श्रीसंभवजगत्पतेः ॥५॥ अनेकांतमतांभोधि, समुल्लासनच- नन्द्रमाः ॥ दद्यादमंदमानंद, भगवानभिनंदनः ॥६॥ युसकिरीटशाणायो, त्तेजितांघिनखावलिः ॥ है भगवान सुमतिस्वामी, तनोत्वभिमतानि वः ॥ ७ ॥ पद्मप्रभप्रभोर्देह, भासः पुष्णंतु वः श्रियम् ॥ अं
तरंगारिमथने, कोपाटोपादिवारुणाः ॥ ८॥ श्रीसुपार्श्वजिनेंद्राय, महेंद्रमहितांप्रये ॥ नमश्चतुर्वर्णसंघ, ३
गगनाभोगभास्वते ॥९॥ चंद्रप्रभप्रभोश्चंद्र, मरीचिनिचयोज्ज्वला ॥ मूर्तिमूर्तसितध्यान, निर्मितेवश्रि12 येऽस्तु वः ॥ १०॥ करामलकवद्विश्वं, कलयन केवलश्रिया ॥ अचिंत्यमाहात्म्यानिधिः सुविधिवोंधयेऽ-8
AMOCRORSCORRECTOR
॥ ३३ ॥
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| स्तु वः ॥ ११ ॥ सत्वानां परमानन्द, कंदोद्भेदनवांबुदः ॥ स्याद्वादामृतनिस्पंदी, शतिलः पातु वो जिनः ।
॥ १२ ॥ भवरोगाऽतजंतूना, मगदंकारदर्शनः ॥ निःश्रेयसश्रीरमणः श्रेयांस श्रेयसेऽस्तु वः ॥ १३ ॥ । विश्वोपकारकीभूत तीर्थकृत् कर्मनिर्मितिः ॥ सुरासुरनरैः पूज्यो, वासुपूज्यः पुनातु वः ॥ १४ ॥ वि. मलस्वामिनो वाचः, कतकक्षोदसोदराः ॥ जयंति त्रिजगच्चेतो, जलनैमल्यहेतवः ॥१५॥ स्वयंभूरमण-2 स्पर्द्वि, करुणारसवारिणा ॥ अनंजिदनंतां वः, प्रयच्छतु सुखश्रियम् ॥ १६ ॥ कल्पद्रुमसधर्माण, मिष्ट-18
प्राप्तौ शरीरिणां ॥ चतुर्द्धा धर्मदेष्टार, धर्मनाथमुपास्महे ॥ १७॥ सुधासोदरवागज्योत्स्ना निर्मली 18 | कृतदिङ्मुखः॥ मृगलक्ष्मा तमःशांत्य, शांतिनाथजिनोऽस्तु वः ॥ १८ ॥ श्रीकुंथुनाथो भगवान् सना थोऽतिशयद्धिभिः ॥ सुरासुर नृनाथाना, मेकनाथोऽस्तु वः श्रिये ॥१९॥ अरनाथस्तु भगवां, श्चतुर्थारनभोरविः चतुर्थपुरुषार्थश्री, विलासं वितनोतु वः ॥२०॥ सुराऽसुरनराधीश, मयूरनववारिदं ॥ | कर्मन्मूलने हस्ति, मलं मल्लिमभिष्टुमः ॥ २१॥ जगन्महामोहनिद्रा, प्रत्यूषसमयोपमम् ॥ मुनिसुव्र- | | तनाथस्य, देशनावचनं स्तुमः ॥ २२ ॥ लुठंतो नमतांमूर्ध्निः, निर्मलीकारकारणं ॥ वारिप्लवाइव
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॥३४॥
सत्र
साधुसाध्वी ॐ नमः पातु पादनखांशवः ॥ २३ ॥ यदुवंशसमुद्रंदुः, कर्मकक्षहुताशनः॥ अरिष्टनेमिभगवान्, भूयाद्वोऽ- प्रतिक्रमण
| रिष्टनाशनः ॥ २४ ॥ कमठे धरणेंद्रे च, स्वोचितं कर्म कुर्वति ॥ प्रभुस्तुल्यमनोवृत्तिः पार्श्वनाथः श्रियेस्तु वः॥ २५॥ श्रीमते वीरनाथाय, मनाथायादभुतश्रिया ॥ महानंदसरोराज, मरालायाहते नमः | ॥ २६ ॥ कृतापराधेऽपिजने, कृपामंथरतारयोः ॥ ईषबाष्पार्द्रयोर्भद्रं, श्रीवीरजिननेत्रयोः ॥२७॥ जयति विजितान्यतेजाः, सुराऽसुराधीश सेवितः श्रीमान् ।। विमलस्त्रासविरहित, त्रिभुवनचूडामाणि-18 भगवान् ॥ २८ ॥ वीरः सर्वसुराऽसुरेंद्रमहितो, वीरं बुधाः संश्रिताः वीरेणाभिहतः स्वकर्मनिचयो, वी-14 राय नित्यं नमः ॥ वीरातीर्थमिदं प्रवृत्तमतुलं, वीरस्य घोरं तपो, वीरे श्रीधृति कीर्तिकांतिनिचयः, श्रीवीरभद्रं दिश ॥ २९॥ अवनितलगतानां कृत्रिमाऽकृत्रिमानां, वरभुवनगतानां दिव्यवैमानिकानां | इह मनुजकृतानां देवराजार्चितानां, जिनवरभुवनानां भावतोऽहं नमामि ॥ ३०॥ सर्वेषां वेधसामाद्य | | मादिमं परमेष्टिनम् ॥ देवाधिदेवं सर्वज्ञ, श्रीवीरं प्रणिदध्महे ॥३१॥ देवोऽनेकभवार्जितोर्जितमहा-18| पापप्रदीपानलो, देवः सिद्धिवधूविशालहृदयाऽलंकारहारोपमः ॥ देवोऽष्टादशदोषसिंधुरघटानिर्भेद 8/
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RANSCORESARKA R
पंचाननो, भव्यानां विदधातु वांछितफलं श्रीवीतरागो जिनः ॥ ३२ ॥ ख्यातोऽष्टापद पर्वतो गजपदः || * सम्मेतशैलाभिधः, श्रीमान् रैवतकः प्रसिद्धमहिमा शgजयो मंडपः ॥ वैभारः कनकाचलोऽर्बुदगिरिः । श्रीचित्रकूटादय, स्तत्र श्रीऋषभादयो जिनवराः कुर्वतु वो मंगलं ॥ ३३ ॥
॥ अथ श्रीवृद्धशांति ॥ भो भो भव्याः शृणुत वचनं प्रस्तुतं सर्वमेतत्,ये यात्रायां त्रिभुवनगुरोरार्हता भक्तिभाजः॥ तेषां || शान्तिर्भवतु भवतामहदादिप्रभावादारोग्यश्रीधृतिमतिकरी क्लेशविध्वंसहेतुः ॥ १ ॥ भो भो भव्यलोका | ६ इह हि भरतैरावतविदेहसंभवानां समस्ततर्थिकृतां जन्मन्यासनप्रकम्पान्तरमवधिना विज्ञाय, सौधर्माधिपतिः सुघोषाघण्टाचालनानन्तरं, सकलसुराऽसुरेन्द्रैः सह समागत्य, सविनयमहद्भट्टारकं गृहीत्वा गत्वा है। कनकाद्रिशृङ्गे, विहितजन्माभिषकः शातिमुद्धोपयति, यथा ततोऽहं कृतानुकारमिति कृत्वा, महाजनो ? येन गतःस पन्थाः इति भव्यजनैःसह समेत्य स्नात्रपीठे स्नात्रं विधाय, शान्तिमुद्घोषयामि. तत्पूजायात्रास्नात्रादिमहोत्सवानन्तरामिति कृत्वा, कर्णं दत्त्वा निशम्यतां निशम्यतां स्वाहा.ॐ पुण्याहं पुण्याहं ||
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सूत्र
साधुसाध्वी प्रीयन्तां प्रीयंतां भगवन्तोर्हन्तः सर्वज्ञाः सर्वदर्शिनस्रिलोकनाथास्त्रिलोकमहिताः त्रिलोकपूज्यात्रिलोके है
है प्रतिक्रमण ॥३५ ।।
