Book Title: Nandanvan Kalpataru 2004 00 SrNo 12
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti

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Page 51
________________ - आचार्याणां महाभाग्य-मुभयोर्भाग्यदर्शनम् । उभयोस्तन्महाभाग्य-माचार्यैश्चर्यदर्शनम् ॥११॥ जगता विजितो लोके, जगत्सत्यं प्रवक्ति हि । जगज्जितं येन पुंसा, स तुच्छं वक्ति मायिकम् ॥१२॥ यदि ते ब्रह्मजिज्ञासा, प्रज्ञानं ब्रह्म संस्मर । यदि ते स्वात्मजिज्ञासा, ब्रह्मैवाऽहमिति स्मर ॥१३॥ मनुष्यत्वं प्रमाणं चेत्, शास्त्रं समनुधावति । आचार्यश्च तदा राजा, मिथी मैत्री समाप्तुतः ॥१४॥ शस्त्रं बुद्धिपराधीनं, शास्त्रं सहजसंस्थितम् । तत्परावृत्तियलस्तु, धर्मोपप्लव उच्यते ॥१५॥ यथा कालो यथा शत्रु-र्यथैव स्वबलं भवेत् । तथा निर्मीयते शस्त्रं, न शास्त्रं केनचित् क्वचित् ॥१६॥ Jain Education International For Privateersonal Use Only www.jainelibrary.org

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