Book Title: Navtattva
Author(s): Atmanand Jain Pustak Pracharak Mandal
Publisher: Atmanand Jain Pustak Pracharak Mandal

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Page 65
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir * संवरतत्र * ..................0000000000000000000. (८) स्त्रो-त्रियोंके अंगप्रत्यंगोंको न देखे। उनके साथ एकान्तमें बात चीत करना, हँसना श्रादि व्यापार न करे । मोक्षमार्गमें उन्हें अर्गलाके समान समझकर कभी कामदृष्टि से देखे नहीं। (8) चर्या-बहता हुआ जल और बिहार करनेवाला साधु, दोनों स्वच्छ रहते हैं इसलिये साधुको किसी एक जगह अधिक ठहरना न चाहिये । धर्मका उपदेश देते हुये अप्रतिबद्ध विहार करे। (१०) नैषैधिकी-स्मशान, शून्यमकान, सिंहकी गुफ़ा श्रादि स्थानों में ध्यान करने के समय, विविध उपसर्गों के होनेपर निषिद्ध चेष्टा न करे। .. (११) शय्या-जहाँ ऊँची नीची जमीन हो, धूल पड़ी हो, विस्तर दुरुस्त न हो, तो नींद में खलल पहुँचता है तो भी मनमें उद्वेग न करे। (१२) आक्रोश-कोई गाली दे या कटु वचन पोले, तो उसे सहन करे। (१३) वध-कोई दुष्ट मार पीट करे या जानसे मार डाले तो भी साधु क्रोध न करे। (१४) याचना–साधुको चाहिये कि यदि आहार भादि चीज, गृहस्थ लाकर अपने स्थानपर पहुँचाने नो न For Private And Personal

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