हैश्वरात्रिलोकोद्योतकराः ॥ ॐ श्रीकेवलज्ञानी निर्वाणी सागर महाशय विमल सर्वाऽनुभूति श्रीधर दत्त है। 2 दामोदर सुतेजा स्वामी मुनिसुव्रत सुमति शिवगति अस्ताघ नमीश्वर अनिल यशोधर कृतार्थ जिने|श्वर शुद्धमति शिवकर स्यन्दन संप्रति एतेऽतीतचतुर्विशतितीर्थकराः ॥ ॐ श्रीऋषभ अजित संभव | अभिनन्दन सुमति पद्मप्रभ सुपार्श्व चन्द्रप्रभ सुविधि शीतल श्रेयांम वासुपूज्य विमल अनन्त धर्म शा-8 |न्ति कुन्थु अर मल्लि मुनिसुव्रत नमि नेमि पार्श्व वर्धमान एते वर्तमानचतुर्विंशतिजिनाः॥ ॐ श्रीपद्म-18 नाभ सुरदेव सुपार्श्व स्वयंप्रभ सर्वानुभूति देवश्रुतः उदय पेढाल पोट्टिल शतकीर्ति सुव्रत अमम निष्क-* पाय निष्पुलाक निर्मम चित्रगुप्ति समाधि संवर यशोधर विजय मल्लि देव अनन्तवीर्य भद्रंकर । एते है। भाविचतुर्विशतितीर्थंकराः, जिनाः, शान्ताः शान्तिकरा भवन्तु ॐ मुनयो मुनिप्रवरा रिपुविजयदुर्भि-12 |क्षकान्तारेषु दुर्गमार्गेषु रक्षन्तु वो नित्यम् स्वाहा ।। ॐ श्रीनाभि जितशत्र जितारी संवर मेघ धर प्र- ॥३५॥ | तिष्ठ महासेननरेश्वर सुग्रीव दृढरथ विष्णु वसुपुज्य कृतवर्म सिंहसेन भानु विश्वसेन सूर सुदर्शन कुम्भ 8
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18 सुमित्र विजय समुद्रविजय अश्वसेन सिद्धार्थ एते वर्तमानचतुर्विंशतिजिनजनकाः॥ ॐ श्रीमरुदेवी वि-18| * जया सेना सिद्धार्था सुमङ्गला सुसीमा पृथिवीमाता लक्ष्मणा रामा नन्दा विष्णु जया श्यामा सुयशा -
सुव्रता अचिरा श्री देवी प्रभावती पद्मा वा शिवा वामा त्रिशला इति वर्तमानजिनजनन्यः ॥ ॐ श्रीगोमुख महायक्ष त्रिमुख यक्षनायक तुम्बुरु कुसुम मातङ्ग विजय अजित ब्रह्मा यक्षराज कुमार षण्मुख । पाताल किन्नर गरुड गान्धर्व यक्षराज कुबेर वरुण भृकुटि गोमेध पार्श्व ब्रह्मशान्ति । इति वर्तमानजिनयक्षाः ॥ ॐ चक्रेश्वरी अजितबला दुरितारिः काली महाकाली श्यामा शास्ता भृकुटि सुतारका ४ अशोका मानवी चण्डा विदिता अंकुशा कन्दर्पा निर्वाणी बला धारिणी धरणप्रिया नरदत्ता गान्धारि अम्बिका पद्मावती सिद्धायिका एता वर्तमानचतुर्विशतितीर्थंकरशासनदेव्यः॥ | ॐ ह्री श्री धृति-मति-कीर्ति-कान्ति-बुद्धि-लक्ष्मी-मेधा-विद्यासाधन-प्रवेश निवेशनेषु सुगृहीतनामानो है जयन्तु ते जिनेन्द्राः ॥ ॐ श्रीरोहिणी प्रज्ञप्ति वज्रशृङ्खला वज्राङ्कुशा चक्रेश्वरी पुरुषदत्ता काली महा-2 काली गौरी गान्धारी सर्वास्त्रा-महाज्वाला मानवी वैरूट्या अछुप्ता मानसी महामानसी, एताः षोडश,
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सूत्र.
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साधुसाध्वी
" विद्यादेव्योरक्षन्तु वो नित्यं स्वाहा॥ॐ आचार्योपाध्यायप्रभृतिचातुर्वर्णस्य श्रीश्रमणसंघस्य शांतिर्भवतु ॐ प्रतिक्रमण ॥३६॥ | तुष्टिर्भवतु पुष्टि भवतु, ॐ ग्रहाश्चन्द्रसूर्याङ्गारकबुधबृहस्पतिशुक्रशनैश्चरराहुकेतुसहिताःसलोकपालाः सोम-16
| यम-वरुण-कुबेर-वासवादित्य-स्कन्द-विनायकाः ये चान्येऽपि ग्रामनगरक्षेत्रदेवतादयस्ते सर्वे प्रीयन्तां प्री-12 | यन्तां, अक्षीणकोशकोष्ठागारा नरपतयश्च भवन्तु स्वाहा. ॐ पुत्र-मित्र-भ्रातृ-कलत्र-सुहृत्-स्वजन संब|न्धिवन्धुवर्गसहिता नित्यं चामोदप्रमोदकारिणो भवन्तु अस्मिंश्च भूमण्डलायतननिवासिनां साधु-साध्वी
श्रावक-श्राविकाणां रोगो-पसर्ग-व्याधि-दुःख-दुर्भिक्ष-दौमनस्योपशमनाय शांतिर्भवतु.ॐ तुष्टि-पुष्टि-ऋद्धि-8 ६ वृद्धि माङ्गल्योत्सवाः भवंतु सदा प्रादुर्भूतानि दुरितानि पापानि शाम्यंतु शत्रवः पराङ्मुखा भवंतु स्वाहा॥ # श्रीमते शांतिनाथाय, नमः शांतिविधायिने ॥ त्रैलोक्यस्यामराशि-मुकुटाभ्यर्चितांत्रिये ॥ १॥ शांतिः |
शांतिकरः श्रीमान्, शांतिं दिशतु मे गुरुः ॥ शांतिरेव सदा तेषां येषां शांतिगृहे गृहे ॥२॥ ॐ उन्मू-12
टरिष्ट-दुष्ट-ग्रहगतिदुःस्वप्नदुर्निमित्तादि ॥ संपादिताहतसंपन्नामग्रहणं जयति शांतेः ॥ ३॥ श्रीसंघजग- ॥३६॥ 18 जनपदराजाधिपराज्यसन्निवेशानां ॥ गोष्ठिकपुरमुख्याणां व्याहरणैाहरेच्छांतिम् ॥ ४ ॥ श्रीश्रमण 8/
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RSANSARSHARE
| संघस्य शांतिभवतु, श्रीपौरजनस्य शांतिभवतु,श्रीजनपदानां शांतिर्भवतु, श्रीराजाधिपानां शांतिर्भवतु, 81 | श्रीराजसान्निवेशानां शांतिर्भवतु, श्रीगोष्ठिकानांशांतिर्भवतु, श्रीपौरमुख्याणां शांतिर्भवतु, श्रीब्रह्मलोकस्य ।
शांतिर्भवतु, ॐ स्वाहा ॐ स्वाहा ॐ हूँ श्री पार्श्वनाथाय स्वाहा ॥ एषा शांति-प्रतिष्ठा-यात्रास्नात्राद्यव-14 | सानेषु शांतिकलशं गृहीत्वा, कुंकुमचन्दन-कर्पूरागरु-धूपवास-कुसुमाञ्जलिसमेतः स्नात्रपिठे श्रीसङ्घसमेतः ।।
शुचिशुचितरवपुः पुष्पवत्रचन्दनाभरणालङ्कृतः पुष्पमालां कण्ठे कृत्वा, शांतिमुद्घोषयित्वा, शांतिपा-12 नीयं मस्तके दातव्यमिति॥ नृत्यन्ति नित्यं मणिपुष्पवर्षन्, सृजन्ति गायति च मङ्गलानि ॥ स्तोत्राणि गोत्राणि पठन्ति मन्त्रान, कल्याणभाजो हि जिनाभिषेके ॥ १॥ शिवमस्तु सर्वजगतः परहितनिरता || | भवंतु भूतगणाः ॥ दोषाः प्रयांतु नाशं, सर्वत्र सुखनो भवंतु लोकाः॥२॥ अहं तित्थयरमाया, सिवादेवी तुम्ह नयरनिवासिनी॥ अम्ह सिवं तुम्ह सिवं असुभोवसमं सिवं भवतु स्वाहा ॥३॥ उपसर्गाः क्षयं यांति, है छिद्यन्ते विघ्नवल्लयः ॥ मनः प्रसन्नतामेति, पूज्यमाने जिनेश्वरे ॥ ४॥ सर्व मङ्गलमाङ्गल्यं, सर्व कल्याणकारकं ॥ प्रधानं सर्वधर्माणां, जैनं जयति शासनम् ॥ ५॥ इति वृद्ध शांति संपूर्ण ॥
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साधुसाध्वी
॥३७॥
॥ अथ गौचरी के ४७ दोषोंका अधिकार ॥
व प्रतिक्रमण
सूत्र ... सोलस उग्गम दोसा, सोलस उपायणा य दोसा य ॥ दस एसणा य दोसा, गासेसण मिलिय सगयाला ॥१॥ आहा १ |
कम्मुद्दे सिय २, पूईकम्मे य ३ मीसजाए ४ य ।। ठवणा ५ पाहुडियाए ६, पाओयर ७ कीय ८ पामिच्चे ९ ॥ २ ॥ परिअट्टिए १० ४ अभिहड्ड ११ उम्भिन्ने १२ मालोहडे य१३ अच्छिज्जे १४ ॥ अणिसिठ्ठ १५-ज्झोयरए१६, सोलस पिंडुग्गमे दोसा ॥३॥धाई १-ट्टइ२
