Book Title: Nandanvan Kalpataru 2004 00 SrNo 12
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti

View full book text
Previous | Next

Page 52
________________ - भाभावकजगन्नाथ एस्. जगन्नाथः 2925, शाण्डिल्य: 1st Main 5th Cross सरस्वतीपुरम्, मैसुरु-५७०००९ सूत्रप्राया प्रासरम्या स-दादा सोत्प्रासोक्तिं कन्नडाभाणकीया । शैली नीतिस्फोरणायात्तजन्मा नूत्लग्रन्थोत्पादने देशिका मे ॥ १ आभाणकजगन्नाथे चाकचिक्येन चारुणि । प्राचीनैर्वचनैः पूर्णे प्रत्यग्रोऽध्या परीक्ष्यताम् ॥ २ . 4 १. अइउणमविज्ञाय पाणिनिमाकारयति नियुद्धाय । । २. अकरणादसंबद्धकरणं व्रम् ! o ३. अकारणवैरिणः स्वका एव बन्धवः । ४. अगोचरा मूलिका भेषजम् ।। ५. अगुलीदघ्नस्य कलविङ्गस्य भङ्गलीला गृधैः ! ६. अजस्य किं गजस्योलत्या ? - Jain Education International Jain Education International For Privalgg Personal Use Only www.jainelibrary. www.jainelibrary.org

Loading...

Page Navigation
1 ... 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112 113 114 115 116 117 118 119 120 121 122