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विचार रत्नसार.
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बेताळीश भेदे अनुकुळपणे शाताफळरूपे भोगवाय छे, पुण्य पौद्गलिक जड वस्तु सोनानी बेडी रूप विनाशी संसार हेतुरूप होवाथी मुनिने निश्चयनय त्याज्य छे; पाप अशुभ परिणामे अढार प्रकारे बंधाय छे, बीयासी प्रकारे प्रतिकुळपणे अशाता फळरूपे दुःखदायिपणे लोढानी बेडी समान भोगवाय छे, ते तो सर्वथा प्रकारे हेय छे. एम धर्म स्वभाव जनित आत्मिक छ; अने पुण्य पाप कर्म जनित पौद्गगलिक छे; धर्म उपादेय छे सर्वथा प्रकारे, शुभ कर्म व्यवहारे; अपवादे उपादेय छे, निश्चय स्वरूपे हेय छ; अने अशुभ कर्म तो स
वथा प्रकारे बंने नये हेय एटटे त्यागवा योग्य छे. ५१ प्र-धर्म जीवने शाथी निपजे ? । उ०-ज्यां सुधी जोयना परिणाम संकल्प विकल्पमा वर्ते
छे, त्यां सुधी शुभाशुभ कर्मबंध निपजे, अने ज्यारे निर्विकल्प दशामा परिणमे, प्रवर्ते त्यारे शुफ धर्म प्रगटे, एम विकल्पे कर्म लाभ अने निर्विकल्पे धर्म
लाभ जाणवो. ५२ प्र०-स्वाभाविक रत्नत्रयी गुणर्नु लक्षण स्वरूप कहो ? उ०-बोधप्रकाश अने विलक्षण विचक्षणताए ज्ञानवें
स्वाभाविक लक्षण जाणवू; दृढ आस्तिकता, प्रतीतात्मक श्रद्धानगुण ते स्वाभाविक दर्शन लक्षण जाणवू; तथा चित्तनी स्थिरता, अनुकुळता, स्वरूप रमणता ते स्वाभाविक चारित्र लक्षण जाणवू; एम
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