निमित्ते३, आजीव४ वणीमगे५-चिकिच्छा६ य ॥ कोहे-माणे८ माया९, लोभे १० य हवंति दस एए॥ ४ ॥ पुट्वि-पच्छा संथव,११ विज्जा१२-मंते अ१३ चुण्ण १४-जोगे १५ य ।। उप्पायणाइ दोसा, सोलसमे मृल कम्मेय१६ ॥५॥ सकिय१-मक्खियर-निक्खित्त ३, पिहिय४ साहरिय५-दायगु६-म्मिस्से ७ ॥ अपरिणय८ लित्त९ छिड्डिय १०, एसणा दोसा दस हवंति ॥ ६॥ संजोयणा१-पगाणे२, इंगाले ३-धूम४-कारणे५ पढमा ॥ वसहि बाहिरंतरे वा, रसहेऊ दव्ब संजोगा ।। ७ ।।
अर्थः-साधु-साध्वियोंको १६ दोष उद्गमनके, व १६ दोष उत्पादनके, तथा १० दोष ऐपणाके, एवं ४२ दोष रहित आहार लेना चाहिये और आहार करते समय मांडलीके ५. दोष मिलाकर ४७ दोष निवारण करने चाहिये. जिसमें प्रथम उद्गमन; | याने-आहार बनाने संबंधी १६ दोष गृहस्थोंसे लगते हैं सो बतलाते हैं:-साधु के लिये आहार बनाकर देवे सो पहिला आधकर्मी दोष १, अपने लिये बनाये हुए आहार को साधुके लिये स्वादिष्ट बनाकर देवे सो दूसरा उद्देशीक दोष २, अपने लिये बने आहार को आधाकर्मी आहार के साथ मिलाकर देवे सो तीसरा पूतिकर्म दोष ३, अपने और साधुके दोनों के लिये पहिलेसेही विचार ४॥३७॥
CREARRAXACIOG
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करके आहार बनायकर देव सो चौथा मिश्रजात दोष४, साधुके लिये कोईभी वस्तु अलग रखकर पीछे देवे सो पांचमा स्थापना दोप | ५, विवाहादि उच्छबमें देरी होवे परंतु साधुको ठहरेहुए जानकर आहार दानका अच्छा लाभ मिलेगा ऐसा विचार कर विवाहादि ४ कार्य जलदि शुरु करके उसका आहार साधुको देवे सो छठा पाहुडीय दोष ६, अंधेरेमें रहीहुई वस्तुको दीपक वगैरह के प्रकाशसे | लाकर साधुको देवे सो सातवा प्रादुष्करण दोष ७, साधुके लिये मौल खरीदकर लाकर देवे सो आठवा क्रीत दोष ८, साधुके लिये | किसीसे उधारा लाकर देवे सो नवमा प्राभित्यदोष ९, अपना आहार दूसरेके साथ अदल बदल करके साधुको देवे सो दशवा | परावर्तित दोष १०, साधुके सामने लाकर देवे सो इग्यारहवा अभ्याहृत दोप ११, डब्बे कुडलें आदिके मुंह मट्टी वगैरह लगाकर |बंधकिये होवे उनको खोलकर उनके अंदरका आहारादि देवे सो बारहवा उद्भिन्न दोष १२, उपरके मजल या भूमिघर वा शीकादि स्थानोंसे लाकर देवे सो तेरहवा मालापहृत दोष १३, किसीके पाससे जबराईसे खींच लेकर देवे सो चौदहवा आच्छेद्य दोष १४, सर्व लोगोंकी मालिकीका आहारको सबकी रजा बिना कोई अकेला देवे वह साधु लेवे सो पंदरहवा अनिसृष्ट दोष१५, अपने लिये | बनाते हुए आहारमें साधुके लियेभी कुछ जादे डालकर बनाया हुआ आहार देवे सो सोलहवा अध्यवपूरक दोप १६ यह सोलह दोष गृहस्थोंसे लगते हैं, इसलिये साधु-साध्वियें उन्होंके इंगित-आकार-द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव वगैरहसे उपयोग पूर्वक समझ कर ऐसा दोष वाला आहार न लें।
अब आहार लेनेको जानेवाले साधुसाध्वासे उत्पादनके१६ दोष लगते हैं, सो बतलाते हैं। गौचरी जानेवाले साधु-साध्वी गृहस्थके बालकको हसाय-रमाय-खीलाय कर उनके माता-पिताको स्नेहभाव उत्पन्न करके आहार ले सो प्रथम धात्रीपिंड नामा दोष१, दूतकी
बंधकिये हावाप १०, सावन सो नवमा प्राण दोष माछा पाहुली
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साधुसाध्वी
॥३८॥
RECACASSES
तरह गृहस्थोंके आपसके ईधर उधरके समाचार कहकर आहार ले सो दूसरा दृतीपिंड नामा दोष २, भूत-भविष्य-वर्तमानकाल
प्रतिक्रमण संबंधी लाभ-हानि-सुख-दुःख आदि निमित्त कहकर, आहार लेवें सो तीसरा निमित्तपिंड नामा दोष ३, साधु-साध्वी अपने जाति
कुल-कला-व्यापार वगैरहकी वातें बनाकर आहार लेवें सो चौथा आजीविका पिंड नामा दोष ४, भिक्षारियोंकी तरह आजीजी करके & अथवा ब्राह्मण-सन्यासी वगैरहके भक्तपासे अपनेकोभी उन्होंके परिचय वाले बतलाकर आहार लेवें सो पांचवा वनीपकपिंड नामा
दोष ५, गृहस्थोंको औषधादि उपचार बतलाकर रागीकरके आहार लेवें सो छट्ठा चिकित्सापिंड नामा दोष ६, गृहस्थोंको क्रोधसे विद्याका-मंत्रका-राजाका-पंचोंका-निंदाका या श्रापदेनेका भय बतला कर आहार लेवें सो सातवा क्रोधपिंड नामा दोष ७, साधु अपने समुदायमें प्रतिज्ञा करे कि मैं अमुक घरसे आज अमुक प्रकारका आहार लाचुंगा, ऐसा अभिमानसे कहकर गृहस्थके घर जाकर उसको धमका कर आहार लेना सो आठवा मानपिंड नामा दोष ८, आहारके लिये नये नये रूप बदलकर आहार लेना सो2 | नवमा मायापिंड नामा दोष ९, लोभसे बहुत जगह फिरकर अच्छा २ सरस आहार लेना सो दशवा लोभपिंड नामा दोष१०, गृह| स्थोंके माता-पिता या सासु-श्वसुर वगैरह की प्रसंशाकी बातें सुनाकर आहार लेना सो इग्यारहवा पूर्व-पश्चात् संस्तव नापा दोष ११,
देवी साधनाकी बातें बतला कर या उसकी सिद्धिसे चमत्कार बतलाकर आहार लेना सो बारहवा विद्यापिंड नामा दोष १२, ऐसेही ४ देव साधनकी बातें या चमत्कार से आहार लेना सो तेरहवा मंत्रपिंड नामा दोष १३, ऐसेही वस्तु मिलाकर चूर्ण बनानेकी रीति8 बतलाकर या चूर्ण देकर आहार लेना सो चौदहवा चूर्ण पिंड नामा दोष१४, ज्योतिष वगैरहके योग बतलाकर आहार लेना सो पंद
॥३८॥ रहवा योगपिंड नामा दोष १५, गर्भ उत्पत्तिके, धारणा, स्तंभन, रक्षा, प्रसव वगैरह के प्रयोग बतलाकर आहार लेना सो सोलहवा |
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मूलकर्मपिंड नामा दोष १६, यह सोलह दोष आहार--वस्त्र-पात्र-पुस्तक वगैरह में लोभादिसे लगते हैं सो उपयोग पूर्वक साधुसाध्वियों को त्याग करने चाहिये।
