Book Title: Sramana 2004 01
Author(s): Shivprasad
Publisher: Parshvanath Vidhyashram Varanasi

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Page 267
________________ गाहा : छाया : तो जोगिएण भणियं जाव न सो एइ दुइयओ जोगी । ताव मह देसु लक्खं जेण इमं देमि तुह बालं ।। २०८ ।। ततो योगिना भणितं यावन्न स रति द्वितीयो योगी । तावत् मह्यं देहि लक्षं येनेदं ददामि तुभ्यं बालम् ॥२०८॥ अर्थ :- व्यार पछी योगी बड़े कहेवायु, “ज्यां सुधीमां बीजो योगी न आवे त्यां सुधी मां मने लाख आपी दे जेथी आ बालक तने आपी दउँ।" हिन्दी अनुवाद :- तत्पश्चात् योगी ने कहा - "जब तक दूसरा योगी न आवे तब तक में, मुझे लाख सोना मोहर दे दे, जिससे यह बालक मैं तुझे अर्पित कर दूँ।" गाहा : लाख सोनामहोरनी अंगुठी प्रदान अने बालकनी प्राप्ति तत्तो धणदेवेणं दीणार - लक्ख-मुल्लं छाया : समप्पियं मुक्को छाया : अंगुलीययं Jain Education International य ततो धनदेवेन दीनार-लक्ष- मूल्यं अर्थ :- व्यारे तरत ज धनदेव बड़े लाख दीनार मूल्यवाळी अंगूठी तेने आपी अने एना बड़े जयसेन मुक्त करायो । हिन्दी अनुवाद: :- तब तुरंत ही धनदेव ने लाख दीनार मूल्य वाली अंगूठी निकाल कर उसे अर्पित की और जयसेन को मुक्त कराया। गाहा : तस्स । इमेण जयसेणो ||२०९ ।। समर्पितमङ्गुलीयकं मुक्तश्चानेन घेत्तूणं अंगुलीयं सिग्घयरं जोगिओ तओ नट्ठो । घेत्तूण य जयसेणं धणदेवो देवसम्मस्स ।।२१०|| पासम्मि समल्लीणो भणिओ एसो य गिन्ह कुमरति । तत्तो य देवसम्मो पहसिय-वयणो इमं भाइ ।।२११ । 61 तस्मै । जयसेनः || २०९ ॥ गृहीत्वा अङ्गुलीयकं शीघ्रतरं योगी ततो नष्टः । गृहीत्वा च जयसेनं धनदेवो देवशर्मणे ॥ २१० ॥ पार्श्वे समालीनो भणित एष च गृहाण कुमार इति । ततश्व देवशर्मा प्रहसित - वदन इदं भणति || २११ || अर्थ :- योगी अंगूठी लईने तरत ज त्यांथी भाग्यो अने जयसेनने लईने देवशर्मानी पासे आवेला धनदेवे “आ बालक ग्रहण कर" ए प्रमाणे कछु अने प्यार पछी प्रसन्न वदनवाळा देवशर्माए आ प्रमाणे कछु । हिन्दी अनुवाद :- योगी अंगूठी लेकर तुरंत ही वहाँ से भागा और जयसेन को लेकर देवशर्मा के For Private & Personal Use Only युग्मम् www.jainelibrary.org

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