Book Title: Nandanvan Kalpataru 2004 00 SrNo 12
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti
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Dono
KAYAVA
जिन चैत्यवंदन परमेसर परमातमा, पावन पमिट्ट, जय जगगुरु ! देवाधिदेव ! नयणे में दिट्ठ (१) अचक अकल अविकार सार, करुणारस सिंधु, जगति जन आधार एक, निष्कारण बंधु (२) । गुण अनंत प्रभु ताहराओ, किमही कह्या न जाय, राम प्रभु जिन ध्यानथी, चिदानंद सुख थाय (३)
जिनचैत्यवन्दनम् परमेश्वर ! प्रमात्मनयि !, पावन ! प्रमेष्ट ! । भुवनगुरो ! देवाधिदेव !, जय नयनैर्दृष्ट ! ॥१॥ अचलाकलाविकारसार !, करुणारससिन्धो ! जगदेकाधारस्वरूप !, निष्कारणबन्धो ! ॥२॥ गुणा अनन्तास्ते प्रभो !, कथमपि नहि कथयेयुः ।
राम ! प्रभो ! ते ध्यानत-श्चिदानन्दसुखमीयुः ॥३॥ | करुणासागर ! देव ! ते, भद्रकरचरणम् । |L भविकानां भवनीरधौ, भवतु धुरन्धरणम् ॥४॥
VIANTIDIA
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