अब साधु तथा गृहस्थ दोनोंसे १० दोष ग्रहणैषणाके लगतेहैं, सो बतलातेहैं । गौचरी जानेवाले साधु-साध्वी आहार लेते | समय आधाकर्मी वगैरह कोईभी दोषकी शंकासहित संदिग्ध मनसे आहार लेवे सो प्रथम शंकित दोष १, सचित्त या अचित्त अकल्पनीय या निंदनीय व अभक्ष पदार्थके संघट्टे वाले आहारको ग्रहण करना सो दूसरा भ्रक्षित दोष २, सचित्त पृथ्वी वगैरह छ
कायपर स्थापन किया हुवा आहार लेना सो तीसरा निक्षिप्त दोष ३, सचित्त फलादिसे ढका हुआ आहार लेना सो चौथा पिहित ला दोष ४ देते समय एक भाजनमेंसे दूसरे भाजनमें डाला हुआ आहार लेना सो पांचवा संहृत दोष ५, बाल-वृद्ध-नपुंसक-अन्ध | मदोन्मत्त-कंपमान शरीरवाले-हाथ पर तूटे हुए-बैडी डाले हुए-पादुका-जुत्तावाले-खांसीवाले तथा तोडना-फोडना-पिंजनालोडना-झाडु निकालना-भुंजना-पीसना-फुक देनादि छ कायकी विराधना करने वाले और गर्भवती स्त्री व बच्चेको उठाने वाली, बच्चेको दुधपीलाना छोड देना इत्यादि ऐसे मनुष्योंसे आहार लेना सो छट्टा दायक दोष ६, सचिन अनादि मिलाहुआ वस्तुवाला
आहार लेना सो सातवा उन्मिश्र दोष ७; फल-शाकादि अचित्त हुए विनाही लेना सो आठमा अपरिणत दोष ८, अकल्पनीय | वस्तुसे लिप्त हाथ या भाजनसे आहार लेना सो नवमा लिप्त दोष ९, दुध-दही-घृत वगैरह के जमीनपर छींटेगिरते हुए आहार | लेना सो दशवा छर्दित दोष १०,
इस प्रकार ४२ दोषों में से कितनेही दोषतो आहार बनानेमें व देने वालोंसे छ कायकी विराधनादि पूर्वकर्ममें लगते हैं. |
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साधुसाध्वी है और कितनेही दोष आहार दिये बाद हाथ या भाजन धोने वगैरहमें पीछे से पश्चात्कर्ममें लगतेहैं. इसलिये साधु-साध्वियोंको प्रतिक्रमण ॥३९॥ 15 उपयोग सहित पूर्वकर्म व पश्चात्कर्म दोषरहित निर्दोष आहारादि लेना चाहिये। उपयाग सहित
सूत्र र इस प्रकार४२ दोष रहित गौचरी लेनको जाते समय दशवकालिक-आचारांग पिंडनियुक्ति आदि शास्त्रों में बतलाईहुई रीति * प्रमाणे उत्सुकता रहित शांतिसे इरियासमिति सहित आगे पीछे चारोंतरफ उपयोग पूर्वक रस्तामें चले तब किसीके साथ वार्तालाप
वगैरह भाषण न करे और द्रव्यवान व दरिद्रीके घरोंका भेदरहित निर्दोष आहार लेकर गुरुमहाराजके पास उपाश्रयमें आवे तब M“निस्सिही निस्सिही नमो खमासमणाणं, मत्थएण वंदामि" ऐसा कहता हुआ उपाश्रयमें प्रवेश करके गुरुके पासमें आवे और
शक्तिहोवे तबतो गुरुके सामने खडे खडेही थोडाझुककर रजोहरणसे पैर व भूमिकी प्रमार्जना करके दंडेको डावापरकी अंगुलियोंपर | या जमीनपर खडा रखकर हाथमें मुहपाते लेकर खडखडेही खमासमण पूर्वक इरियावही करे ( अथवा शक्तिके अभावमें प्रमार्जनाकी 5 हुई भूमिपर आहारके पात्रं रखकर उपर झोली ढके और पडलें, दंडा वगैरह योग्यस्थाने रखकर खमासमण देकर इरियावही करके) 'तस्सुत्तरी अनत्थ उससिएणं' इत्यादि कह करके काउसग्ग करे उसमें गमनागमन संबंधी दोषोंकी आलोचना करके पीछे जिस जिस घरसे जिस जिस मनुष्यके हाथसे जिसरीतिसे जो जो वस्तु अनुक्रमसे ली होवे वो सर्व उपयोगसे यादकरे जिसमें कदाचित जो कोईदोष लगाहोवे उसको धारण करके 'नमो अरिहंताणं' कहके काउसग्ग पारे, प्रकट लोगस कहे. फिर " इच्छाकारेण संदिसह भगवन् भातपाणी आलोवू" ऐसा साधु कहे तब गुरु कहे “ आलोवेह" ऐसा गुरुका आदेश पाय करके 'इच्छं' कहके जिस रीतिसे काउसग्गमें विचार कियाहाय सो सब गुरुके सामने प्रकट कह देवे, फिर झोलीमेंसे आहारके पात्र बाहिर निकालकर 1४॥३९॥
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और 15
झाली ढके और पडले, हमण पूर्वक इरियावही कर करके दंडेको डावापरकी अंग
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गुरुको आहार दिखलावे जिसमेंभी कोई आहार वहोरनेमें दोष लगाहोवे वह गुरुके सामने कहना रहजावे या बिलकुलही भूलसे याद न आवे तो उसकी शुद्धिके लिये 'पडिकमामि गोयरचरियाए भिक्खायरियाए' इत्यादि से लेकर · जंन परिट्ठवियं तस्स मिच्छामि दुक्कडं' तक 'पग्गाम सज्झाय ' के अंदरका आलापक बोलकर तस्सुत्तरी और अनत्थ उससिएणं' इत्यादि पढकर काउसग्ग करे, काउसग्गमें यह गाथा अर्थ सहित चिंतव " अहो जिणेहिं असावजा, वित्ति साहूण देसिया ।। मुक्खसाहणहेउस्स, साहूदेहस्स धारणा ॥ १॥" अर्थः-अहो ! इति आर्य जिनेश्वर भगवान्ने असावद्य-निर्दोषवृत्ति-आहारलेनेकी विधि साधुके लिये कैसी उमदा बतलाई है, ऐसी निर्दोष विधिसे आहार लेनसे साधुके शरीरका निर्वाह ( पालन ) होता है और मोक्ष | साधनका हेतुभी होता है. ऐसे परोपकारी जिनेश्वर भगवान्को मेरा नमस्कार हो. यह गाथा एक वार या तीन बार अर्थ सहित चितवन करके काउसग्ग पारे, प्रकट लोगस्स कहे. फिर रजोहरणसे भूमिकी प्रमार्जना करके व पात्रे भूमिपर रक्खे उपर झोलीसे | आच्छादन करे और उपर नीचे जमीन प्रमाजन करके दंडको एक जगाइमें रखदेवे, अगर वर्षाकाल हो तो पात्र बाजोट (पाट-13 चौकी ) पर रक्खे, फिर उपाश्रयमें आहार करनेकी भूमिकी प्रमार्जना करके विधिपूर्वक कचरेको परिठवे. फिर आचार्य-उपाध्याय| गुरु-वडील-तपस्वी-बाल-वृद्ध-रोगी आदि सब मुनियों को अनुक्रमसे आहार लेनकी निमंत्रणा विनतिकरे, जिसको जो आहार खपे सो
