Book Title: Shwetambar Mat Samiksha
Author(s): Ajitkumar Shastri
Publisher: Bansidhar Pandit

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Page 256
________________ । २४८ । के मतोंपर शासन करने वाला सच्चा शासन विद्यमान है। यानी-इस नगर में जैनधर्मका अच्छा प्रभाव है। ___ समस्त जगतके उदय करनेवाले अनुपम गुणोंसे विभूषित, जैनशासनको उन्नत करनेवाले, भव्य जन समुदायको विकसित करनेवाले,, अज्ञान अंधकारको दूर करने वाले श्रीमहावीर भगवान रूपी सूर्य के मुक्ति प्राप्त करलेने पर भगवानके परमऋषि गौतम गणधरके साक्षात् शिष्य लोहाचार्य, जम्बूस्वामी, विष्णुदेव, अपराजित, गोवर्द्धन, भद्रबाहु, विशाख, प्रोष्ठिल, क्षत्रियाचार्य, जयनाम सिद्धार्थ, धृतषेण, बुद्धिल आदि गुरुपरम्परा क्रमसे चली आई महापुरुषोंकी सन्तानमें अष्टाङ्ग महानिमित्तज्ञानसे भूत भविष्यत् वर्तमानके होनेवाले शुभ अशुभ कार्योंके ज्ञाता भद्रबाहु आचार्य हुए। उन भद्र. बाहु स्वामीने उज्जयिनी में निमित्तज्ञानसे " यहां पर बारह वर्षका घोर दुर्भिक्ष पडेगा " ऐसा जानकर उन्होंने अपने मुनिसंघसे दक्षिण देशकी ओर प्रस्थान करनेको कहा । तदनुसार मुनिसंघ उत्तरदेशसे दक्षिण देशको चल दिया । संघके साथ भद्रबाहु स्वामी धन, जन, धान्य, सुवर्ण, गाय, भंस आदि पदार्थोसे भरे हुए अनेक ग्राम, नगरों में होते हुए पृथ्वी तलके आभूषणरूप इस करवप्र नामक पर्वतपर आये । मुनि प्रभाचन्द्र (चन्द्रगुप्त) भी साथमें थे। अनेक प्रकारके वृक्ष, फल, फूलसे शोभायमान, सजल बादल समूहोंसे सुशोमित, सिंह, बाघ, सूअर, रीछ, अजगर, हरिण आदि जंगली जानवरों से भरे हुए, गहन गुफाओं और उन्नत शिखरोंसे विरानमान इस कटवा पर्वतपर अपना अल्प जीवन समय जानकर, समाधिसहित शरीर त्याग करनेके लिये समस्त संघको विदा करके एक शिष्यके साथ भद्रबाहु स्वामीने विस्तीर्ण शिलाओंपर समाधि मरण किया । तथा संघके ७०० ऋषियोंने भी समय समयपर यहां चार माराधनाओंका आराधन किया है। जैनधर्म जयवंत होवे । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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