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प्रतिक्रमण विधियों के प्रयोजन एवं शंका समाधान ... 171 से सम्यगदर्शन रहता ही है । इस प्रकार चारित्र का अधिक महत्त्व होने से इसकी शुद्धि पहले की जाती है।
शंका- दिनकृत अतिचारों (दोषों) की आलोचना करने से पूर्व उन दोषों का चिन्तन या अवधारण करना आवश्यक क्यों ?
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समाधान- जिस प्रकार रोगी डॉक्टर के पास जाने से पहले शरीर में कौनसी खराबी है? किस रोग का उपचार करवाना है? यह सब कुछ ध्यान में कर लेता है। इसी भाँति प्राइममिनिस्टर आदि विशिष्ट व्यक्तियों को कुछ कहना हो तो मुलाकात से पूर्व ही उसकी पूर्व भूमिका तैयार कर ली जाती है उसी प्रकार दिवसकृत जिन दुष्कृत्यों का प्रतिक्रमण करना हो उनका पहले से ही अवधारण कर लिया जाए तो दोषों की आलोचना और प्रतिक्रमण ज्यादा अच्छी तरह से हो सकता है इससे किसी भी दुष्कृत की आलोचना छूटने की सम्भावना कम रहती है। जैसे रोग की पहिचान किये बिना दवा नहीं दी जा सकती, कपड़े पर लगे दाग को देखे बिना अच्छी तरह साफ नहीं किया जा सकता, वैसे ही आत्म प्रदेशों पर कहाँ, कैसा मैल जमा है यह जाने बिना उसकी सफाई कैसे की जा सकती है? इसलिए सभी पापों का विचार पहले ही कर लेना जरूरी है।
शंका- दैवसिक प्रतिक्रमण में दिवसगत अतिचारों के चिन्तन का अभिप्राय क्या है? यहाँ दिनकृत दोष कहाँ से कहाँ तक मानने चाहिए? समाधान- यतिदिनचर्या (गा. 330) में कहा गया है कि
पाभाइअ पडिक्कमणाणंतर, मुहपुत्ति पमुह कज्जेसु । जाव इमो उस्सग्गो, अइआरे ताव चिंतेज्जा ।। प्राभातिक प्रतिक्रमण करने के बाद से लेकर सन्ध्याकालीन प्रतिक्रमण की मुँहपत्ति प्रतिलेखन करने से पूर्व समय तक किये गये दोषों को दिवसकृत मानना चाहिए।
शंका - गुरुजनों से साढ़े तीन हाथ दूर रहकर वंदन आदि क्यों करना
चाहिए?
समाधान- चारों दिशाओं में गुरु का शरीर परिमाण क्षेत्र साढ़े तीन हाथ का होता है इसे अवग्रह कहा जाता है।
गुरु के अवग्रह से बाहर उपस्थित होकर वन्दन, स्वाध्याय आदि करने से गुरु को किसी तरह की परेशानी नहीं होती। वे इच्छानुसार उठ बैठ सकते हैं और आवश्यकता होने पर शयन भी कर सकते हैं।