भक्ति-भाव पूर्वक देवे और बाकी रहे वो अथवा सब आहार मुनियों को दे देवे तो फिर दूसरा निर्दोष आहार लाकर आहार करे तब आहार करनेके पहिले ऐसी भावना करनी चाहिये कि धन्य है धनाजी आदि महान् उत्तम मुनियोंको जिन्होंने अपने असार शरीरका मोह छोडकर निर्ममत्व भावस बहुत कठिन तप करके थोडे समय ( नव महिनों) में ही अपना इष्ट कार्य सिद्ध
अनुक्रमसे आहार
तो फिर दूसरा
मुनियोंको LTH सिद्ध
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॥४०॥
साधुसाध्वी कर लिया। धन्य है अनंत बल वीर्य पराक्रमवाले महावीर प्रभु आदि महान् उत्तम तीर्थकर गणधरोंको जिन्होंने गये भवमें और प्रतिक्रमण
इस भवमें बडे बडे दुष्कर घोर तप करके कर्मोंका नाशकर मोक्ष गये हैं और धीकार है मेरेको, मैं अबके कीडेकी तरह रोजीना | सूत्र | आहार करता हूं. उपवासादि थोडासाभी तप कर सकता नहीं. धन्य वह दिन मेरे कब आयेंगे, मैं भी अपने शरीरका मोह रहित है होकर अपने बल वीर्य पराक्रमसे उद्यम वाला होकर अनंती वार आहार किये हुए ऐसे अनादि येठे (झूठे) आहारको छोडकर का घोर तप करके अन आहारी पद पाउंगा. इस प्रकार उत्तम पुरुषोंके तपस्यादि गुणोंकी भावना करते हुए और अपने आत्माकी
निन्दा करते हुए भाडेनी मकानकी तरह शरीरको भाडा देने रूप व धर्म साधनके हेतु भूत आहार करनेसे कुरगडु मुनिकी तरह * केवलज्ञानकी देनेवाली कर्मोंकी बहुत निजरा होती है।
अब आहार करते समय मांडलीके पांच दोष निवारण करने चाहिये सो बतलाते हैं। राग-द्वेष-मोहसे स्वाद के लिये आहार लेते समय एक वस्तुके साथ दूसरी वस्तुका मिलान करना या आहार करते समय पात्रमें वा कवलमें आहारका संयोग मिलाना सो प्रथम संयोजना दोष १, मन-वचन-कायासे स्वाध्याय-ध्यान-तप-संयम-इरिया | समिति आदिकी आराधना करनेके लिये शरीरकी व्यवहारिक शक्ति रहे उतना अल्प आहार करनेका कहाहै, इससे अधिक शरी| रकी पुष्टि के लिये या अच्छा आहार समझकर लोभसे ज्यादा आहार करे सो दूसरा प्रमाणातिरिक्त दोष २, मिष्ट-गरीष्ट-रसवालास्वादिष्ट आहारकी और ऐसे आहारके दातारकी प्रशंसा करता हुआ आहार करे तो रागरूप अग्निसे चारित्ररूप बावन चंदनको जलाकर कोयले करने रूप तीसरा अंगार दोप लगे ३, रसरहित, स्वादरहित, लूखा, सूका, अमनोज्ञ आहारकी तथा ऐसे आहारके दातारकी18/॥४०॥
RECAUSES
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निंदा करता हुआ आहार करे तो सोनेके चित्रामण युक्त चारित्ररूप दीव्यमहलको द्वेषरूपी धुयेंसे मलीन करने समान चौथा धूम्रदोष लगे ४, और साधु-साध्वी छ कारणों से आहार करें सो बतलाते हैं:-अपनी क्षुधा वेदनी दबाने के लिये १, आचार्य-उपाध्यायबाल-वृद्ध-तपस्वी-रोगी वगैरह मुनियोंकी सेवा-भाक्त वैयावच्च करने के लिये २, इरियासमिति पालने के लिये ३, स्वाध्याय व पूंजने प्रमार्जने आदि संयमकी रक्षाके लिये ४, आत्म संयमकी शुद्धिरूप प्राण धारण करनेके लिये ५, तथा सूत्रार्थ धर्मध्यान चितवन करने के लिये ६, इन छ कारणोंसे साधु-साध्वी आहार करें परंतु आत्म कल्याणके हेतुभूत इन्हीं छ कारणों के बिना बल-रूपादिक लिये, स्वाद के लिये आहार करें तो अकारण नामा पांचवा दोष लगे ५. | अब छ कारणोंसे साधु-साध्वी आहार न करें सो बतलाते हैं-ज्वर (तप-बुखार ) आदि रोगं आवें तत्र आहार न करें १, | देव-मनुष्य-तिर्यच संबन्धी किसी प्रकारके उपसग आवें तब आहार न करें २, क्षुधा (भूख) सहन करनेके लिये उपवास-बेला-तेला 8 (छट्ट-अट्ठम ) आदि तप करनेके लिये आहार न करें ३, काम विकार बढने लगे तो ब्रह्मचर्य की रक्षा करनेके लिये आहार न करें &|४, वर्षा वर्षति हो, धुसर गिरती हो या रास्तेमे त्रसजीवोंकी उत्पत्ति हुई हो तो जाते आते जीव विराधना न होने पावे इस प्रकार | | जीवदयाके लिये आहार न करें ५, और तप-संयम करते हुए शरीर शक्तिरहित हो जाये तब या वृद्ध अवस्थामें अथवा अंतसमय | नजीक मालूम हो तब यावत्जीवन पर्यंत अनसन करें तव संलेखनामें शरीरका त्याग करने के लिये आहार न करें ६. इस प्रकार
कारणसर निदोष आहार-पाणी-वस्त्र-पात्र वगैरह लेकर शुद्ध संयमकी आराधना करने वाले साधु-साध्वी थोडे भवोंमें मोक्ष जाते हैं | और मन संबंधी-वचनसंबंधी-शरीरसंबंधी रोग-शोक-भय-परवश-गर्भावास-नरकादिक चारगतिके अनंत दुःखोंसे रहित
ASTROACHECCX
जावे तब लिये आहार वाम मोक्ष
हित
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CAR
साधुसाध्वी में होते हैं और तप-संयमादिकी आराधना विनाही शरीरके मोहसे अकारण व दोषवाला आहार करके ब्रह्मचर्यकी, संयमकी के प्रतिक्रमण ॥४२॥
| विराधना करने वाले साधु-साध्वी रस स्वादके लोभसे अमूल रत्नचिंतामणि समान संयमधर्मकी विराधना करके मनुष्य लभवको खो बैठते हैं. इससे रोग-शोक-भय-परवशता-नरक तिर्यचादि अनंत दुःखोंके भोगने वाले होते हैं और चारगतिके संसारमें
परिभ्रमण करते हैं तथा निर्दोष शुद्ध आहार करने वालोंकी धर्मकार्यमें बुद्धि चलती है और दोषवाला अशुद्ध आहार करने वालोंकी बुद्धि मलीन होनेसे निद्रा-विकथा-प्रमादमें समय जाता है, प्रतिक्रमण-पडिलेहण-स्वाध्याय-ध्यानादि धर्मकार्यों में अनादर होता है, आलस्य बढता है, इसलिये संसारके दुःखोंसे डरनेवाले मोक्षके अभिलाषी साधु-साध्वियों को दृष्टिराग-मोह-ममत्व-प्रमादादि दुपणोंको छोडकर आचारांग-दशवैकालिक-पिंडविशुद्धि आदि आगमानुसार शुद्ध संयमकी आराधना करके अल्प समयमें आत्महितका ४ साधन करलेना योग्य है । इस प्रकार आहार संबंधी संक्षेपसे ४७ दोषोंका अधिकार संपूर्ण हुआ। .
