Book Title: Nandanvan Kalpataru 2004 00 SrNo 12
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti

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Page 118
________________ 4OSSA दुक्खवियरणपच्चलप्पसुहपणविहविसयपयतइवेरग्गगए ॥ पवंदमो सरणोइयवरचरणपसाहगे हयपमायसत्तू सयलणगारे ॥वेड्डओ॥२२॥ उण्णयभावा चत्तविहावा संजयजोगा दूसियभोगा । णिम्मलदंसण सासणसेवणतप्परचेयणभव्वसहावा ॥ पावणभव्वगुणगणविराइय-पंचमहब्बयपालगसाहू । कम्मसमुच्चयणिज्जरणामयसोहणवित्तिपवित्तिपयारा ॥रयणमाला॥२३॥ पत्तसंजमे भद्दसाहगे । तवविहायगे जणप्पबोहगे ॥ समपरीसहाचलाहिवारगे । भववने सया सरण्णसाहुणो खित्तयं॥२४॥ दुखसुक्खए खणे समे समे । वंदगेयरे माणएयरे ॥ लक्खरखगे सुधम्मदेसगे । तित्थभासगे मुणी णमामि हं ॥खित्तयं॥२५॥ र melan URE ॥ श्रीदर्शनपदस्तवनम् ॥ दंसणं सुपरिणामसहावं । जिणपभासियतत्तं वरभावं ॥ सच्चमेयं ति विसिट्टवियारं । दुविहतिविहचउपंचपयारं ॥दीवयं॥२६॥ जायइ तं परिणइमयतिकरणणुक्कमभावं । चियमोहसमपमुहजोगयलक्वणपंचगभावं ॥ Jain Education International For Private ou sanal Use Only www.jainelibrary.org

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