Book Title: Nandanvan Kalpataru 2004 00 SrNo 12
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti

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Page 16
________________ ऋषभदेवस्तवन प्रथम जिनेश्वर प्रणमीये, जास सुगंधी रे काय, कल्पवृक्ष परे तास इंद्राणी नयन जे, भुंग परे लपटाय. प्र० १ रोग उरग तुज नवि नडे, अमृत जे आस्वाद, तेहथी प्रतिहत् तेह मानुं कोई नवि करे, जगमां तुमशुं रे वाद. प्र. २ वगर धोई तुज निरमली, काया कंचनवान, नहि प्रस्वेद लगार तारे तुं तेहने, जे धरे ताहरूं ध्यान. प्र. ३ राग गयो तुज मन थकी, तेहमां चित्र न कोय, रुधिर आमिषथी राग गयो तुज जन्मथी, दुध सहोदर होय. प्र. ४ श्वासोच्छ्वास कमल समो, तुज लोकोत्तर वाद, देखे न आहार-नीहार चरम चक्षु धणी, अहवा तुज अवदात. प्र. ५ चार अतिशय मूलथी, ओगणीश देवना कीध, कर्म खप्याथी अग्यार चोत्रीश एम अतिशया, समवायांगे प्रसिद्ध. प्र. ६ जिन उत्तम गुण गावतां, गुण आवे निज अंग, पद्मविजय कहे एह समय प्रभु पालजो, जेम थाउं अक्षय अभंग. प्र. ७ Jain Education International For Private Personal Use Only www.jainelibrary.org

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