|| ।। ॥ श्री संखेश्वर पार्श्वनाथ स्वामीके पंच कल्याणकका चौढालिया लिख्यते ॥
॥ढाल पहिली॥ सारद बुद्धि दायक, सेवक नयनानंद । सरस्वती पद पंकज, प्रणमि मन हुल्लास । वली प्रणमुज सद्गुरु, यो मुज वचन त विलास ॥ संखश्वर मंडन, सहुनी पूरे आस । हूं गायसुं भक्ते, तेवीसमा प्रभु पास ॥ उल्लालो । तेवीसमा प्रभु पास मनोहर, सहु-17 ना संकट चूरे । दुर्गति निवारण दुख विडारण, मन वांछित सुखपूरे ॥ वामा नंदन पास अनोपम, उपमा सुरतरु सरीखो । सेवक 31॥
RORESALMCIENCE
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जनने परचा पूरण, देखी मुज मन हरख्यो || १ || ढाल || हिवे जंबूद्वीपे लाख जोयण परिमाण । दाहिणचर भरतें, काशी देश सुजाण || तिहां नयरी अनोपम, उपमा स्वर्ग समान । वणारसी नयरी, अश्वसेन राजान ॥ उलालो || तोरे ; नयरी वणारसी केरो स्वामी, अश्वसेन राजान । स्वर्ग भुवनमां सुरपति सोहे, तेहने तिण उपमान ।। तस घर घरणि पति मन हरणि, लक्षण अंगे विराजे । रूपे इन्द्राणी बामा राणी, मुख देख्यां शशी लाजे ।। २ ।। ढाल ।। हिवे; वामा राणी, पोढी रयण मझार । प्राणत देवलोकधी, चविया पास कुमार || तीन ज्ञान सहित लियो, वामा कुक्षि अवतार । चैत्र वदि चौथे लाधां स्वप्न उदार || उलालो || तेथी; चउदह स्वप्न देखी मन हरखी, आवे प्रीतम पासे । गजपति चालती हर्ष धरती, इण परे वचन प्रकाशे । चउदह स्वप्न में दीठाहो स्वामी, सेजां पोढी आज । जिम दीठा तिम आगल कहसुं, ते सुणजो महाराज || ३ || ढाल || पहिले गज दीठो, ऐरावण समकंत । बीजे अति सुंदर, वृषभ महा बलवंत । अति लील करतो, तीजे केशरी सिंह । वलि कमले बैठी देखी लक्ष्मी अहि || ॥ उलालो || तोरे; चौथे सोहणे लक्ष्मी दीठी, रयण कमलमां सोहे । अंग आभूषण नहीं कोई दुषण, आरीसे मुख जोवे || परिमल | मेलति अति सोमंति, भली फुलांनी माल । स्वप्न पांच में दीठां हो स्वामी, कुसुम झाक झमाल ॥ ४ ॥ ढाल || छठे शशी दीठो, सोलह कला सोहंत । तिम तिमिर निवारण, सहस किरण दीपंत | आठमें ध्वन सोहे, कनक कलश जलकंत । अमृत रसे भरियो, | नवमें तेह पेखंत || उलालो || तोरे, नवमें सोहणे कलश सुचंगा, पद्म सरोवर दशमें। खीर जलधर जिम गाजंतां दीठो एकादशमें || | देव विमाने दुंदुभी वाजे, गाजे गहर गंभीर । स्वम बारमें दीठो हो स्वामी, कंचन गिरि समधीर ॥ ५ ॥ ढाल || रत्नांनी राशी, देखी तेज करंत । निर्धूमी अग्नि, घृत मधु सु सिचंत ।। ए ए को सोहणां, लाधां हर्ष घरंत ॥ उलालो || हर्ष धरतां लाधां सोहणां,
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सूत्र
साधुसाध्वी है एहनो करो विचार । कांता वचन सुणी मन हरखी, हियडे हर्ष अपार ॥ चक्रवर्ती तीर्थकर होसी, स्वप्न तणे अहिनाण ॥ एहवो है ॥४२॥
अर्थ कह्यो तब राजा, किनो वचन प्रमाण ॥ ६ ॥ ढाल । हिवे, सुख भोगवंतां, जब बोल्या नव मास । पोष वदी दशमी, जन्म हुवो | श्रीपास ॥ छपन दिशी कुमरी, दशों दिशांथी आवे । सूतिकर्म करीने, बैठी मंगल गावे ॥ उलालो ॥ केई गावंती केई नाचती, केई बजावे ताल । कड भीडंती मुख भोलंती, नाटक करे रसाल ।। धमधम दोय दोय मादल वाजे, गाजे गहर गंभीर । देव कुमरी नाटक तिहां मांड्यो, पाप तिमिर भाजंत ।। ७ ।। ढाल | हिवे नाटक कीधो, जन्म तणो फल लीध । नंदीश्वर द्वीपे, अट्ठाही | महोत्सव कीध ॥ तिहाथी तेह चाली, पहुंती निय निय ठाम । निजठामे बैठी, करती प्रभु गुण ग्राम ॥ उलालो ॥ तिण अवसरे | इन्द्रासन कंप्यो, जीम पीपल तरु पान । कोपकरी इन्द्र अविलोकत, देवे अवधि ज्ञान ॥ पास जिनेश्वर जन्मा जाणी, हिवडे आणी | भावे । हरिणेगमेषी ततक्षिण तेडावे, घंटा सुघोपा वजावे ॥८॥ ढाल।। हिवे तेह वजावे, सुणियो सयल विमाने। सहु सुरपति मिलतां, | भुवनपति इन्द्र वीश ॥ दशकल्पतणा इन्द्र, व्यंतर इन्द्र वतीश ॥ उलालो। इन्द्र बतीशे व्यंतरकेरा, वली सूरजने चंद्र । चौसठ इन्द्र इणीपरे मिलीया, अमरांना बहुबूंद ॥ जिनवर जननी पासे आयने, भावे वंदन कीधो । अवस्वापिणी निद्रातिहां दिनी, जिनवर गोदे लीधो
॥९॥ ढाल ॥ पांचरूप करी इन्द्र, जिनवर गोद लहंत । एक छत्र धरंतो, चामर दोय बिजंत ।। एक दंड उलाले, वली जिन मुख 3 |पेखंत । इम हर्ष धरता, इणपरे सुर विचरंत ॥ उलालो ।। हर्ष धरंतां सुरपति पहुंता, पहुंचा मेरु श्रृंग । जन्म महोच्छव विधिसुद कीनो, पाम्या परमानंद ।। जिनवर जिननी पासे मेली, सुर नंदीश्वर जावे । हरख धरी माता हुलरावे, पास कुमर दियो नामे ॥१०॥ ढाल ॥ हिवे जिनवर वाधे, जिम द्वितीयाको चंद । सहु रामत रमतां, साथे नरवर बंद ।। जोवन जब आया, परणावे निज ताह ।।
ARCANERALSCREGALA
॥४२॥
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आडंबसं तप तप ए। लोक करे जयकार है।
राजानी कन्या, प्रभावतीसुं विवाह । उलालो ॥ प्रभावती राजानी कन्या, परण्या श्री जिन पास । माय ताय हुंती पूरी, पुगी 8 मननी आस ॥ प्रभावती रांणी संगाते, सुख भोगवे अपार । रहे घरवासे मन हुल्लासे, सहुकरे जयकार ॥ ११ ॥ इति ॥
॥ढाल दूसरी॥ एक दिन पास कुमार, हारे बैठा गोखडे, जोवे नगर चराचरु ए । कमठ तपतो ताप, हारे नगर बाहिर थको, लोक | सहु वांदण गया ए ॥ देखण पास कुमार, हारे सेवक तेडियो, चालो इचरज देखवा ए। सेवकने संघाते, हारे पास कुमार चढ्या, मिथ्यात्वी दल मोडवा ए॥१॥ तिहां पहुंता श्रीपास, हारे दीठो तापस, आडंबरसु तप तप ए। लोक करे जयकार,
हारे श्री सूरज पर तपे, चार अंगीठी चहुं दिशे ए । दया नहीं लवलेश, हारे फोगट तप तपे, इम बोल्या त्रिभुवन धणी ए। Rकोपकरी विकराल, हारे कहे जिनवर भणी, काज करो तुमे आपणो ए ॥ २ ॥ बले अंगीठी माहे, हारे सबल भुजंगम, ते जाण
| श्री जिनवरु ए । अवर न जाणे भेद, हारे काष्ट विडारीयो, सर्प बलतो काढीयो ए । सेवक दे नवकार, हारे चार सरणा दिया, है हिवे घारेए विषधरू ए । तेह तणे परभाव, हारे धरणेंद्र सुर थयो, कमठ थयो चिंतातरु ए ॥ ३॥ आणी मनमा रोष, हारे गयो गंगा
तटे, झंपापात कियो तिहां ए। आत-रौद्र धरी ध्यान, हारे ज्ञान नहीं पोते, हुवो मेघमाली देवताए॥ हिवे श्रीपास कुमार, हारे घरमा | | संचर्या, लोक सहु जय जय करे ए । दीक्षा अवसर जांण, हारे देव लोकांतिका, आवे इम प्रतियोधवाए ॥ ४ ॥ इति ।।
॥ढाल तीसरी॥ देव लोकांतिक आवियारे, दीक्षा अवसर जाण ।। बुझ बुझ परमेसरूरे देय संवत्सरी दान ।। उलालो ।।दान संवच्छरी दिये दिये
ल, हारे कहे जिनवर भा.दश ए॥ दया नहीं लवलेश, हारे
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प्रतिक्रमण
साधुसावा है पास । भवियण करी पूरवे आस ॥ तास वर्ष रह्या घर वास । सयम लियो मन हुल्लास ।। श्री पास जिनजीरे जी ॥ १ ॥ ढाल ॥
प्रभावती भरतार नित नित वंदियेरे । बामा मात मल्हार ॥ चिर आनंदियेरे । पाशवदी एकादशीरे । शुभ मनोरथ सुभवार । संयम ॥४३॥
लियो जिनवरूरे। तीन सया परिवार ॥ उलालो ॥ संयम लियो पास कुमार । देश विदेश करत विहार ॥ कर्म शत्रुजन जीतन काज । वडतले काउसग्ग रह्या जिनराज ॥ श्री पास जिनगीरे जी ॥ २ ॥ ढाल || हिवे मेघमाली देवतारे । वैर संभारियो आय ।। गगन धडुके मेहलोरे । आभे बीज नहीं माय । उलालो ।। आभे बीज झलके सार । मेह वरसावे मुसल धार ।। जिनवर काउसग्ग | रह्या तिणवार । जलधर वरसे अपरंपार ।। श्री पास० ॥ ३ ॥ ढाल ॥ नासां ताइ पाणी चढ्योरे, जिनवर ध्यान न चूक ॥ रूप करे Pवैतालनारे । तो पण ध्यान न मूक ।। उलालो ॥ ध्यान न मुके पास जिनेश्वर । हिवे आयो धरणेंद्र सुरेश्वर ।। कमठासुर मन मांही 8 बीये । पास चरणांरी सेवा लहिये ॥ श्री पास ॥ ४ ॥ ढाल ॥ मेह वरसंतो रहे नहींरे । हिवे सांभलो विरतंत ॥ धरणेंद्र ज्ञान उपर्युझीयोरे । ये कमठासुर दैत्य ॥ उलालो ॥ ये कपठासुर देत्य पछाडं । स्वर्ग भुवनथी वाहिर काहुँ । कमठासुर जिन पायलागो ।
पास जिनेश्वर सरण राखो ॥ श्री पास ॥ ५॥ ढाल।। प्रकट थइ पाय पड्यारे, सुर पहुंतो निज ठाम ॥ काउसग्ग पारी जिनवरूरे विहार करे गामो गाम ॥ उलालो॥ विहार करे श्री जिनवर पास । भवियण केरी पुरचे आस ॥ चैत्रबादि चौथे दिन जाणो । प्रभुजी | पाम्या केवल ज्ञानो ॥ श्री पास० ॥६॥ढाल।। समवसरण देवां रच्योरे। बैठी परिषदा बार ॥ जलधग्नी परे गाजतारे । वरसे अमृत है धार ॥ उलालो ॥ वरसे अमृत धार समाणो । एवी श्री जिनवरनी वाणी ॥ भविक सुणे मन मांही आणी | एथी लहिये शिव पटराणी ।। श्री पास ॥ ७ ॥ ढाल ॥ गंगाजल समां निर्मलारे । चामर बीजे देव ।। चार निकाय तणा बलिरे । सुरनर सारे
ALSORRENCE
॥४३॥
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P
सेव ॥ उलालो ॥ सुरनर सेव करे कर जोडी । अणहुंता लहिये एक कोडी ॥ सिंहासन पर बैठा सोहे । देखी अखंडल मन मोहे ॥
श्री पास० ॥ ८ । ढाल ।। भामंडल सोहे भलारे । पूठे घन जिम सूर । देव दुंदुर्ण घणां घणारे । शांति राग रस पूर ॥ उलालो। जा देवदुंदुभी घणाघण बाजे । तसभर सयल कुमति भाजे ॥ तीन छत्र शिरउपर सोहे । त्रिजन केरा प्रभु मन मोहे ॥ श्री पास० ॥९॥
॥ ढाल ।। सुरपति वास आणी दियेरे । थापा आठ गणराय ।। संघ थापी तिहां जिनवरुरे । सोलह सहस सुनिराय ॥ उलाला ॥ सोलह सहस मुनिराय वखाणुं । अडतीस सहस साध्वी जाणुं ॥ एक लाख चौसठ हजार । इतना श्रावक समकित धार ।। श्री पास ॥ १० ॥ सहस सतावीस जाणियरे । उपरला तीन लाख ॥ ये प्रतिबोधी श्राविकारे । कल्पमत्रनी साख ॥ उलालो ॥४ कल्पसूत्रनी साखे जाणुं । पास तणो परिवार वखाणुं ॥ विहार करे जिन देश विदेश । भावक जीवने दे उपदेश ॥ श्रीपास ॥११॥ नील वरण तनु सोभतारे । कमल गंध परे वास ॥ वरस एकसौ आउखोरे । भोगवीयो श्री पास ।। उलालो । वरस एकसौ आउखो | पाली । जन्म मरण तणा भय टाली ।। नव हाथ प्रमाणे देह । प्रभुजी सोहे बहु गुण गेह ॥ श्री पास० ॥ १२ ॥ समेतशिखर गिरि उपरेरे । पहोता पारसनाथ ॥ किनी मास संलेखनारे तेतीस मुनिवर साथ ॥ उलालो ॥ तेतीस मुनिवर साथै लिना । अष्टकर्म तणा क्षय किना ॥ श्रावण सुदी अष्टमी दिन जाणो । प्रभुजी पहाता पद निर्वाणो ॥ श्री पास जिनजीरे जी ।। १३ ।। इति ।।
॥ ढाल चौथी॥ | वसुधा तल मंडण जाणरे । संखेश्वर तीर्थ वखाणरे ।। अश्वसेन नरेसर नंदरे। जसु प्रणमे सुरनर वृंदरे ॥ १॥ धरणिंद्र पमुहा देवारे । जसु एहनी सारे सेवा ।। जिणे कमठ हठी मद गाल्योरे । जिणे जिन शासन अजुवाल्यो ।।२।। ध्वीप सिंह फणीधर
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प्रतिक्रमण सूत्र
॥४४॥
डालिया समा
सासाली है रासारे । दावानल रण भय नासारे ॥ दुष्ट कष्ट भगिंदर रोगारे। तुझ नामथी जाय वेगा॥ ३ ॥ डायण सायण भूत वैतालारे।
दीसंता अति विकराला ॥ संखेश्वर चित्त सभाररे । दुष्ट ग्रह चौर निवारे ॥ ४ ॥ धन हिणाने धन आपरे । दुखियारा दुःख कापे । भावे करी प्रभु पूजरे । तेतो अष्ट कर्म अरि धूजे ॥ ५ ॥ तुंमे सुणा हो वामारा जायारे । थारा दर्शन में सुख पाया । आज मेह अमीमय वुठारे । साहिब तुझ दर्शन दीठा ॥६॥ गुनह घणामें कीधारे । साहिब तुझ दर्शन सीधा ।। ओगुण पिण गुण कर लीजेरे । निजसेवक चित्त धरीजे ॥७॥ वंस चंद्र मुनिंद्र परिमाणोरे । संवत् सतरेसौ संख्या जाणो ॥ श्री सोजत नगरे चौमासरे । थुर्णायो | संखेश्वर पास ॥८॥ इतिश्री संखेश्वर पार्श्वनाथ स्वामिके पंचकल्याणकका चौढालिया समाप्त ॥
॥ अथ पार्श्वजिन स्तुति ॥ हरिगीत छंदः॥ ॥ द्रकि धपमप, धुधुमि धो धों, ध्रसकिधर धप धोरवं दोंदोंकि दो दों, दाग्डिदि दाग्डिदिकि, द्रमकि द्रणरण द्रेणवं ॥ झझियोंकि यें, झणण रण रण, निजाक निजजन रंजनं । सुरशैल शिखरे, भवतु सुखदं, पार्श्वजिनपति मज्झनं ॥१॥ कटरेगिनि थोगिनि, किटति गिग्डदा, धुधुकि धुट नट पाटवं गुणगुणण गुणगण, रणकि णणे, गुणणगुणगण गौरवं झझिोकि झंझू, झणण | रणरण, निजकि निजजन सज्जना। कलयंति कमला, कलितकलमल, मुकल मांश महेजिनाः ॥ २ ॥ ठकि।कि ट्रॅटे, ठकि ठकि, ठपिट्टा ताब्यते तललोंकि लों लों, षिषिनि डेंपिडेपिनि वाद्यते। ॐ ॐ ॐ ॐ थुगि धुंगिनि, धोंगि धौगिनि,कलरखे जिनमतमनंतं, महिम तनुतां, नमति सुरनर मुच्छवे ॥३।। खुदांकि खुदां, खुखुडदि खुदां खुखु डदि दो दों, अंबरे चाचपट चचपट, रणकि णेणे, झणण डेंडें डंबरे ।। तिहां सरगमपधुनि, निधपमगरस, सस ससस सुर सेवता जिननाट्यरंगे कुशलमुनीश, दिशतु शासन देवता ४॥ ॥ इति श्री पार्श्वजिन स्तुति ॥
धप धार स्तति
OCCURRECIRCTC060
॥४४॥
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तपगच्छीय देवसिक तथा सत्रिक अतिचार ॥ . ठाणे कमणे, चंकमणे, आऊत्ते, अणाऊत्ते, हरियकाय संघट्टे, बीयकाय संघट्टे, सकाय संघट्ट, थावरकाय संघट्टे, छप्पई संघट्टे. ठाणाओठाणं संकामीया, देहरे गोचरी बाहीरभूमि मार्गे जातां आवतां स्त्री तीर्यचतगा संघट्ट परिताप उपद्रव हुआ, दिवस मांहि चार बार सझायः सात बार चैत्यवंदन कीधा नहीं, प्रतिले वणा आधी पाछी भणावी, अस्ताव्यस्त कीधी, आतध्यान रद्रौध्यान ध्यायां, धर्मध्यान शुक्लध्यान ध्यायां नहीं, गोचरीतगा बेंतालिस दोष उपजता जोया नहीं, पांच दोष मंडळितणा टाल्या नहीं,
मात्रु अणपुंजे लीधुं, अणपूंजी भूमिकाए परठव्युं, देहरा उपाश्रय मांहि पेसतां निसरतां निसिही आवस्सही कहेवी विसारी, जिन* भुवनें चोराशी आशातना, गुरु प्रतें तेत्रिश आशातना, अनेरं जे काइ दिवस संबंधी पापदोप लाग्युं होय ते सवि हुं मने वचने कायाए करीने तस्स मिच्छामि दुकडं ॥ इति ॥ देवसिक अतिचार ।।
संथाराऊवट्टणकी, परियट्टणकी, आऊंटणकी, पसारणकी, छप्पइय संघट्टणकी, अचक्खु विसय हुओ, संथारो ऊत्तरपट्टो टाली3 * अधिकुं उपगरण घाल्युं, अणपडिलेहयुं हलाव्युं, मात्र्युं अणपडिलेहयुं लीधुं, अणपुंजी भूमिए परठव्युं, परठवतां अणुजाणह जस्सुग्गहो
कीधो नहीं, परठव्या पूंठे वार त्रण वोसिरे वोसिरे कीधुं नहीं, संथरापोरसी भणवी विसारी, पोरसी भणाव्या विना मुता, कुस्वम
लाधु, सुपनांतरमांहि शीळनी विराधना हुइ, आहट्ट दोहट्ट चितुव्युं, संकल्प विकल्प कीधो, रात्रीसंबंधीओ जे कोइ अतिचार * लाग्यो होय, ते सवि हुँ मने वचने कायाए करी तस्स मिच्छामि दुकडं. ॥ इति ॥ रात्रिक अतिचार ॥
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